भुला दे अश्कों को , ला होंठों पे मुस्कान
जिन्दादिली ही है , जिन्दगी की पहचान ।
मुहब्बत से गुरेज़ है लोगों को , तभी तो
घर बन नहीं पाते, ये पत्थरों के मकान ।
बाँट दो सब खुशियाँ , हैं जो भी आगोश में
कब रुका करती हैं बहारें , ऐ बागबान ।
बेवफाई तो अब दस्तूर - ए - मुहब्बत है
फिर किस सोच में डूबे हो, क्यों हो परेशान ?
दामन थामकर हौंसले का , बस खड़े रहो
मौसम बदलते ही खिले हैं फूल वहाँ पर
चंद रोज़ पहले तक , जो गुलशन थे वीरान ।
बस हैवानियत को मारने की देर है
खुदा हो जाता है ' विर्क ' अदना-सा इंसान ।
दिलबाग विर्क
* * * * *




