बुधवार, अप्रैल 18, 2018

कहीं तो बहार होगी, कहीं तो चाँद चमका होगा

यह मुमकिन नहीं, हर शख़्स मुझ-सा तन्हा होगा 
कहीं तो बहार होगी, कहीं तो चाँद चमका होगा। 

जिसको सह जाए ये मासूम-सा दिल आसानी से 
मुझे नहीं लगता, कोई ग़म इतना हल्का होगा ।

सकूं की तलाश में मुसल्सल बेचैन होता गया मैं 
मुक़द्दर से लड़े जो, क्या कोई मुझ-सा सरफिरा होगा।

तुम्हारे जश्न में कैसे शामिल होंगे वो परिंदे 
इन बारिशों में जिनका आशियाना बिखरा होगा 

उसे तो ख़बर होगी, इसको संभालना आसां नहीं 
जिसका भी दिल बच्चे की तरह मचला होगा ।

वक़्त ही बताया करता है आदमी की असलियत 
चेहरा देखकर न कहो ‘विर्क’ वो कैसा होगा ।

दिलबागसिंह विर्क 
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मंगलवार, अप्रैल 03, 2018

दो क़दम तुम चलना

कोई ज़रूरी तो नहीं हर बार फिसलना 
कोशिशों से ही मुमकिन होगा संभलना । 

अगर फ़ासिले दिलों के दूर करने हैं तो 
दो क़दम मैं चलूँगा, दो क़दम तुम चलना। 

घर जला दो किसी का, ये तुम्हारी मर्ज़ी 
वरना काम है इस शमा का तो बस जलना। 

बेक़रार क्यों हुए तुम ढलती शाम देखकर 
फिर सवेर होगी, बताता है दिन का ढलना।

तुम उसे मान लो ख़ुदा की इनायत ही 
जो रंग लाए वक़्त का करवट बदलना ।

आफ़तों से ‘विर्क’ कब तक बचेंगे हम 
ख़ुद-ब-ख़ुद सीख जाएगा दिल बहलना।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मार्च 28, 2018

वो बेक़सूर हो गया

दिल की कली मुरझा गई, चेहरा बेनूर हो गया 
मेरे ख़्वाबों का शीशमहल जब चकनाचूर हो गया।

ख़ुद को भूलने वाला दुनिया को क्या याद करेगा 
मगर ये लोग अब कहते हैं, मैं मग़रूर हो गया । 

बड़े रंग बदले हैं हमारी क़िस्मतों के खेल ने 
ख़ताबार मैं निकला और वो बेक़सूर हो गया ।

सुकूं से हूँ मैं, ऐसी तो कोई बात नहीं मगर 
ये तो है, मैं हादसों का आदी ज़रूर हो गया ।

जिसकी दवा हो वो दर्द भी क्या कोई दर्द है 
वही जानते हैं दर्द, ज़ख़्म जिनका नासूर हो गया। 

न हँसो तुम, इस ज़ालिम ने तुम्हारा भी नहीं होना 
वक़्त के हाथों ‘विर्क’ मैं अगर मजबूर हो गया । 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मार्च 21, 2018

दिल की बस्ती में चुपके से आना

बेमुरव्वत, बेवफ़ा लोगों से क्या दिल लगाना 
मगर क्या करें, बेमुरव्वत है सारा ज़माना ।

उसूलों, रिवाजों के यहाँ पर बड़े सख़्त पहरे 
दिल की बस्ती में आना हो तो चुपके से आना। 

बस ये दो ही काम हैं मक़सद ज़िंदगी जीने के 
तुम्हें हर पल याद करना और ख़ुद को भुलाना। 

समझ लो आ गया है हुनर उसे ख़ुश होने का 
सीखा जिसने ग़म को रेत की मानिंद उड़ाना ।

मुहब्बत गुनाह नहीं गर मंज़ूर हो ये शर्त 
चाहत की आग में हर वक़्त दिल को जलाना। 

बस दीवानगी ही ले आई मुझे इश्क़ की राहों पर 
कभी सोचा नहीं ‘विर्क’ इस सफ़र में क्या है पाना। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मार्च 14, 2018

वक़्त पाकर दिल को हौसला होगा

माना कि दिल तुम्हारा जला होगा 
मगर इसमें भी कुछ तो मज़ा होगा।

इसे इंतिहा तक पहुँच जाने दो 
फिर यह दर्द ख़ुद ही दवा होगा।

ज़माने के ग़म कुछ तो कम होंगे 
जहां में गर किसी का भला होगा। 

हल्के-हल्के सहलाना तुम ज़ख़्मों को 
वक़्त पाकर दिल को हौसला होगा। 

ये साँसें दग़ा दे जाएँगी तुम्हें 
बता इससे बढ़कर और क्या होगा।

वफ़ा को इबादत की तरह मानो 
होने दो ‘विर्क’ जो बेवफ़ा होगा।

दिलबागसिंह विर्क 
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