बुधवार, दिसंबर 26, 2018

बीती ज़िंदगी नाम मेरे, एक फ़साना कर गई

ग़म का अज़ीज़, ख़ुशी से बेगाना कर गई 
तेरी चाहत हमें इस क़द्र दीवाना कर गई। 

न दिल को तसल्ली दे सके, न गिला कर सके 
तेरी ही तरह बहार भी, मुझसे बहाना कर गई। 

चाहकर भी आज़ाद हो न पाएँगे उसके असर से 
बीती ज़िंदगी नाम मेरे, एक फ़साना कर गई। 

टुकड़े-टुकड़े हुआ दिल, रोए हम लहू के आँसू 
तेरी याद ये वारदात वहशियाना कर गई। 

मेरी वफ़ा ने देखो, किया है ये कैसा सलूक 
आफ़तों की शाख पर मेरा आशियाना कर गई। 

मुहब्बत की ख़ुशबू ऐसी फैली है ज़िंदगी में 
अंदाज़ मेरा ‘विर्क’ ये शायराना कर गई। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, दिसंबर 19, 2018

कभी सोचा नहीं

कितना लंबा वफ़ा का रास्ता, कभी सोचा नहीं 
ज़ख़्म खाकर क्यों चलता रहा, कभी सोचा नहीं। 

दिल को चुप कराने के लिए तुझे बेवफ़ा कहा 
तू बेवफ़ा था या बा-वफ़ा, कभी सोचा नहीं। 

तेरी ख़ुशी माँगी है मैंने ख़ुदा से सुबहो-शाम 
असर किया कि ज़ाया गई दुआ, कभी सोचा नहीं। 

मुहब्बत की राह पर एक बार चलने के बाद 
क्या-क्या पीछे छूटता गया, कभी सोचा नहीं। 

गवारा नहीं ‘विर्क’ सितमगर के आगे झुकना 
कब तक साथ देगा हौसला, कभी सोचा नहीं। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, दिसंबर 12, 2018

असर करती दुआ क्यों नहीं

बेवफ़ा तेरी याद, तेरी तरह बेवफ़ा क्यों नहीं 
जैसे तूने किया, वैसे ये करती दग़ा क्यों नहीं ?

दर्द को हमदम बनाकर जीना क्यों चाहा मैंने
क्या बेबसी थी, मिली ज़ख़्मों की दवा क्यों नहीं ?

इंसाफ़ की देवी के हाथ में तराज़ू, आँख पर पट्टी 
ऐसे में गुनहगारों को मिलती सज़ा क्यों नहीं ?

आदमी से नाराज़ है या पत्थर हो गया है ख़ुदा 
ऐसी कौन-सी वजह है, असर करती दुआ क्यों नहीं ?

ज़ुल्मों-सितम को मिटाना ही है जब काम उसका, फिर
दहशत के इस दौर में ज़मीं पर उतरा ख़ुदा क्यों नहीं ?

वो क्यों हुए बेवफ़ा, ये पूछने का हक़ नहीं तुझे 
तू ख़ुद से पूछ ‘विर्क’ तूने छोड़ी वफ़ा क्यों नहीं ?

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, दिसंबर 05, 2018

आँखों के मैख़ाने से पिला दे जाम साक़िया


आँखों के मैख़ाने से पिला दे जाम साक़िया
मैंने कर दी है ज़िंदगी तेरे नाम साक़िया।

तू बदनाम लूटने के लिए, मैं लुटने आया हूँ
मेरी वफ़ा कब माँगे, कोई इनाम साक़िया।

दुनियादारी निभाना या फिर मुहब्बत ही करना
लग ही जाएगा कोई-न-कोई इल्ज़ाम साक़िया।

दिन की ख़ताएँ मज़ा किरकिरा कर देती हैं वरना
सुहानी होती है, ज़िंदगी की हर शाम साक़िया।

लोगों को देखकर संगदिल बनना तो ठीक नहीं
तू बाँटता रह ख़ुशियाँ, यही तेरा काम साक़िया।

पागल दुनिया वाले विर्कनफ़रतों में जी रहे हैं
देना ही होगा तुझको मुहब्बत का पैग़ाम साक़िया।

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दिलबागसिंह विर्क
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