बुधवार, जनवरी 17, 2018

आसमां बिजली गिराने को है

ये दिल मचलकर बाहर आने को है
इसकी बेबसी मुझे रुलाने को है । 

ज़माने ने छीन ली है छत सिर से 
और आसमां बिजली गिराने को है।

उलझ गया हूँ मैं, कोई बताए मुझे 
क़सम खाने को है या निभाने को है।

लापरवाहियाँ मैंने छोड़ी ही नहीं 
तमाशबीन फिर आग लगाने को है।

अमन, ख़ुशी, प्यार की उम्मीदों का महल 
दहशत के इस दौर में चरमराने को है ।

किसी को भी अब परवाह नहीं इसकी 
वफ़ा का फूल ‘विर्क’ मुरझाने को है।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जनवरी 10, 2018

बड़ा मुश्किल है बनाना घर

आँधी, तूफ़ां और सूरज की तल्ख़ियाँ झेलकर 
देखो उसे, छाँव दे रहा है हमें जो शजर ।

नींव में डालनी पड़े हैं अक्सर ख़ुद की ख़ुशियाँ 
मकां बना लोगे, बड़ा मुश्किल है बनाना घर ।

वक़्त तो लगता ही है, बीज को शजर होने में 
अच्छे कामों का, देर बाद दिखाई दे असर ।

किसी को हक़ नहीं दूसरे पर हुकूमत का 
जी ऐसे, न किसी को डरा, न किसी से डर।

मासूम होना कोई गुनाह तो नहीं, फिर भी 
बदलते हुए हालातों पर भी, रख थोड़ी नज़र।

माना ‘विर्क’ तेरा पेशा है नसीहतें देना 
मगर ख़ुद को सुधारने की भी कर फ़िक्र।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, दिसंबर 27, 2017

मुकरने वाले मुकर जाते हैं यहाँ ज़ुबान करके

क्या पाया मुहब्बत में ख़ुद को क़ुर्बान करके 
चले गए वो तो दिल के चमन को वीरान करके।

लोगों को मौक़ा मुहैया करवा दोगे हँसने का 
कुछ न मिलेगा तुम्हें अपने ग़म का ब्यान करके।

पागल हो, आँखों के इशारे पर एतबार करते हो 
मुकरने वाले मुकर जाते हैं यहाँ ज़ुबान करके।

यही दस्तूर है ज़माने का, तुम संभलना सीखो 
बड़ी क़ीमत वसूलते हैं लोग एहसान करके।

लोगों की सूरतो-सीरत में फ़र्क़ है बहुत 
लूटते हैं ये, ईमानदारी का बखान करके । 

यूँ किनारा कर लोगे ज़िंदगी से, सोचा न था 
रख दिया तुमने तो ‘विर्क’ हमें हैरान करके।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, दिसंबर 20, 2017

बुज़ुर्गों-सी सयानफ़ आएगी आते-आते

कुछ सच को हमारी हिमायत ज़रूरी है 
कुछ इस पर ख़ुदा की इनायत ज़रूरी है।

आदमीयत को ज़िंदा रखना ही होगा 
आदमी के लिए ये निहायत ज़रूरी है।
बुज़ुर्गों-सी सयानफ़ आएगी आते-आते
बच्चों के लिए थोड़ी रियायत ज़रूरी है।

न पसारो पाँव अपने चादर से ज्यादा 
ख़ुशहाली के लिए किफ़ायत ज़रूरी है।

भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में सकूं के लिए 
सबको ‘विर्क’ वाक्, मंत्र, आयत ज़रूरी है।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, दिसंबर 13, 2017

दिल दिल न रहा, पत्थर हो गया है शायद

तेरी बेरुखी का असर हो गया है शायद 
दिल दिल न रहा, पत्थर हो गया है शायद।

जीतने की सब कोशिशें दम तोड़ती रही 
हारना मेरा मुक़द्दर हो गया है शायद।

वफ़ा, मुहब्बत, एतबार खो गये हैं कहीं 
ईंट-पत्थर का मकां, घर हो गया है शायद

ख़ुशियों के सब किलों को जीतता जा रहा है 
ग़म तो दूसरा सिकंदर हो गया है शायद

आदमी ने ‘विर्क’ छोड़ दी है आदमियत 
इसलिए ख़ुदा का क़हर हो गया है शायद।

दिलबागसिंह विर्क 
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