सांझे संकलन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सांझे संकलन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, नवंबर 16, 2016

दिल की खबर रखना

भले ही तुम बरसों तक जारी अपना सफ़र रखना 
पीछे इंतज़ार है तुम्हारा, थोडा ख्याल इधर रखना |

कभी दुश्मन बनकर लूटें, कभी दोस्त बनकर लूटें 
बड़े शातिर हैं ये लोग, इन लोगों पर नज़र रखना | 

तुम्हारे पहलू में है भले मगर ये तुम्हारा न रहेगा 
हसीनों की महफिल में हो, दिल की खबर रखना

नफ़रत के दौर में माना मुहब्बत कुछ नहीं मगर
आँखों के सामने सदा मुहब्बत के मंजर रखना |

सुना है बहुत ताकतवर हो, कोई नहीं तुम-सा 
हो सके तो दिल में ख़ुदा का थोड़ा डर रखना |

भले हर रोज छू लिया करो शोहरतों के नए शिखर
थक हार कर लौटना होगा, ' विर्क ' अपना घर रखना |

दिलबागसिंह विर्क 
******
सांझा संग्रह - 100 क़दम 
सम्पादक - अंजू चौधरी, मुकेश सिन्हा  

बुधवार, नवंबर 09, 2016

दिल जलता है

बेबस होकर रोने के सिवा क्या मिलता है
हाले-दुनिया न सुना मुझको, दिल जलता है ।

देखना है तो बस इतना कि कब फटेगा ये
यूँ तो हर पल बगावत का लावा उबलता है ।

हालात बद से बदतर हुए हैं तो बस इसलिए
चलने देते हैं हम लोग, जो कुछ चलता है ।

बच्चों-सा मासूम है ये, हम-सा शातिर नहीं
मचलने भी दो इसको अगर दिल मचलता है ।

सितमगर की हुकूमत कब तक चलती रहेगी
आखिर वक़्त कभी-न-कभी रुख बदलता है ।

उसका शबाब कितना भी लाजवाब क्यों न हो
ये तो मुअय्यन है ' विर्क ' हर दिन ढलता है । 

दिलबागसिंह विर्क 
******
काव्य संग्रह - 100 क़दम 
संपादक - मुकेश सिन्हा, अंजू चौधरी 
******

बुधवार, अक्टूबर 26, 2016

कुछ हम बुरे, कुछ तुम बुरे

कुछ हम बुरे, कुछ तुम बुरे, कुछ यह जमाना बुरा 
शायद इसीलिए है यहाँ पर दिल लगाना बुरा | 

दुश्मनों की फेहरिस्त में लिख लिया मेरा नाम 
इसलिए अब लगे उनको मेरा मुस्कराना बुरा | 

तमाशबीन तो होते हैं लोग, गमख्वार नहीं 
हर किसी को अपना जख्मी दिल दुखाना बुरा | 

कहीं-न-कहीं उलझाए रखना है काम इसका 
न इसकी मानना, है ये दिल दीवाना बुरा | 

उम्मीदों का टूटना दिल से सहा नहीं जाता 
दोस्तों की दोस्ती को बार-बार आजमाना बुरा |

मेरे कहने से कब चीजों की अहमियत बदले 
मैं तो कहता हूँ ' विर्क ' मय बुरी, मैखाना बुरा | 

दिलबागसिंह विर्क 
******
साँझा संग्रह - 100 क़दम
संपादक - अंजू चौधरी, मुकेश सिन्हा

बुधवार, अक्टूबर 12, 2016

मैं इस बात को लेकर शर्मिंदा हूँ

लोग हों-न-हों, मैं इस बात को लेकर शर्मिंदा हूँ 
हैवानियत है जहाँ, मैं उस दौर का वाशिंदा हूँ | 

जमाने को बदल सकूं, ऐसी मेरी हैसियत नहीं 
खुद को बदलून कैसे, अपने उसूलों में बंधा हूँ | 

बस उसका वजूद ही दुश्मन है तीरगी का वरना 
आफताब कब कहे किसी को कि मैं ताबिंदा हूँ | 

खुदा ने तो लिखी थी परवाज मेरी किस्मत में 
वक्त ने काट दिए पर जिसके, मैं वो परिंदा हूँ |

बेबसी के दौर में जीने की तमन्ना तो नहीं मगर 
बुजदिली है ख़ुदकुशी ' विर्क ' बस इसलिए ज़िंदा हूँ | 

