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बुधवार, मई 18, 2016

वादा

क़समें खाकर 
खून के ख़त लिखकर 
किए गए हों जो वादे 
सिर्फ़ वही वादे नहीं होते 

ख़ामोशी के साथ 
आँखों ही आँखों में 
होते हैं बहुत से वादे 

निभाने वाले 
निभाते हैं अक्सर 
आँखों से किए वायदे 
मुकरने वाले मुकर जाते हैं 
खून के ख़त लिखकर 

अहमियत नहीं रखती 
न कोई क़सम 
न खून की स्याही 
महत्त्वपूर्ण होती है 
दिल की प्रतिबद्धता |

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अप्रैल 06, 2016

परिवर्तन के लिए

आग उगलें शब्द 
फड़कने लगें बाजू 
कविता पढ़कर
ज़रूरी तो नहीं 

अल्फ़ाज़ हर बार 
प्रेरित करें लोगों को 
बंदूक उठाने के लिए 
कब ज़रूरी है यह 

विरोध की भाषा का 
बन्दूकों से ही बोला जाना 
कहाँ ज़रूरी है 

परिवर्तन के लिए 
काफ़ी होता है 
विचारों की एक लहर का उठाना 
मन-मस्तिष्क में 

हमें तो करनी है 
विचारों की खेती 
क्योंकि 
बंदूकें तो 
कभी-कभार लिखती हैं 
विचार अक्सर लिखते हैं 
परिवर्तन की कहानी |

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मार्च 09, 2016

मन और पत्ते

लालच 
छोटा हो या बड़ा 
मन डोल ही जाता है 
लालच को देखकर 
वैसे ही जैसे 
डोल जाते हैं पत्ते 
हवा चलने पर 

पत्तों की तरह 
बेशक दिखता नहीं 
मन का डोलना 
मगर झलकता है 
हमारे कृत्यों में 

मौजूद रहता है यह लालच 
अनेक रूपों में 
हर जगह
हर समय 
हवा की तरह 
कमोबेश मात्रा में 

पत्तों का डोलना 
हार नहीं होती पेड़ की 
लेकिन मन का डोलना 
हार होती है आदमी की 
आखिर फर्क तो है 
मन और पत्तों में 
आदमी और पेड़ में |

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, फ़रवरी 24, 2016

शब्द-बाण

कमान से छूटा तीर 
बेध पाता है 
एक ही छाती 

जुबान से निकले शब्द 
बेध सकते हैं 
अनेक हृदय 

तीर घायल करता है 
बस एक बार 
शब्द चुभते रहते हैं 
उम्र भर 
शब्दों की गूँज 
सुनाई देती है 
रह रहकर 

बेशक 
  अर्थ का अनर्थ संभव है 
सुनने वाले के द्वारा 
मगर सतर्कता ज़रूरी है
शब्द-बाण छोड़ने से पहले 
क्योंकि अनर्थ का धुआँ 
उठेगा तभी 
जब शब्दों की आग होगी । 

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दिलबागसिंह विर्क 
****** 

बुधवार, फ़रवरी 10, 2016

रिश्तों की फ़सल

बड़े नाज़ुक होते हैं 
रिश्ते-नाते
जरूरी होता है 
संभालना इनको 
आंगन में उगे 
छुई-मुई के पौधे की तरह 

डालनी पडती है 
विश्वास की खाद
पैदा करना होता है 
समर्पण से भरा 
अनुकूल वातावरण 

बचाना होता है 
शक के तुषारापात से 
दूर रखना होता है 
अहम् जन्य  
बेमौसमी तत्वों को 

रिश्तों की फ़सल
यूँ ही नहीं लहलहाती 
तप करना पड़ता है 
किसान की तरह |

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दिलबागसिंह विर्क
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बुधवार, फ़रवरी 03, 2016

पतंग के माध्यम से

बहुत विस्तृत है आसमान 
उड़ सकती हैं सबकी पतंगें 
साथ-साथ 

पतंग सिर्फ़ उड़ानी नहीं होती 
पतंग लूटनी भी होती है 
मज़ा ही नहीं आता 
केवल पतंग उड़ाने में 
असली मज़ा तो है 
दूसरों की पतंग लूटने में 

वैसे बचती नहीं 
किसी की भी पतंग 
किसी की हम लूट लेते हैं 
कोई हमारी लूट लेता है 

दुःख तो होता है 
अपनी पतंग लुटने का 
मगर ये दुःख बौना है 
उस ख़ुशी के सामने 
जो मिलती है 
दूसरों की पतंग लूटने पर 

अपनी पतंग रहे न रहे 
दूसरों की नहीं रहनी चाहिए 
बड़ों की जीवन शैली 
सीख लेते हैं बच्चे 
पतंग के माध्यम से 
बचपन में ही |

