बुधवार, मई 22, 2019

निभानी होगी हमें भी, वफ़ा की वही रीत फिर

तन्हा हूँ, उदास हूँ, जन्मेगा कोई गीत फिर 
बहुत याद आ रहा है, आज मुझे मेरा मीत फिर। 

बदनाम हो न जाए इश्क़ कहीं, मर मिटे थे लोग 
निभानी होगी हमें भी, वफ़ा की वही रीत फिर।

आदमियत पर मज़हबों को क़ुर्बान करके देखो 
वादियों में गूँजेगा, अमनो-चैन का संगीत फिर। 

ग़म के मौसम में ख़ुशबू फैलाएँ वो वस्ल के दिन 
उम्मीद है ज़िंदगी को रौशन करेगी प्रीत फिर। 

ग़म उठाना, सितम सहना, मगर सच को न छोड़ना 
अज़ल से हो रही है, ‘विर्क’ होगी सच की जीत फिर। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मई 08, 2019

कभी आँख रोई, कभी दिल जला


टूटता ही नहीं ग़मों का सिलसिला
बढ़ता ही जाए, ख़ुशियों से फ़ासिला।

मुक़द्दर ने दिया है ये तोहफ़ा मुझे
कभी आँख रोई, कभी दिल जला।

न दौलत चाही थी, न शौहरत मैंने
एक सकूं चाहा था, वो भी न मिला।

कुछ भी न हुआ उम्मीदों के मुताबिक़
आख़िर कब तक साथ देता हौसला।

हमारी दुआएँ हर बार ज़ाया गई
या ख़ुदा ! क्या ख़ूब रहा तेरा फ़ैसला।

देखना है विर्कअंजाम क्या होगा
मेरे भीतर उठ रहा है एक ज़लज़ला।

 दिलबागसिंह विर्क 
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रविवार, अप्रैल 21, 2019

हर बार हारा मैं, हर बार हाथ आई बेबसी

दरवाजे पर देकर दस्तक, लौटती रही ख़ुशी 
वाह-रे-वाह मेरी तक़दीर, तू भी ख़ूब रही। 

हालातों को बदलने की कोशिशें करता रहा 
हर बार हारा मैं, हर बार हाथ आई बेबसी। 

कभी किसी नतीजे पर पहुँचा गया न मुझसे 
अक्सर सोचता रहा, कहाँ ग़लत था, कहाँ सही। 

जिन मसलों ने उड़ाई हैं अमनो-चैन की चिंदियाँ 
उनमें कुछ मसले हैं नस्ली, बाक़ी बचे मज़हबी। 

आपसी रंजिशों ने दी है सदियों की गुलामी हमें 
भूल गए बीते वक़्त को, आग फिर लगी है वही। 

कुछ सुन लेना होंठों से, कुछ समझ लेना आँखों से 
ये दर्द भरी दास्तां, ‘विर्क’ कुछ कही, कुछ अनकही। 

दिलबागसिंह विर्क 

बुधवार, अप्रैल 10, 2019

देख कोशिशें हमारी, दूरियाँ मिटाने की

इश्क़ की राहों पर क़िस्मत आज़माने की 
बुरा क्या है, गर चाहत है तुझे पाने की। 

फ़ासिले कितने हैं दरम्यां, ये न देख 
देख कोशिशें हमारी, दूरियाँ मिटाने की। 

पास फटकने की हिम्मत न जुटा पाएँ ग़म 
आदत जिसे नग़्मे ख़ुशी के गुनगुनाने की। 

अपने हुनर को तराशते रहो, भले ही 
सबको नहीं मिलती इनायतें ज़माने की। 

समझना ही होगा हमें इस सच को 
हुआ करती हैं कुछ बातें भूल जाने की।

जाने ‘विर्क’ क्यों आदत बन गई है 
हर रोज़ नई आफ़त से टकराने की। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अप्रैल 03, 2019

जीना सीख रहा हूँ, दिल पर रखकर पत्थर

बड़ा ग़म उठाया है मैंने, दिल की बातें मानकर 
अब जीना सीख रहा हूँ, दिल पर रखकर पत्थर। 

बुरे दिन जब आते हैं, तब पता चलता है 
बदक़िस्मती क्या है, किसे कहते हैं मुक़द्दर। 

हालातों से हारकर चुप होना पड़ता है  
क्या करें, हर कोई नहीं होता सिकन्दर। 

इसके साथ जीने की आदत बना लो तुम 
लाइलाज होता है यारो, ये दर्दे-जिगर। 

बस कुछ ऐसे ही दस्तूर हैं इस दुनिया के 
डरने वालों को डराता चला जाता है डर।

ज़िंदगी की बिसात पर संभलकर चलना चाल 
कब खेल बदल जाए ‘विर्क’ हो न पाए ख़बर। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मार्च 27, 2019