दिलबागसिंह विर्क 
******
सांझा-संग्रह - 100 क़दम 
संपादक - अंजू चौधरी, मुकेश सिन्हा 

बुधवार, अक्टूबर 05, 2016

खुदा है तो खुदा बन

हमारी दुआओं का हो नहीं रहा कुछ असर 
खुदा है तो खुदा बन, क्यों बनता है पत्थर |

महौले-दहशत कब तक रहेगा जिंदगी में 
बड़ा बेचैन हैं दिल, बड़ी परेशान है नजर | 

देकर सब कुछ, अब छीन रही खुशियाँ 
ऐ तकदीर, तू मुझसे ऐसा मजाक न कर | 

यहाँ मैं रहूँ वो जगह सराए से कम नहीं 
कीमत वसूल रही है दौलत, छीनकर घर | 

दौरे-दहशत में अब सूझता कुछ भी नहीं 
किस राह चलूँ मैं, कौन-सा है मेरा सफर |

बेबसी का अहसास तो ' विर्क ' उनसे पूछो 
समेटते-समेटते गया जिनका सब कुछ बिखर | 

दिलबाग सिंह विर्क 
******
सांझा संग्रह - 100 कदम  
प्रकाशक - हिन्द युग्म 
संपादक - अंजू चौधरी और मुकेश सिन्हा 

बुधवार, जनवरी 13, 2016

कोई कीमत नहीं

मंज़िल को पूछते हैं लोग, सफर की कोई कीमत नहीं 
इस जहां में नाकाम मुसाफिर की कोई कीमत नहीं । 

गिरने वालों को सहारा देना, नहीं दस्तूर यहाँ का 
जो छूटा पीछे, उस हमसफ़र की कोई कीमत नहीं । 

इस मतलबी दुनिया में चलते हैं फरेब के रिवाज 
दिल से की गई जो, उस कदर की कोई कीमत नहीं । 

दौलत के तराजू में जिसे चाहो उसी को तोल लो 
मगर चाहत से भरी किसी नज़र की कोई कीमत नहीं । 

बेवफाई से सजाकर दामन, मुस्कराते हैं लोग 
वफ़ा की बदौलत मिले दर्दे-जिगर की कोई कीमत नहीं । 

क्यों दिल लगाया था ' विर्क ' नफरतपसन्दों की दुनिया में 
क्या खबर न थी, मुहब्बत के शजर की कोई कीमत नहीं । 

दिलबागसिंह विर्क 
*******
हरियाणा प्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्मेलन, सिरसा की तरफ से संपादित कृति " सिरसा जनपद की काव्य सम्पदा " में से 


बुधवार, दिसंबर 02, 2015

प्रीत की रीत

चाहत पर होना कुर्बान, प्रीत की रीत है 
इस खेल का हाल अनोखा, हार तो जीत है । 
आँख शरारत करती है 
और सज़ा दिल पाता है 
देता मक़सद जीने का 
पर पागल कहलाता है 
पागल की सुन यार मेरे, यही तो मीत है

दौलत के अंबार लगे 
ख़ुशी रही बनकर सपना 
मतलब के हैं यार बहुत 
नहीं मगर कोई अपना 
हिसाब लगाओ तुम उसका, गई जो बीत है 

दिल सोचे बस प्यारे को 
सूखा हो चाहे सावन 
देह से न जोड़ो इसको 
प्यार सदा होता पावन 
नाचो संग ताल मिलाकर, प्रेम संगीत है 

© दिलबागसिंह विर्क 
****** 

बुधवार, अगस्त 12, 2015

तू मुझको सुन

मेरे अल्फ़ाज़ों पर न जा, तू मुझको सुन 
सच का तराना गाए सदा, धड़कन की धुन । 
आँसुओं में लय-ताल है 
हँसी का भी संगीत है 
ग़म मिले या फिर ख़ुशी 
गाया सदा गीत है 
जज़्बात होंगे, न हों भले बह्र के रुकुन 
मेरे अल्फ़ाज़ों पर न जा, तू मुझको सुन । 
तू जीत पर रख नज़र 
हार से मत हारना 
ज़िंदगी का ले मज़ा 
नहीं ख़ुद को मारना 
काँटों की चुभन सह ले, और फूल चुन 
मेरे अल्फ़ाज़ों पर न जा, तू मुझको सुन । 
बीते पल न लौटते 
बीता वक़्त भूल जा 
तू कर शुरुआत नई 
लेकर इरादा नया 
सोच बात नई उड़ान की, नए ख्बाव बुन 
मेरे अल्फ़ाज़ों पर न जा, तू मुझको सुन । 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " से 

