बुधवार, अक्टूबर 12, 2016

मैं इस बात को लेकर शर्मिंदा हूँ

लोग हों-न-हों, मैं इस बात को लेकर शर्मिंदा हूँ 
हैवानियत है जहाँ, मैं उस दौर का वाशिंदा हूँ | 

जमाने को बदल सकूं, ऐसी मेरी हैसियत नहीं 
खुद को बदलून कैसे, अपने उसूलों में बंधा हूँ | 

बस उसका वजूद ही दुश्मन है तीरगी का वरना 
आफताब कब कहे किसी को कि मैं ताबिंदा हूँ | 

खुदा ने तो लिखी थी परवाज मेरी किस्मत में 
वक्त ने काट दिए पर जिसके, मैं वो परिंदा हूँ |

बेबसी के दौर में जीने की तमन्ना तो नहीं मगर 
बुजदिली है ख़ुदकुशी ' विर्क ' बस इसलिए ज़िंदा हूँ | 

दिलबागसिंह विर्क 
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सांझा-संग्रह - 100 क़दम 
संपादक - अंजू चौधरी, मुकेश सिन्हा 

बुधवार, अक्टूबर 05, 2016

खुदा है तो खुदा बन

हमारी दुआओं का हो नहीं रहा कुछ असर 
खुदा है तो खुदा बन, क्यों बनता है पत्थर |

महौले-दहशत कब तक रहेगा जिंदगी में 
बड़ा बेचैन हैं दिल, बड़ी परेशान है नजर | 

देकर सब कुछ, अब छीन रही खुशियाँ 
ऐ तकदीर, तू मुझसे ऐसा मजाक न कर | 

यहाँ मैं रहूँ वो जगह सराए से कम नहीं 
कीमत वसूल रही है दौलत, छीनकर घर | 

दौरे-दहशत में अब सूझता कुछ भी नहीं 
किस राह चलूँ मैं, कौन-सा है मेरा सफर |

बेबसी का अहसास तो ' विर्क ' उनसे पूछो 
समेटते-समेटते गया जिनका सब कुछ बिखर | 

दिलबाग सिंह विर्क 
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सांझा संग्रह - 100 कदम  
प्रकाशक - हिन्द युग्म 
संपादक - अंजू चौधरी और मुकेश सिन्हा 

बुधवार, सितंबर 14, 2016

हो गई पूजा

याद पगी थी
तेरी खुशबू संग
ठुकराता क्यों ?

कहीं न गया
तुझे याद किया है
हो गई पूजा ।

आए थे याद
भूले-बिसरे पल
जिए दोबारा ।

दिलबाग विर्क 
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बुधवार, सितंबर 07, 2016

याद

खुद को भूला
तुझको याद किया
कब जी पाया ।

याद जो आती
आँसुओं की बारिश
थम न पाती ।

कभी हंसाती
कभी खूब रुलाती
याद कमाल ।

दिलबाग विर्क 
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बुधवार, अगस्त 24, 2016

रंग

 
हरे, लाल, पीले 
गुलाबी, उनाबी 
रंग ही तो रंगीन करते हैं
जीवन को 

चेहरे पर लगे रंगों से 
खिल उठते हैं चेहरे 
मगर चेहरों पर 
रंग सिर्फ़ लगाया नहीं जाता 
चेहरे खुद भी रंग बदलते हैं 

चेहरों का रंग बदलना 
बेरंग करता है रिश्तों को 
रंग बदलते चेहरों के बीच 
रिश्तों का बेरंग हो जाना 
सबसे बड़ी त्रासदी है 
इस युग की |

दिलबागसिंह विर्क
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