बुधवार, अगस्त 08, 2018

दिल में रहने वाले कब भुलाए जाते हैं

आँखें रोती हैं और ज़ख़्म मुसकराते हैं 
जाने वाले अक्सर बहुत याद आते हैं।

दिन में हमसफ़र बन जाती हैं तन्हाइयाँ 
और रातों को हमें उनके ख़्वाब सताते हैं।

ख़ुद की परछाई में दिखे सूरत उनकी 
दिल में रहने वाले कब भुलाए जाते हैं। 

जिन पर चले थे हम कभी मुसाफ़िर बनके 
यूँ लगे जैसे हमें वो रास्ते पास बुलाते हैं। 

शिकवा करने की हिम्मत भी नहीं होती 
कभी-कभी ख़ुद को इतना बेबस पाते हैं। 

कुछ ऐसी उलझी ज़िंदगी कि समझ न आए 
जीते हैं हम ‘विर्क’ या बस दिन बिताते हैं। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जुलाई 25, 2018

उनकी मर्ज़ी फ़ैसला-ए-अदालत हो गई

बिना कोई दलील सुने मेरी वफ़ा जहालत हो गई 
क़ाज़ी थे ख़ुद, उनकी मर्ज़ी फ़ैसला-ए-अदालत हो गई। 

मेरे हाथ की लकीरों में क्या लिख दिया ख़ुदा तूने 
यूँ बेसबब परेशान रहना मेरी आदत हो गई।

मुहब्बत के साए सिरों पर नहीं रहे अब किसी के 
अपनों के पहलू में भी नफ़रतों की तमाज़त हो गई। 

वहशियत की तरफ़दारी न करें लोग तो क्या करें 
शरीफ़ों के शहर में ही जब रुसवा शराफ़त हो गई। 

ये आदमी की इबादत करे, वो आदमी से सियासत 
हार जाएगा दिल, गर इसकी दिमाग़ से बग़ावत हो गई। 

यह सारा ज़माना ही ‘विर्क’ बेवफ़ाओं का है 
वो भी बेवफ़ा हुए तो कौन-सी क़ियामत हो गई। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जुलाई 18, 2018

कोई आग दिल में जलाए रखना

लहू जिगर का इसे पिलाए रखना 
कोई आग दिल में जलाए रखना।

हर ज़ख़्म ज़माने को दिखाते नहीं 
कुछ राज़ सीने में छुपाए रखना ।

बेचैनियों से बचना है तो बस 
हर पल ख़ुद को उलझाए रखना। 

नया ज़ख़्म खाना नहीं चाहते हो तो 
पुराने ज़ख़्मों को सहलाए रखना। 

ये ख़ुशियाँ तो कल साथ छोड़ देंगी 
ग़मों को अपना हमदम बनाए रखना। 

इंसानियत की मौत पर बहाने हैं 
विर्क’ चंद अश्क तुम बचाए रखना। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जुलाई 11, 2018

बेवफ़ाई तो है इस दौर का कमाल

मुहब्बत टूटने का न कर मलाल 
बेवफ़ाई तो है इस दौर का कमाल। 

बस रौशनी की ही अहमियत है 
कौन पूछता है चिराग़ाँ का हाल। 

अपने जज़्बातों को क़ैद न करना 
आने भी दो इन पर कोई उबाल। 

जिसको देखकर ज़माना वफ़ा करे 
तू ख़ुद बनकर दिखा वो मिसाल। 

सुना देंगे ये कोई नया बहाना
न करो इन लोगों से कोई सवाल। 

इसे सोचकर तुम ख़ुश हो लिया करो 
ये ख़ुशी तो है ‘विर्क’ एक हसीं ख़्याल।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जुलाई 04, 2018

मेरी आदतों में शुमार हो गया है, ये आँसू पीना

अब मुश्किल नहीं लगता मुझको घुट-घुटकर जीना 
मेरी आदतों में शुमार हो गया है, ये आँसू पीना ।

एक कसक और चंद हसीं यादें मेरे पास छोड़कर 
देखते-देखते हाथों से निकल गया वक़्त ज़रीना।

बुलंद हौसले कुछ नहीं करते गर कोई अपना न हो 
मौजों से दोस्ती क्या करेगी, जब दुश्मन हो सफ़ीना।

शायद इसीलिए लोग ज़माने के हैं नफ़रतपसंद 
नफ़रत तो है फ़िज़ा में और मुहब्बत है दफ़ीना ।

दौलतमंद होने के लिए तैयार हैं लहू बहाने को 
मगर कोई भी शख़्स नहीं चाहता बहाना पसीना। 

फ़र्क़ इसमें कुछ भी नहीं और बहुत ज्यादा भी है 
कोई कहे दिल पत्थर ‘विर्क’, कोई कहे दिल नगीना।

दिलबागसिंह विर्क
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