बुधवार, जुलाई 29, 2015

मैं तुझे गुनगुनाता हूँ

साँस नहीं लेता, मैं तुझे अर्घ्य चढ़ाता हूँ 
गीत नहीं गाता, मैं तुझे गुनगुनाता हूँ । 
     फूलों में तू है 
          बूंदों में तू है 
               तेरी है धरती 
                    तेरा है नभ भी 
ज़र्रे-ज़र्रे में तेरा वजूद पाता हूँ 
गीत नहीं गाता, मैं तुझे गुनगुनाता हूँ ।
     सुख-दुःख आते हैं 
              आकर जाते हैं 
                   ठहरा कब कुछ है 
                          तेरा सब कुछ है 
जीवन जो पाया, उसकी ख़ुशी मनाता हूँ 
गीत नहीं गाता, मैं तुझे गुनगुनाता हूँ । 
      मैं हूँ दीवाना 
             जैसे परवाना 
                    जलना आदत है 
                           इश्क़ बुरी लत है 
फूला न समाऊँ, जब तेरा कहलाता हूँ 
गीत नहीं गाता, मैं तुझे गुनगुनाता हूँ । 

                    दिलबाग विर्क 
                     *********
मेरे और कृष्ण कायर द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " में से  

बुधवार, जुलाई 22, 2015

कसक, जलन, गम का मौसम न गया

दिखते हैं यहाँ पर हमदम बहुत 
मगर देते हैं लोग जख्म बहुत | 
दिखाकर ख़ुशी की झलक अक्सर 
दिए हैं इस ज़िन्दगी ने गम बहुत | 

वो बेवफ़ा था, चला गया छोड़कर 
फिर भी उसके लिए रोए हम बहुत | 

हम सलामत हैं, ये अजूबा है 
करने वाले ने किए थे सितम बहुत | 

कसक, जलन, गम का मौसम न गया 
आए और चले गए मौसम बहुत | 

मुकद्दर से ' विर्क ' कब तक लड़ता 
इस राह में थे पेचो - ख़म बहुत | 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " से 

बुधवार, जुलाई 08, 2015

ग़म का दरवान

कोई अजूबा तो नहीं, न हो बेमतलब हैरान 
इश्क़ के सिर पर होता है हिज्र का आसमान । 
पहलू में बैठा हो महबूब और फ़ुर्सत भी हो 
कभी-कभार होती है ज़िंदगी इतनी मेहरबान । 

शायद ख़ुदा देखना चाहता है हौंसला मेरा 
ख़ुशियों के दरवाजे पर मिले ग़म का दरवान । 

तन्हाई को मेरे पास फटकने ही नहीं दिया 
किया तेरी याद ने मुझ पर कितना बड़ा अहसान । 

किसी मुजरिम की तरह कटघरे में खड़े रहे 
और हमारी किस्मत हमें सुनाती रही फ़रमान । 

फ़रेब हैं यहाँ का हुनर, फ़रेब ही यहाँ का दस्तूर 
तुम भी सजा लेना ' विर्क ' कोई फ़रेब की दुकान । 

दिलबाग विर्क 
*****

मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज्बात " से 

बुधवार, जुलाई 01, 2015

इतनी हल्की मेरी चाहत नहीं

माना तुझे अब मुझसे उल्फ़त नहीं 
फिर भी मैं कर सकता नफ़रत नहीं । 
तेरा चेहरा खिला रहे सदा ही 
इसके सिवा कोई भी हसरत नहीं । 

बदले में माँगे तुझसे क़ीमत 
इतनी हल्की मेरी चाहत नहीं । 

बेहतर है, खुद ही संभलकर रहें 
लोगों को किसी की मुरव्वत नहीं । 

तेरे ग़म में इतना उलझा हूँ मैं 
तुझे सोचने तक की फ़ुर्सत नहीं । 

मेरी वफ़ा ' विर्क ' मेरा साथ छोड़े 
होगी इससे बढ़कर क़यामत नहीं । 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " से 


