रविवार, अप्रैल 21, 2019

हर बार हारा मैं, हर बार हाथ आई बेबसी

दरवाजे पर देकर दस्तक, लौटती रही ख़ुशी 
वाह-रे-वाह मेरी तक़दीर, तू भी ख़ूब रही। 

हालातों को बदलने की कोशिशें करता रहा 
हर बार हारा मैं, हर बार हाथ आई बेबसी। 

कभी किसी नतीजे पर पहुँचा गया न मुझसे 
अक्सर सोचता रहा, कहाँ ग़लत था, कहाँ सही। 

जिन मसलों ने उड़ाई हैं अमनो-चैन की चिंदियाँ 
उनमें कुछ मसले हैं नस्ली, बाक़ी बचे मज़हबी। 

आपसी रंजिशों ने दी है सदियों की गुलामी हमें 
भूल गए बीते वक़्त को, आग फिर लगी है वही। 

कुछ सुन लेना होंठों से, कुछ समझ लेना आँखों से 
ये दर्द भरी दास्तां, ‘विर्क’ कुछ कही, कुछ अनकही। 

दिलबागसिंह विर्क 

बुधवार, अप्रैल 10, 2019

देख कोशिशें हमारी, दूरियाँ मिटाने की

इश्क़ की राहों पर क़िस्मत आज़माने की 
बुरा क्या है, गर चाहत है तुझे पाने की। 

फ़ासिले कितने हैं दरम्यां, ये न देख 
देख कोशिशें हमारी, दूरियाँ मिटाने की। 

पास फटकने की हिम्मत न जुटा पाएँ ग़म 
आदत जिसे नग़्मे ख़ुशी के गुनगुनाने की। 

अपने हुनर को तराशते रहो, भले ही 
सबको नहीं मिलती इनायतें ज़माने की। 

समझना ही होगा हमें इस सच को 
हुआ करती हैं कुछ बातें भूल जाने की।

जाने ‘विर्क’ क्यों आदत बन गई है 
हर रोज़ नई आफ़त से टकराने की। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अप्रैल 03, 2019

जीना सीख रहा हूँ, दिल पर रखकर पत्थर

बड़ा ग़म उठाया है मैंने, दिल की बातें मानकर 
अब जीना सीख रहा हूँ, दिल पर रखकर पत्थर। 

बुरे दिन जब आते हैं, तब पता चलता है 
बदक़िस्मती क्या है, किसे कहते हैं मुक़द्दर। 

हालातों से हारकर चुप होना पड़ता है  
क्या करें, हर कोई नहीं होता सिकन्दर। 

इसके साथ जीने की आदत बना लो तुम 
लाइलाज होता है यारो, ये दर्दे-जिगर। 

बस कुछ ऐसे ही दस्तूर हैं इस दुनिया के 
डरने वालों को डराता चला जाता है डर।

ज़िंदगी की बिसात पर संभलकर चलना चाल 
कब खेल बदल जाए ‘विर्क’ हो न पाए ख़बर। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मार्च 27, 2019

दिल है तो दिल बने, क्यों बनता पत्थर है

उनको भी पता है, मुझको भी ख़बर है 
मुहब्बत क्या है, बस एक दर्दे-जिगर है। 

ये नज़र मिली थी उनसे मुद्दतों पहले 
आज तक उस नशे का मुझ पर असर है। 

दिल का चैनो-सकूं लूटकर ले गया जो 
उसको हर जगह ढूँढ़ती मेरी नज़र है।

वो मन्दिर है या मस्जिद, सोचा नहीं कभी 
सबमें है ख़ुदा, ये सोचकर झुकाया सर है। 

क्यों बेचैन हो, किसलिए इतना परेशां 
तुम लूटो मज़ा, ये ज़िंदगी एक सफ़र है। 

धड़के तो सही ‘विर्क’, ये मचले तो सही
दिल है तो दिल बने, क्यों बनता पत्थर है। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मार्च 20, 2019

आँखों की आदत है, हुस्न को निहारना

यूँ तो हर पल चाहा है ख़ुद को सुधारना 
मगर ख़ुदा के हाथ है तक़दीर निखारना। 

हर शख़्स से इश्क़ तो नहीं होता, ये तो बस 
आँखों की आदत है, हुस्न को निहारना। 

आसार हैं क़यामत बरपने के, देखो
क्या रंग लाएगा, उनका ज़ुल्फ़ संवारना। 

चेहरे के हाव-भाव देख चुप रह गया मैं 
चाहा था दिलो-जां से तुझको पुकारना। 

कभी आसां तो कभी बड़ा मुश्किल लगे 
किसी को आँखों से दिल में उतारना। 

मैं सफल हुआ या नहीं, मुझे मालूम नहीं 
चाहा तो था ‘विर्क’ महबूब के हाथों हारना। 

दिलबागसिंह विर्क 
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