दिल है तो दिल बने, क्यों बनता पत्थर है

उनको भी पता है, मुझको भी ख़बर है 
मुहब्बत क्या है, बस एक दर्दे-जिगर है। 

ये नज़र मिली थी उनसे मुद्दतों पहले 
आज तक उस नशे का मुझ पर असर है। 

दिल का चैनो-सकूं लूटकर ले गया जो 
उसको हर जगह ढूँढ़ती मेरी नज़र है।

वो मन्दिर है या मस्जिद, सोचा नहीं कभी 
सबमें है ख़ुदा, ये सोचकर झुकाया सर है। 

क्यों बेचैन हो, किसलिए इतना परेशां 
तुम लूटो मज़ा, ये ज़िंदगी एक सफ़र है। 

धड़के तो सही ‘विर्क’, ये मचले तो सही
दिल है तो दिल बने, क्यों बनता पत्थर है। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मार्च 20, 2019

आँखों की आदत है, हुस्न को निहारना

यूँ तो हर पल चाहा है ख़ुद को सुधारना 
मगर ख़ुदा के हाथ है तक़दीर निखारना। 

हर शख़्स से इश्क़ तो नहीं होता, ये तो बस 
आँखों की आदत है, हुस्न को निहारना। 

आसार हैं क़यामत बरपने के, देखो
क्या रंग लाएगा, उनका ज़ुल्फ़ संवारना। 

चेहरे के हाव-भाव देख चुप रह गया मैं 
चाहा था दिलो-जां से तुझको पुकारना। 

कभी आसां तो कभी बड़ा मुश्किल लगे 
किसी को आँखों से दिल में उतारना। 

मैं सफल हुआ या नहीं, मुझे मालूम नहीं 
चाहा तो था ‘विर्क’ महबूब के हाथों हारना। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मार्च 13, 2019

अब तो दिल बहला रखा है


चंद रोज़ की मुश्किल थी, अब तो दिल बहला रखा है
तेरे जाने के बाद ग़म को अपने पास बुला रखा है।

जैसे तू ही है मेरी बाँहों में, यूँ समझता हूँ
तेरी याद को कुछ ऐसे सीने से लगा रखा है।

मेरे दिल की हर धड़कन पर लिखा है तेरा नाम
इस बात को छोड़ दें तो मैंने तुझको भुला रखा है।

डर है वक़्त की हवा फिर से सुलगा न दे इसको
कहकर बेवफ़ा तुझे, मुहब्बत को राख में दबा रखा है।

ये तो नहीं कि कभी बेचैन नहीं होता दिल मेरा
मगर देकर वफ़ा का नशा, तूफ़ां को सुला रखा है।

दिल जलेगा, अश्क बहेंगे, चैन लुटेगा, लोग हँसेगे
न मुहब्बत का ज़िक्र छेड़ विर्क, इसमें क्या रखा है।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मार्च 06, 2019

बहलता नहीं दिल, किसी भी तरह बहलाने से

ख़्यालों की दुनिया में गुम, बेपरवाह इस ज़माने से 
मालूम नहीं हमें, क्यों हैं हम इस क़द्र दीवाने से। 

तुम्हीं बताओ आख़िर कौन-सा तरीक़ा अपनाएँ हम 
बहलता नहीं दिल, किसी भी तरह बहलाने से। 

थक-हार गए अपनी तरफ से कोशिशें करते-करते 
भुला देते तुम्हें, अगर भूल जाते तुम भुलाने से। 

मुहब्बत के ज़ख़्मों ने आसां कर दी है ज़िंदगी 
मज़बूत होता चला गया ये दिल, दर्द उठाने से। 

बड़ी खोखली है शरीफ़ चेहरों की शराफ़त फिर भी 
इसमें हर्ज नहीं, अगर कुछ हासिल हो आज़माने से। 

हर किसी को मालूम है, इस ज़िंदगी की हक़ीक़त 
कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला ‘विर्क’ तेरे बताने से। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, फ़रवरी 27, 2019

दाद देना जुगनुओं की हिम्मत को


अब क्या कहेंगे आप, इस आदत को
ग़लतियाँ ख़ुद की, कोसा क़िस्मत को।
 
तमाम चीजें बेलज़्ज़त हो गई
पाया जिसने इश्क़ की लज़्ज़त को।

ये एक दिन घर तुम्हारा जलाएगी
दोस्तो, न हवा देना इस नफ़रत को।

अपने वुजूद से फैलाएँ रौशनी
दाद देना जुगनुओं की हिम्मत को।

पत्थर पिघलाने की ताक़त है इसमें
आज़माना विर्ककभी मुहब्बत को।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जनवरी 30, 2019

दर्द ने फिर दस्तक दी है, दिल के दरवाजे पर

सदा आज़माते रहो, अपनी दुआओं का असर 
ख़ुदा की रहमत से, शायद कभी बदले मुक़द्दर। 

लोगों के पत्थर पूजने का सबब समझ आया 
जब से मेरा ख़ुदा हो गया है, वो एक पत्थर। 

साक़ी से कहना, वो अपना मैकदा खुला रखे 
दर्द ने फिर दस्तक दी है, दिल के दरवाजे पर। 

बेचैनियों, बेकरारियों का मौसम है यहाँ 
चैनो-सकूँ की मिलती नहीं, कहीं कोई ख़बर।

उम्र भर का रोग ले बैठोगे, एक पल की ख़ता से 
हसीं लुटेरों की बस्ती में, थाम के रखो दिल-जिगर। 

मुहब्बत के चमन में,चहके न ख़ुशियों की बुलबुल 
कौन सैयाद आ बैठा है, लगी है किसकी नज़र ? 