बुधवार, जून 24, 2015

पत्थरों में ख़ुदा पाना है

इस दिल का दर्द क्या तूने कभी जाना है 
बेचैन है ये , तन्हा है , दीवाना है | 

मुहब्बत गुजरे ऐसी कैफ़ियत से अक्सर 
एक तरफ महबूब, दूसरी तरफ जमाना है | 
इबादत में हर्फ़ दुई का न आने देना 
अगर तुम्हें पत्थरों में ख़ुदा पाना है | 

तमन्ना है मुहब्बत का मुक़ाम पाने की 
इसके लिए ज़िंदगी को दाँव पर लगाना है 

बड़ी बेसब्री से है इंतज़ार उनका 
उनसे कुछ सुनना, उन्हें कुछ सुनाना है | 

मक़सद जीने का पाने के लिए ' विर्क ' हमें 
किसी का होना, किसी को अपना बनाना है |

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " से  

बुधवार, जून 17, 2015

रोग बड़ा पुराना हो गया

धड़कने हुई उधार जब से दिल दीवाना हो गया 
ज़िंदगी के नाम फिर ग़म का फ़साना हो गया । 

पहले सौग़ात समझते रहे मुहब्बत की मर्ज़ को 
अब क्या होगा इलाज, रोग बड़ा पुराना हो गया । 
ख़ुद को बचाने की मैंने की थी बड़ी ही कोशिश 
क्या करें, उनका हर अंदाज़ क़ातिलाना हो गया । 

कितनी नाज़ुक लड़ी से बंधे थे रिश्तों के मोती 
कल तक जो अपना था, वो आज बेगाना हो गया । 

यूँ तो रोज़ आसमां पर सजती है रात चाँदनी 
मगर दिल का चाँद देखे एक ज़माना हो गया । 

उन्होंने बेवफ़ा दिल के इरादों को दिया अंजाम 
और मज़बूरियों का क्या ख़ूब बहाना हो गया । 

' विर्क ' मेरा नसीब भी बेचारा अब क्या करता 
बिजलियों की शाख़ पर जब आशियाना हो गया । 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज्बात " से 

बुधवार, जून 10, 2015

दिल दिल था, क़िला नहीं

मुहब्बत की थी जिस पत्थर से, उस से गिला नहीं 
इस उजड़े हुए चमन में फूल ख़ुशी का खिला नहीं । 

एक-सा ही दौर गुजर रहा है कई मुद्द्तों से 
यहाँ पतझड़ और बहार में कोई फ़ासिला नहीं । 
खंडहर बना दिया है बेवफ़ाई के नश्तरों ने 
टूटना तो था ही इसे, दिल दिल था, क़िला नहीं । 

खाकर ठोकरे ज़माने की भीड़ से जुदा हो गए 
ग़म में तन्हा ही चले हैं, संग कोई क़ाफ़िला नहीं । 

शायद सफ़र ही है फ़साना मेरी ज़िंदगी का 
चाहा जिस किसी साहिल को, वो मुझे मिला नहीं । 

' विर्क ' किस पर लगाऊँ इल्ज़ाम मैं ख़स्तादिली का 
ये ग़ुरबत है नसीब की, मुहब्बत का सिला नहीं । 

दिलबाग विर्क 
*****

मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " में से 

बुधवार, मई 20, 2015

ये ज़िंदगी तल्ख़ दोपहर साक़ी

तेरे पास गर मय नहीं तो पिला दे ज़हर साक़ी 
बिन पिए लगे है ये ज़िंदगी तल्ख़ दोपहर साक़ी । 

ग़म का इलाज ढूँढ़ने आना पड़ता है पास तेरे 
क्या करें लोग, मंदिर नहीं होता सबका घर साक़ी । 

 फिर बताओ, क्यों न उड़ेंगी चैनो-सकूं की चिन्दियाँ 
हावी है दिलो-दिमाग पर कोई-न-कोई डर साक़ी । 

ये कैसे दस्तूर हैं ज़िंदगी के, बस ख़ुदा ही जाने 
शबे-ग़म के बाद होती नहीं ख़ुशियों की सहर साक़ी । 

दुआएँ बेअसर रहें, अनकिए गुनाहों की सज़ा मिले 
पता नहीं पत्थर है ख़ुदा या ख़ुदा है पत्थर साक़ी । 

