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सोमवार, मई 05, 2014

कसम खाने को है या निभाने को है


ये दिल मचलकर बाहर आने को है
इसकी बेबसी मुझे रुलाने को है |

दुनिया ने छीन ली छत्त सिर से
और आसमां बिजली गिराने को है |

उलझ गया हूँ मैं, कोई बताए मुझे
कसम खाने को है या निभाने को है |

लापरवाहियाँ मैंने छोड़ी ही नहीं
तमाशबीन फिर आग लगाने को है |

अमन, ख़ुशी, प्यार की उम्मीदों का महल
दौर – ए - दहशत में चरमराने को है |

किसी को अब परवाह नहीं रही इसकी
वफ़ा का फूल ' विर्क ' मुरझाने को है |

मंगलवार, अप्रैल 29, 2014

उतारकर सब नग, मुहब्बत पहनो

तेरी याद छुपाकर सीने में
मजा आने लगा है जीने में |

मैकदे की तरफ भेजा जिसने
बुराई दिखती उसे पीने में |

हवाओं का रुख देखा न था
अब कसूर निकालो सफीने में |

रुतें बदलती हैं दिल को देखकर
आग लगे सावन के महीने में |

उतारकर सब नग, मुहब्बत पहनो
देखो दम कितना इस नगीने में |

जीने लायक सब कुछ है यहाँ पर
क्या ढूँढ रहे ' विर्क ' दफीने में |


रविवार, अप्रैल 27, 2014

ये दिल होता हुक्मरानों के पास नहीं

जले का ईलाज शम्अदानों के पास नहीं
गमों का हिसाब दीवानों के पास नहीं |

बेवफाई - बेहयाई ली बैठी है सबको
ख़ुशी की दौलत इंसानों के पास नहीं |

सकूं मिला तो मिलेगा अपनों के पास
न ढूंढो इसे, यह बेगानों के पास नहीं |

आशिकों के काम की चीज़ है, वहीं देखो
ये दिल होता हुक्मरानों के पास नहीं |

मुल्क बेचकर घर भरते रहते हैं अपना
शर्मो-हया सियासतदानों के पास नहीं |

छूट चुके हैं जो तीर, लगेंगे निशाने पर
कोई ईलाज अब कमानों के पास नहीं |

जिन्दगी की उलझनों में उलझते चले गए
इनका हल ' विर्क ' नादानों के पास नहीं |




शनिवार, अप्रैल 26, 2014

क्या वक्त साँचों मे ढलता है ?

वो बात - बात पर हँसता है
लोगों को पागल लगता है |

हो रहा ये अजूबा कैसे
आँधियों में चिराग जलता है |

सिकन्दर है वो, या कलंदर
जो दिल में आया करता है |

वक्त के साँचे में ढलते सब
क्या वक्त साँचों मे ढलता है ?

