मंगलवार, मार्च 15, 2011

अगज़ल - 13

भुला दे अश्कों को , ला होंठों पे मुस्कान 
जिन्दादिली ही है , जिन्दगी की पहचान । 

मुहब्बत से गुरेज़ है लोगों को , तभी तो 
घर बन नहीं पाते, ये पत्थरों के मकान । 

बाँट दो सब खुशियाँ , हैं जो भी आगोश में 
कब  रुका  करती  हैं  बहारें , ऐ  बागबान  । 

बेवफाई तो अब दस्तूर - ए - मुहब्बत है 
फिर किस सोच में डूबे हो, क्यों हो परेशान ?

दामन थामकर हौंसले का , बस खड़े रहो
लेने दो तुम ,  इस जिन्दगी को इम्तिहान । 
मौसम बदलते ही खिले हैं फूल वहाँ पर 
चंद रोज़ पहले तक , जो गुलशन थे वीरान । 

बस  हैवानियत  को  मारने  की  देर  है
खुदा हो जाता है ' विर्क ' अदना-सा इंसान । 

दिलबाग विर्क   
* * * * *

शुक्रवार, मार्च 11, 2011

कविता - 6

    तुझे रुकना होगा  
      ऐ खुदा 
      तेरी सृष्टि 
      तेरी ही कोप दृष्टी से 
      हो रही है ध्वस्त 
      कभी वसुंधरा पर 
      हरियाली लहलहाने में 
      मदद करने वाला नील गगन 
      अनावृष्टि से 
      या फिर अतिवृष्टि से 
      नीरव कर देता है जन जीवन को 
      तो कभी खुद वसुंधरा 
      अपनी गोद में फैली 
      खूबसूरत दुनिया को 
      मिला लेती है मिटटी में 
      ऐसा क्यों होता है ?
      यह पूछने का हक तो नहीं हमें 
      क्योंकि तेरा हर कृत्य 
      मानव के हित में होगा 
      ऐसा विश्वास है सबको 
      और इसी श्रद्धा के चलते 
      आशा है जन -जन को 
      रचयिता 
      विध्वंसक नहीं हो सकता 
      मगर सब आशाएं 
      सब उम्मीदें हों परिपूर्ण 
      यह भी संभव नहीं 
      फिर भी 
      तुझे रुकना होगा 
      विध्वंस का कारण होने से  
      क्योंकि 
      विध्वंस करने वाले तो 
      काफी हैं 
      इसी वसुंधरा के सुपुत्र ही 
      और अगर तू भी 
      हो गया साथ इनके 
      तो कौन बचा पाएगा 
      बर्बादियों के सिलसिले से ?
      कौन रोक पाएगा 
      विनाश के तांडव को ?

             * * * * *

सोमवार, मार्च 07, 2011

दंगों के बाद

 
         शहर में तैनात 
         सेना और पुलिस के जवान 
         घूर रहे हैं 
         हर आने - जाने वाले 
         व्यक्ति को .

         कुछ दिन पहले 
         शहर में हुए 
         एक दंगे ने 
         शक के दायरे में 
         ला दिया है 
         हर आदमी को .

         दंगे की आग 
         अब बुझ चुकी है 
         माहौल सामान्य हो रहा है 
         धीरे - धीरे 
         लेकिन 
         दंगे के दौरान 
         हिंसक जानवर बनने के कारण
         शक के दायरे में आया आदमी 
         अभी तक 
         बाहर नहीं निकल पाया 
         उस छवि से .

         अक्सर 
         दंगों के बाद 
         वक्त लगता है 
         विश्वास बहाली में 
         वक्त लगता है 
         शक के दायरे से बाहर निकलकर 
         आदमी को 
         हिंसक जानवर से 
         पुन: आदमी बनने में .

             * * * * * 

गुरुवार, मार्च 03, 2011

अगज़ल - 12

तुम हर बार छुपा जाते हो , प्यार जताते - जताते 
हम हर बार जता  जाते हैं , प्यार छुपाते - छुपाते  ।

अभी तो दिल ने चहकने का इरादा किया था फिर 
क्यों चुप हुए लब तुम्हारे , हमें बुलाते - बुलाते ।

आखिर कोई फैसला तो हो नजरों के खेल का 
परेशां हो गए हैं दिल पर जख्म खाते -खाते ।

क्या कहें हम अपनी इस खस्ताहाल तकदीर को
खो  चुके  हैं  कई  मंजिलें  बस  पाते - पाते ।

ये तुम्हारा तिलिस्म था या हमारी बेबसी 
सांसों में सजा बैठे , हम तुम्हें भुलाते - भुलाते ।

हो सके तो ' विर्क ' जल्दी से जिन्दगी में आना 
कहीं बहुत देर न हो जाए , तुम्हारे आते - आते ।

दिलबाग विर्क
* * * * *  

मंगलवार, मार्च 01, 2011

षटपदीय छंद - 3

सच को पूछे न कोई , झूठ हुआ प्रधान 
सच्चे को मिलता जहर , झूठे को सम्मान .
झूठे को सम्मान , देते दुनिया के लोग 
नैतिकता मर रही , गले पड़ा कैसा रोग .
कडुवी दवा जैसा , दुष्टों को मारता सच 
पूछे ' विर्क ' सबसे , झूठ से क्यों हारता सच ?

                * * * * *                
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