जीने की चाह में ' विर्क ' रोज़ मरना पड़ता है 
ये हाल यहाँ, होगी तुझे भी इसकी ख़बर साक़ी । 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित " सतरंगे जज़्बात " से 

बुधवार, मई 13, 2015

इस दिल दीवाने का क्या करें

अगर मुहब्बत की राह पर चला करें 
तो रफ़्ता-रफ़्ता मंज़िल की ओर बढ़ा करें । 

दग़ाबाज़ी हमारी हमें ले डूबेगी 
अभी भी वक़्त है, संभल जाएँ, वफ़ा करें । 

ज़िंदगी का दूसरा रुख दिखाई देगा 
ठंडे दिमाग से दूसरों की सुना करें । 

हालातों की ख़स्तगी कम होती नहीं 
आओ यारो मिलकर कोई दुआ करें । 

दुश्वारियाँ रास्ते की आसां हो जाएँ 
काश ! हम तूफ़ानों की सूरत उठा करें । 

जिसे चाहे बस उसी को ख़ुदा माने 
बता इस दिल दीवाने का क्या करें । 

देखना ' विर्क ' कहीं नासूर न बन जाएँ 
इन मुहब्बत के जख़्मों की दवा करें । 

दिलबाग विर्क 
*****

मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " से 

बुधवार, मई 06, 2015

शतरंज की बिसात

काबू में रखे न गए मुझसे अपने जज़्बात 
मैं बन गया लोगों के लिए शतरंज की बिसात । 

दिल के आसमां पर घिरे हैं ग़म के बादल 
हो उदासी की उमस, कभी अश्कों की बरसात । 

मेरा बोलना क्यों इतना बुरा हो गया है 
क्यों तकरार का मुद्दा बन जाती हर बात । 

मुक़द्दर से शिकवा करने के सिवा क्या करें 
हमारी कोशिशें भी जब बदल न पाई हालात । 

टूटे दिल के लिए बे'मानी हैं ये सब बातें 
कितना रौशन है दिन, कितनी अँधेरी है रात । 

खुशियाँ ' विर्क ' कैसे नसीब होती मुझको 
ज़िंदगी ने दी है परेशानियों की सौग़ात । 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत द्वारा संपादित " सतरंगे जज़्बात " में से 

बुधवार, अप्रैल 29, 2015

हर शख़्स हो गुनहगार

अहमियत नहीं रखते पतझड़, बारिश और बहार 
गर दिल ख़ुश हो तो लगता हर मौसम ख़ुशगवार । 

छलकती आँखें, रोता दिल जाने क्या कहना चाहे 
शायद इन्हें पता न था, किस शै का नाम है प्यार । 

दिल को बेसबब परेशां देखकर सोचता हूँ मैं 
तुम्हीं तो नहीं हो, दिल में मची हलचल के जिम्मेदार । 

तुझसे दूरियाँ किसी क़यामत से कम नहीं लगती 
हर लम्हा आफ़त, हर लम्हा करे दिल बेकरार । 

समझे नहीं, जाने वाले की भी मज़बूरी होगी 
जब भी आई है याद मुझे, तड़पा है दिल हर बार । 

नफ़रतों की इस दुनिया में मुहब्बत करना गुनाह 
ख़ुदा करे ' विर्क ' दुनिया का हर शख़्स हो गुनहगार । 

दिलबाग विर्क 
******

मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " में से मेरी एक ग़ज़लनुमा कविता 

बुधवार, अप्रैल 15, 2015

दोस्तों के हाथ में खंजर मिला

धूप-छाँव-सा रंग बदलता मुकद्दर मिला 
ख़ुशी मिली, ख़ुशी के खो जाने का डर मिला । 
दुश्मनों से मुकाबिले की सोचते रहे हम 
और इधर दोस्तों के हाथ में खंजर मिला । 

यूँ तो की है तरक्की मेरे मुल्क ने बहुत 
मगर सोच में डूबा हर गाँव, हर शहर मिला । 

नज़रों ने दिया है किस क़द्र धोखा मुझे 
चाँद-सा चेहरा उनका, दिल पत्थर मिला । 

हालातों की क्या कहें, बद से बदतर मिले 
ऊपर से बेग़ैरत, बेवफ़ा बशर मिला । 

किसी मंज़िल पर पहुँचना नसीब में न था 
और चलने को 'विर्क' रोज़ नया सफ़र मिला । 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " से 
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...