ख़ुद को मिटाने का जज़्बा भी होना ज़रूरी है 
आसां नहीं होता ‘विर्क’ इस चाहत का सफ़र।

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दिलबागसिंह विर्क  

बुधवार, जनवरी 23, 2019

अपने घर जलाए लोगों ने करके नफ़रत

ऐ दिल न डर बेमतलब, दिखा थोड़ी हिम्मत 
इश्क़ किया जिसने, वही जाने इसकी लज़्ज़त। 

वो सहमे-सहमे से हैं और हम बेचैन 
देखो, कैसे होगा अब इजहारे-मुहब्बत। 

फिर भी न जाने क्यों ये समझते ही नहीं 
अपने घर जलाए लोगों ने करके नफ़रत। 

क्यों रस्मो-रिवाजों को ले बैठते हो तुम 
दिल अगर करना चाहे किसी की इबादत। 

गर इंसानीयत जाग जाए हर इंसान में 
देखना, ज़मीं पर उतर आएगी जन्नत। 

ज़िंदगी का मज़ा लूटते हैं अक्सर वही लोग 
हल पल मुसकराना है ‘विर्क’ जिनकी आदत। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जनवरी 16, 2019

कोई गुनाह तो नहीं करते, गर मुहब्बत करते हो

डरना ख़ुदा से, गर इंसानीयत से बग़ावत करते हो 
ख़ुदा की इबादत है, गर इंसान की इबादत करते हो। 

आस्तीन के साँपों का भी ढूँढ़ना होगा इलाज तुम्हें 
सरहद पर खड़े होकर मुल्क की हिफ़ाज़त करते हो। 

बदल सकती है हर शै, गर चाहो तुम दिल से बदलना 
लोगों की देखा-देखी, क्यों किसी से हिकारत करते हो ? 

सोचो तो सही, क्या हो गया है तुम्हारी ज़मीर को 
कुर्सी के लिए तुम आदमी से सियासत करते हो। 

सच में क़ाबिले-तारीफ़ होगा आपका हौसला 
हैवानीयत के दौर में अगर शराफ़त करते हो। 

क्यों छुपाओ किसी से ‘विर्क’, क्यों बेमतलब डरो
कोई गुनाह तो नहीं करते, गर मुहब्बत करते हो। 

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दिलबागसिंह विर्क 

बुधवार, जनवरी 09, 2019

दिल का दर्द सुबहो-शाम पाया

मुहब्बत में कब आराम पाया 
दिल का दर्द सुबहो-शाम पाया। 

जितना ज्यादा सोचा है मैंने 
ख़ुद को उतना ही नाकाम पाया। 

मैं कौन हूँ तुम्हें भुलाने वाला 
हर धड़कन पर तेरा नाम पाया। 

मेरी वफ़ा ज़ाया तो नहीं गई 
अश्कों-आहों का इनाम पाया। 

क्या उम्मीद रखूँ, तेरे कूचों में
इश्क़ को बहुत बदनाम पाया। 

हुनर कम, लिखना ख़ता ज्यादा लगे
विर्क’ मैंने ये कैसा काम पाया। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जनवरी 02, 2019

ऐ ख़ुदा ! बता तो सही, अब तुझे क्या कहें

बताओ क्या करें, दर्द को कैसे दवा कहें 
कुछ हैरत नहीं अगर ज़िन्दगी को सज़ा कहें। 

मतलबपरस्त दुनिया में मक्कारी है, गद्दारी है 
रिश्तों में कुछ भी ऐसा नहीं, जिसे वफ़ा कहें। 

ज़मीं पर हो गई है, ख़ुदाओं की भरमार 
ऐ ख़ुदा ! बता तो सही, अब तुझे क्या कहें। 

समझ न आए, किसकी बात छेड़ें, छोड़ दें किसे 
सब एक से हैं, क्यों किसी को बेमतलब बुरा कहें। 

क़ातिल इरादों को वो रोज़ देता है अंजाम 
तुम्हीं बताओ, अब किस-किस को हादसा कहें। 

लोगों जैसे ही तुम हो, फिर गिला क्या करना 
यूँ तो सोचते हैं ‘विर्क’ हम तुझे बेवफ़ा कहें। 

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दिलबागसिंह विर्क 
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