बुधवार, अक्तूबर 17, 2018

शिकवा नहीं किया करते ज़माने से

ख़ुशी मिलेगी, ख़ुशियाँ फैलाने से 
नहीं मिलती ये किसी को रुलाने से।

जैसे हो, वैसा ही मिलेगा मुक़ाम 
शिकवा नहीं किया करते ज़माने से। 

औरों को समझा सकते हो मगर 
ख़ुद को समझाओगे किस बहाने से। 

ग़लतियाँ तो ग़लतियाँ ही होती हैं 
हो गई हों भले ही अनजाने से। 

क्या अच्छा नहीं आदतें सुधार लेना 
या कुछ मिलेगा बुरा कहलाने से। 

करने को थे ‘विर्क’ और भी काम बहुत 
तुझे फ़ुर्सत न मिली ख़ुद को बहलाने से। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अक्तूबर 10, 2018

ऊँची इमारतों के बीच, मैं अपना घर ढूँढ़ता हूँ

जिसने चाहा था कभी मुझे, अब वो नज़र ढूँढ़ता हूँ
हर महफ़िल में अपना रूठा हुआ हमसफ़र ढूँढ़ता हूँ।  

यूँ तो हर मोड़ पर मिले हैं उससे भी हसीं लोग 
मगर उसके ही जैसा शख़्स मोतबर ढूँढ़ता हूँ। 

तमाज़ते-नफ़रत से झुलस रहे हैं मेरे दिलो-जां 
इससे बचने के लिए, चाहतों का शजर ढूँढ़ता हूँ। 

झूठे दिखावों के इस दौर में खो गया है कहीं 
ऊँची इमारतों के बीच, मैं अपना घर ढूँढ़ता हूँ। 

यहाँ तो लोग मुँह फेर लेते हैं हाल पूछने पर 
हँस-हँस कर गले मिलते थे जहाँ, वो शहर ढूँढ़ता हूँ। 

सुना है ‘विर्क’ अब इंसां, इंसां नहीं रहे, फिर भी 
ज़माने के सदफ़ में, इंसानीयत का गुहर ढूँढ़ता हूँ। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अक्तूबर 03, 2018

आग की मानिंद फैलती है यहाँ ख़बर


नहीं आता है मुझको जीना, झुकाकर नज़र
गर ख़ताबार हूँ मैं, तो काट डालो मेरा सर।

मुझ पर भारी पड़ी हैं मेरी लापरवाहियाँ
तिनका-तिनका करके गया आशियाना बिखर।

अपनी रुसवाई के चर्चे तुम कैसे समेटोगे
आग की मानिंद फैलती है यहाँ ख़बर।

वक़्त को देता हूँ मौक़ा कि तोड़ डाले मुझे
सीखना चाहता हूँ, टूटकर जुड़ने का हुनर।

सीख लो अभी से चलना चिलचिलाती धूप में
ग़म की वीरान राहों पर, मिलते नहीं शजर।

बताओ विर्ककिस ढंग से जीएँ ज़िंदगी
कभी हौसला ले डूबे तो कभी ले डूबे डर।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, सितंबर 26, 2018

दर्दमंद भी होता है, दिल अगर आवारा होता है

जैसे माँ को अपना बच्चा बहुत दुलारा होता है 
ऐसे ही अपनों का दिया हर ज़ख़्म प्यारा होता है। 

ये सच है, ये यादें जलाती हैं तन-मन को मगर 
तन्हाइयों में अक्सर इनका ही सहारा होता है। 

क़त्ल करने के बाद दामन पाक नहीं रहता इसलिए 
ख़ुद कुछ नहीं करता, सितमगर का इशारा होता है। 

ये बात और है, तोड़ दिया जाता है बेरहमी से 
दर्दमंद भी होता है, दिल अगर आवारा होता है। 

दूर तक देखने वाली नज़र क़रीब देखती ही नहीं 
कई बार अपने क़दमों के पास ही किनारा होता है। 

ख़ुदा का नाम ले, खाली पेट सो जाना आसमां तले 
इस बेदर्द दुनिया में ‘विर्क’ ऐसे भी गुज़ारा होता है।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, सितंबर 19, 2018

अनोखा अंदाज़े-बयां है उनके पास

घटा से गेसू, सुर्ख़ लब, नज़र कमां है उनके पास 
देखो तो मेरी मौत का सारा सामां है उनके पास। 

ताबिशे-आफ़ताब में रुख़सारों पर मोती-सा पसीना 
तुम भी नमूना देख लो, हुस्न रक़्साँ है उनके पास। 

चाँद हैं वो आसमां के, चकोरों की उन्हें कमी नहीं 
वो हैं सबसे दूर मगर, सारा जहां है उनके पास। 

ख़ामोश लब, झुकी नज़र, न हाथ ही करें कोई इशारा 
कहें मगर बहुत कुछ, अनोखा अंदाज़े-बयां है उनके पास। 

मालूम नहीं यह, हमसफ़र बन पाएगा उनका या नहीं 
अभी तक तो मेरा यह दिल भी मेहमां है उनके पास। 

ख़ुदा सदा ही सलामत रखे ‘विर्क’ उनके शबाब को 
हम दुआओं की मै डालें, कासा-ए-जां है उनके पास। 

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