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दिलबागसिंह विर्क 
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मंगलवार, मार्च 24, 2015

गांधारी-सा दर्शन

देखना खुद से होता है 
सुना दूसरों को जाता है 

दूसरे क्या सुनाते हैं आपको 
क्या सुनने को 
करते हैं विवश 
यह हाथ में नहीं आपके 

बहुत से शकुनी
बहुत से दुर्योधन 
बहुत से धृतराष्ट्र
अक्सर इतना शोर मचाते हैं 
कि दब जाती  है आवाज़ 
न सिर्फ़ 
भीष्मों की 
विदुरों की 
पांडवों की 
अपितु 
कृष्ण तक की 
कानून की देवी भी 
चूक जाती है न्याय से 
धोखा खा जाती है 
दलीलों से 
दरअसल 
गांधारी-सा दर्शन है उसका 
बाँध रखी है उसने भी 
आँख पर पट्टी 
देखने से परहेज है उसे 
वह सिर्फ सुनती है 
उसे यकीन है
कानों सुने उस सच पर 
जो सदैव कमतर होता है 
आँखों देखे सच से |

दिलबाग विर्क 
*****

मंगलवार, दिसंबर 16, 2014

वक्त खुद सीढ़ी बनेगा

आकाश देता है निमन्त्रण 
हर किसी को 
अपने पास आने का 
अगर सुन सको तो 

अँधेरे तहखानों से भी 
निकलते हैं रास्ते 
बाहर की दुनिया के 
अगर देख सको तो 

जागो
उठाओ कदम 
दृढ़ विश्वास के साथ 
बढ़ो मंज़िल की ओर
वक्त खुद सीढ़ी बनेगा 
तुम्हें शिखर तक ले जाने के लिए 

दिलबाग विर्क 
*****

सोमवार, दिसंबर 01, 2014

अर्जुनों की मौत

कोई भी द्रोणाचार्य 
किसी को 
अर्जुन नहीं बना सकता 
हाँ 
कोई अर्जुन 
किसी द्रोणाचार्य को 
अमर जरूर कर सकता है 

यह प्रश्नचिह्न नहीं है 
किसी द्रोणाचार्य की योग्यता पर 
किसी द्रोणाचार्य के ज्ञान पर 
यह तो वास्तविकता है 
दरअसल 
ज्ञान देने की चीज़ नहीं 
ज्ञान लेने की चीज़ है 
अर्जुन बनाया नहीं जाता 
अर्जुन बना जाता है 
अगर बनाया जा सकता अर्जुन 
तो भीड़ होती अर्जुनों की 
आखिर कौरव भी 
सहपाठी थे अर्जुन के 

अर्जुन बनने के लिए 
जरूरी होता है 
अर्जुन का एकलव्य होना 
हर अर्जुन में 
एक एकलव्य होता है 
हर एकलव्य 
अर्जुन बन सकता है 
यह निर्भर करता है द्रोणाचार्य पर 
वो एकलव्य को 
अर्जुन बनने देता है 
या फिर अर्जुन को 
बना देता है एकलव्य 

आज कमी नहीं द्रोणाचार्यों की 
हाँ, एकलव्य आज नहीं मिलते 
आज अँगूठा नहीं कटवाते शिष्य 
आँख दिखाते हैं 
एकलव्यों का मर जाना 
अर्जुनों का मर जाना है । 

दिलबाग विर्क 
*****

सोमवार, जुलाई 22, 2013

हौवा ( कविता )

               
                 हौवा कौवा नहीं होता

                 जिसे उड़ा दिया जाए
                 हुर्र कहकर ।

                 हौवा तो वामन है
                 जो कद बढ़ा लेता है अपना
                 हर कदम के साथ ।
                 हौवा तो अमीबा है
                 जितना तोड़ोगे इसे
                 इसकी गिनती बढेगी उतनी ही ।

                 हौवा पैदा करना कोई हौवा नहीं
                 बस एक अफवाह फैलानी है
                 तिल का ताड़ बन जाएगा खुद ही ।

                 हौवा पैदा करना जरूरत है आज की
                 क्योंकि इसी के बल पर सिकेंगी रोटियाँ
                 राजनैतिक रोटियाँ
                 सामाजिक रोटियाँ
                 आर्थिक रोटियाँ
                 धार्मिक रोटियाँ
                 और इन रोटियों को पकाने में
                 गलेगी देह उनकी
                 रोटी जिनके लिए खुद एक हौवा है ।

                                  *********

शुक्रवार, सितंबर 14, 2012

हिंदी की पुकार ( कविता )

