वो बात-बात पर हँसता है
लोगों को पागल लगता है।
आज हो रहा ये अजूबा कैसे
आँधियों में चिराग़ जलता है।
सिकंदर होगा या फिर क़लंदर
जो दिल में आया, करता है।
वक़्त के साँचे में ढलते सब
क्या वक़्त साँचों में ढलता है ?
सुना तो है मगर देखा नहीं
पाप का घड़ा भरता है।
उसूलों की बात मत छेड़ो
यहाँ पर ‘विर्क’ सब चलता है।
दिलबागसिंह विर्क
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