सुना तो है मगर देखा नहीं
पाप का ये घड़ा भरता है |

उसूलों की बात मत छेड़ो
यहाँ पर ' विर्क ' सब चलता है |



शुक्रवार, अप्रैल 25, 2014

बातचीत बहाल कर

दिल में कोई गलतफहमी है तो सवाल कर
तेरी महफ़िल में आया हूँ, कुछ तो ख्याल कर |

मिल बैठकर सुलझाएगा तो सुलझ जाएँगे मुद्दे
न लगा चुप का ताला , बातचीत बहाल कर |

सोच तो सही तेरे दर के सिवा कहाँ जाऊँगा
तेरा दीवाना हूँ , न मुझे यूँ बेहाल कर |

मैं पश्चाताप करूंगा बीते दिनों के लिए
अपनी गलतियों का तू भी मलाल कर |

कोशिश है मेरी ' विर्क ' तेरा साथ देने की
तोड़ दे नफरत की दीवार, आ ये कमाल कर

बुधवार, अप्रैल 23, 2014

जो तेरे साथ बीती जिन्दगी वही थी |

       
       प्यार भरे दिलों में दीवार उठी थी
       दूर हो गए हम, कैसी हवा चली थी |

       एक मोड़ पर आकर हाथ छूट गया
       भरी दोपहर में फिर शाम ढली थी |

       महफिल में आया जब भी नाम तेरा
       सीने में तब एक कसक उठी थी |

       हर बीता दिन गहरे जख्म दे गया
       दम तोडती रही जो आस बची थी |

       दिन तो अब भी कट रहे हैं किसी तरह
       जो तेरे साथ बीती जिन्दगी वही थी |

       बस यही सोचकर खुश हो रहे हैं हम
       जुदा होकर ' विर्क ' मिली तुझे ख़ुशी थी |

                              ******

बुधवार, दिसंबर 11, 2013

देख न लिबास साकिया

             
         ऊँची उड़ान चाहे मेरी आस साकिया 
         ये चोटियाँ बुला रही हैं पास साकिया |

         तू बार-बार ऐसे मेरा इम्तिहां न लें 
         कमतर नहीं किसी से मेरी प्यास साकिया |

         चखकर मिले सदा, यार इस इश्क का मजा 
         तू चूक जाएगा, लगा न कयास साकिया |

         सबको पिला रहा जाम, कुछ भी न पूछता 
         गम का न हो रहा तुझे अहसास साकिया |

         कुछ और ही निकलता है भीतर से आदमी 
         गहरा उतर यहाँ, देख न लिबास साकिया |

         देती सकून, ख़ाक उड़े जो तेरी गली 
         है ' विर्क ' के लिए तेरा दर ख़ास साकिया |

                             *******

शनिवार, सितंबर 14, 2013

हिंदी जुबान हूँ मैं

मीठी हिंदी जुबान हूँ मैं 
हिन्द देश की शान हूँ मैं । 

न भागो औरों के पीछे 
तुम्हारी पहचान हूँ मैं । 

संस्कृत की बेटी हूँ भले 
उर्दू से कब अनजान हूँ मैं । 

तुमसे मिलता है मान मुझे 
दिलाती तुम्हें मान हूँ मैं । 

देशी-विदेशी सबको समाया 
बनी शब्दों की खान हूँ मैं । 

फैलें सभी भाषाएँ मगर 
देश की धड़कन, जान हूँ मैं । 

मीठी हिंदी जुबान हूँ मैं 
हिन्द देश की शान हूँ मैं । 

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रविवार, सितंबर 01, 2013

एक नया जख्म खाया

         जज्बाती होना ये रंग है लाया
         दर्द का मर्ज मैंने दिल को लगाया ।

                  मेरी बेबसी का ये हाल है यारो
                  हँसने की कोशिश की जब, रोना आया

         सीखा रास्ते की हर ठोकर से मगर
         हर रोज हमने एक नया जख्म खाया ।

                 पीठ पीछे तालियाँ बजा रहा था वो
                 पास आकर जिसने अफसोस जताया ।

         उधेड़बुन में हाथ से निकले दोनों
         न दुनिया हुई मेरी, न सनम पाया ।

                 नफरतों का साज बज रहा साथ इसके
                 लोगों ने ये कैसा प्रेम गीत गाया ।

         इस दुनिया पे ऐतबार न करो ' विर्क '
         इसने अक्सर शिखर पर चढ़ाकर गिराया ।

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मंगलवार, जुलाई 16, 2013

पर्दा नहीं बना

यहाँ मिल जाएँगे हजारों स्थान तुम्हें छुपने के लिए
मगर कोई पर्दा नहीं बना गुनाहों को ढकने के लिए ।

कौन गिरता नहीं यहाँ, गिरकर उठना होता है मगर
बड़ी हिम्मत चाहिए खुद में, गिरकर उठने के लिए ।

मंदिर में सिर झुकाकर किसलिए इतना इतरा रहे हो
पहले खुद को मिटाना जरूरी होता है झुकने के लिए ।

तुझ पर ऐतबार न करना मुहब्बत की तौहीन होगी
मुझे पता है ये, तुम वादा करते हो मुकरने के लिए ।

कोई कल चला, कोई आज चला, किसी की बारी कल है
रहो तैयार ' विर्क ' कौन आया है यहाँ रुकने के लिए ।

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