मैं हिंदी हूँ 
हिन्दुस्तान की बेटी हूँ 
न देखो मुझे 
किसी जाति से जोड़कर 
किसी सम्प्रदाय से जोड़कर 
किसी क्षेत्र से जोड़कर 
कश्मीर से कन्याकुमारी तक 
चाहती हूँ प्यार सबका 
बांटती हूँ प्यार सबको 
पिरोती हूँ एक सूत्र में 
पंजाबी, मराठी, गुजराती, बंगाली 
सभी भाषाएँ हैं भगिनी मेरी 
चल सकती हूँ मैं साथ सबके
ओ हिंद वासियों 
सुनो पुकार मेरी  
न करो विरोध मेरा 
किसी भाषा को लेकर 
छोडो संकीर्णता 
तोड़ो भाषाई बंधन 
जुडो़ मुझसे 
मुझसे जुड़कर जुडो़गे तुम 
इस देश से 
खुद से 
मैं हिंदी हूँ 
हिन्दुस्तान की बेटी हूँ ।

**************

रविवार, अगस्त 12, 2012

प्यार ( कविता )

तुझे पा लूं 
बाँहों में भरकर चूम लूं 
है यह तो वासना ।

प्यार कब चाहे 
कुछ पाना 
कुछ चाहना ।

जब तक तडप है 
प्यार जिन्दा है 
जब पा लिया 
प्यार मुरझा गया
 वासना में डूबकर ।

कुछ पाने की 
फ़िक्र क्यों है 
तडप का मजा लो 
यही तडप तो नाम है
प्यार का ।

दिलबाग विर्क 
************

रविवार, जुलाई 15, 2012

गाँव (कविता )

         मेरा गाँव 
         जैसा मेरे बचपन के दिनों में था 
         वैसा अब नहीं रहा 
         वह खो गया है कहीं 
         आज के गाँव में ।


         जो पुराना गाँव था 
         दो हिस्से थे उसके 
         एक हिस्से में थे 
         रिहायशी घर 
         दूसरे हिस्से में थी 
         खेती की जमीन ।
         आज ये दोनों हिस्से 
         मिल चुके हैं इस कद्र 
         कि अब पता नहीं चलता 
         गाँव खेतों में आ बसा है 
         या फिर 
         खेत गाँव में आ घुसे हैं ।


         पहले गाँव के जोहड़ में 
         कश्तियों-सी घूमती थी भैंसे 
         और जोहड़ किनारे लगे 
         पीपल के पेड़ के नीचे 
         जमती थी महफ़िल 
         चलते थे ताश के दौर 
         तब मुश्किल से ढूंढ पाते थे 
         बैठने को जगह 
         लेकिन अब वीरानी है वहां पर 
         सूख चूका है जोहड़ 
         नहीं जमती 
         पीपल के नीचे महफ़िल 
         गाँव के नजारे 
         लुप्त हो चुके हैं गाँव से ।


         सिर्फ गाँव ही नहीं बदला 
         गाँव के साथ बदले हैं 
         गाँव के लोग भी 
         पहले-सा भाईचारा    
         पहले-सा प्रेम भाव 
         खो गया है कहीं 
         लड़ाई        
         टांग-खिचाई 
         अब हिस्सा बन चुके हैं गाँव का ।


         मेरे बचपन का गाँव 
         मेरे बचपन की तरह 
         निकल चुका है हाथ से 
         वह अब सिर्फ यादों में है 
         उसे हकीकत बनाने की जरूरत 
         नहीं महसूस होती किसी को 
         लेकिन 
         शहर-सा बने गाँव पर 
         आंसू बहाता है 
         उदास खड़ा पीपल का पेड़ ।


                   ********

शनिवार, मार्च 31, 2012

जिन्दगी का सफर

खामोश 
तन्हा
चल रहा है
जिन्दगी का सफर ।

मौसम बदल रहे हैं
दिन बीत रहे हैं
वक्त गुजर रहा है
आहिस्ता-आहिस्ता ।

तय हो रही हैं 
बहुत-सी दूरियां
हासिल किए जा रहे हैं
नए-नए मुकाम
स्थापित हो रही हैं
नई-नई मान्यताएं
हर दिन , हर पल ।

यही जिन्दगी है
यही जिन्दगी का सफर है
जो चल रहा है
चुपके-चुपके
आहिस्ता-आहिस्ता ।

**********************

सोमवार, फ़रवरी 13, 2012

मुझे तुमसे प्यार है ( कविता )

प्यार
भावना था कभी 
आजकल भाषण है ।
क्योंकि
सुबह के वक्त 
दोपहर के वक्त
शाम के वक्त
घर से निकलते वक्त 
घर आते वक्त
फोन पर बतियाते वक्त
बार-बार दोहराया जाता है
एक जुमला
मुझे तुमसे प्यार है ।

