दोस्त कहूँ कि दुश्मन जिसने भेजे हैं ग़म के पैग़ाम मुझे
साक़ी बना बैठा है वो, पिलाकर अश्कों के जाम मुझे ।
मेरे पास भी है बहुत कुछ इस ज़माने को बताने लायक़
अब छोड़ दे बीती बातों को, न यूँ ही कर बदनाम मुझे ।
सरे-बज़्म अपने ज़ख़्मों की नुमाइश तो लगा दी तूने
बता तो सही, इस इश्क़ ने दिए हैं कौन-से इनाम मुझे।
सफ़र ज़िंदगी का कब कटता है सिर्फ़ यादों के सहारे
ज़िंदा रहना चाहता हूँ मैं, करने दे कोई काम मुझे ।
इश्क़ करना, लुटना, फिर रोना, ये कोई हुनर तो नहीं
क्या था मैं, क्यों सिर-आँखों पर बैठाता अवाम मुझे ।
यूँ तो पागल दिल को जलाकर राख बना रखा है मगर
अक्सर याद आता है ‘विर्क’ एक चेहरा सुबहो-शाम मुझे।
दिलबागसिंह विर्क
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