क़समें खाकर
खून के ख़त लिखकर
किए गए हों जो वादे
सिर्फ़ वही वादे नहीं होते
ख़ामोशी के साथ
आँखों ही आँखों में
होते हैं बहुत से वादे
निभाने वाले
निभाते हैं अक्सर
आँखों से किए वायदे
मुकरने वाले मुकर जाते हैं
खून के ख़त लिखकर
अहमियत नहीं रखती
न कोई क़सम
न खून की स्याही
महत्त्वपूर्ण होती है
दिल की प्रतिबद्धता |
दिलबागसिंह विर्क
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