बुधवार, नवंबर 21, 2012

कितनी ही दीवारें

जाती व धर्म 
कितनी ही दीवारें 
खींची हमने ।
चाय-पानी से 
होता है हर काम 
कार्यलयों में ।
ईश्वर एक है 
ये कहते हैं सभी 
मानते नहीं ।
झूठा प्रचार 
होता है चुनावों में 
सभी के द्वारा ।

**********

मंगलवार, नवंबर 13, 2012

जलें दीप से दीप


दीवाली त्यौहार पर, जलें दीप से दीप 
सब अन्धकार दूर हों, हो रौशनी समीप ।
हो रौशनी समीप, उमंग जगे हर घर में 
करें तमस का नाश, हो उजास विश्व भर में ।
कहे विर्क कविराय, भरे खुशियों की थाली 
फैले हर्षोल्लास , मनाएं जब दीवाली ।

**********

गुरुवार, नवंबर 01, 2012

अगजल - 47

जिन्दगी में फैली है कैसी बेनूरी ।
न सुबह सुहानी, न शाम सिन्दूरी ।
चाँद के चेहरे पर दाग क्यों है ?
क्यों है दुनिया की हर शै अधूरी ?

माना ताकतवर है तू बहुत मगर 
ठीक नहीं होती इतनी मगरूरी ।

जब भी पाओगे भीतर मिलेगी 
कहाँ ढूँढो खुशियों की कस्तूरी ।

तुझसे शिकवा करना खता होगी 
इंसान के हिस्से आई है मजबूरी ।

दुनिया सिमट गई मुट्ठी में मगर 
दिलों में ' विर्क ' बढती जाए दूरी ।

**********

बुधवार, अक्टूबर 24, 2012

रावण ( तांका )

बुत्त जलता 
दशहरे के दिन 
रावण नहीं 
रावण तो जिन्दा है 
हमारे ही भीतर ।
जिन्दा रखते 
भीतर का रावण 
और बाहर 
जलाते हैं पुतले 
धर भेष राम का 

************

गुरुवार, अक्टूबर 18, 2012

बचपन

ये बचपन मासूम - सा , है ईश्वर का रूप 
प्यारी-सी मुस्कान है, ज्यों सर्दी की धूप ।
ज्यों सर्दी की धूप, सुहाती हमको हरपल 
लेती है मन मोह, सदा ही चितवन चंचल ।
लेकर इनको गोद, ख़ुशी से झूम उठे मन 
यही दुआ है विर्क , रहे हंसता ये बचपन ।

************

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...