यह मुमकिन नहीं, हर शख़्स मुझ-सा तन्हा होगा
कहीं तो बहार होगी, कहीं तो चाँद चमका होगा।
जिसको सह जाए ये मासूम-सा दिल आसानी से
मुझे नहीं लगता, कोई ग़म इतना हल्का होगा ।
सकूं की तलाश में मुसल्सल बेचैन होता गया मैं
मुक़द्दर से लड़े जो, क्या कोई मुझ-सा सरफिरा होगा।
तुम्हारे जश्न में कैसे शामिल होंगे वो परिंदे
इन बारिशों में जिनका आशियाना बिखरा होगा
उसे तो ख़बर होगी, इसको संभालना आसां नहीं
जिसका भी दिल बच्चे की तरह मचला होगा ।
वक़्त ही बताया करता है आदमी की असलियत
चेहरा देखकर न कहो ‘विर्क’ वो कैसा होगा ।
दिलबागसिंह विर्क
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