भले ही 
पति-पत्नी दोनों का मुंह 
रहता हो विपरीत दिशाओं में
भले ही 
एक-दूसरे की अवमानना 
आम बात हो 
भले ही 
घर से बाहर जाते ही 
कोई और भी लगता हो 
दिल को प्यारा
फिर भी 
एक-दूसरे को
अंधेरे में रखने के लिए 
अक्सर दोहराया जाता है 
यह जुमला
मुझे तुमसे प्यार है ।

यह जुमला 
बेहद जरूरी है
क्योंकि अब
प्यार भावना नहीं
महज एक भाषण है ।
प्यार एहसास नहीं
महज एक दिखावा है ।
प्यार आजकल 
एक ओवरकोट है
जो कभी भी उतारा जा सकता है
जो कभी भी पहना जा सकता है
कभी भी 
किसी को भी
कहा जा सकता है
मुझे तुमसे प्यार है ।
मुझे तुमसे प्यार है ।

* * * * *

शुक्रवार, फ़रवरी 03, 2012

हो सके तो ( कविता )

अगर 
हो सके तो 
प्यार के फूल खिलाना
जिससे महक सके 
घर आंगन
अगर
ऐसा संभव न हो तो
कम - से - कम 
बचना
नफरत की दीवार उठाने से
क्योंकि
युग लगते हैं
नफरत की
एक - एक
ईंट गिराने में ।

* * * * *

गुरुवार, दिसंबर 22, 2011

अपाहिज ( कविता )

                                          

                                  अपाहिज कोई 
              जिस्म से नहीं होता 
              सोच से होता है 
              जो सोच से अपाहिज है
              वह स्वस्थ होते हुए भी 
              हार जाता है ज़िन्दगी से 
              और जो 
              सोच से अपाहिज नहीं 
              वह अपाहिज होते हुए भी 
              धत्ता बता देता है 
              हर मुश्किल को 
              और सफलता 
              कदम चूमती है उसके । 


                    * * * * * *

बुधवार, दिसंबर 07, 2011

जिंदादिली ( कविता )


          तालियों की गड़गड़ाहट 
          और 
          पेट की भूख 
          कर देती है मजबूर 
          मौत के मुंह में उतरने को 
          यह जानते हुए कि
          यह वीरता नहीं 
          मूर्खता है ।
          
         बाजीगिरी
         कोई चुनता नहीं शौक से
         यह मुकद्दर है
         गरीब समाज का 
         और इस मुकद्दर को 
         कला बनाकर जीना 
         जिन्दादिली है 
         और यह जिन्दादिली 
         जरूरी है क्योंकि 
         जिन्दगी जीनी ही पड़ती है 
         चाहे रो के जियो
         चाहे हँस के जियो
         चाहे डर के जियो
         चाहे जिन्दादिली से जियो ।


                  * * * * *

शुक्रवार, अगस्त 19, 2011

दोषी


                     माना कि तुम 
                 उस दुर्योधन से नहीं हो 
                 जिसने छीन लिया था
                 भाइयों  का राज-पाट.

                 माना कि तुम 
                 उस दुशासन से नहीं हो 
                 जिसने भरी सभा में 
                 निर्वस्त्र करना चाहा था 
                 कुलवधू को .

                 माना कि तुम 
                 उस कर्ण से नहीं हो 
                 जो अहसानों के बोझ तले दबा 
                 करता रहा अंध समर्थन 
                 अन्याय और कपट का .

                 माना कि तुम 
                 उस शकुनी से नहीं हो 
                 जो उत्तरदायी था 
                 लाक्षागृह और द्युत जैसी 
                 कपटी योजनाओं का. 

                 माना कि तुम 
                 उस धृतराष्ट्र से नहीं हो 
                 जो अँधा हो गया था 
                 पुत्र प्रेम में .

                 इतना होने पर भी 
                 ये न कहो 
                 कि दोषी नहीं हो तुम 
                 बुरे हालातों के लिए 
                 क्योंकि तुम चुप बैठे हो 
                 भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य 
                 कृपाचार्य , विदुर की तरह 
                 क्योंकि तुम 
                 प्रतिज्ञा नहीं ले रहे भीम की तरह 
                 क्योंकि तुम 
                 प्रेरित नहीं कर रहे अर्जुन को 
                 गांडीव उठाने के लिए 
                 कृष्ण की तरह .

                 यही दोष है तुम्हारा 
                 इसीलिए तुम उत्तरदायी हो 
                 बुरे हालातों के लिए .

                      * * * * *  


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