बुधवार, नवंबर 14, 2018

मेरे ख़्यालों, मेरे ख़्वाबों का मालिक तू है


कभी तुझे याद करता हूँ, कभी तुझे भूलता हूँ
ये न पूछ मुझसे, मैं कितना परेशां हुआ हूँ।

मेरे ख़्यालों, मेरे ख़्वाबों का मालिक तू है
मेरा वुजूद कहाँ है, अक्सर यही सोचता हूँ।

दीवानगी इसकी न जाने कितना रुसवा करेगी
मानता ही नहीं ये, इस दिल को बहुत रोकता हूँ।

लफ़्ज़ों के मानी बदल जाते हैं सुनते-सुनते
इसी डर से मैं कमोबेश ख़ामोश रहा हूँ ।

पत्थरों के पूजने पर मुझे कोई एतराज नहीं
मगर इससे पहले मैं संगतराश को पूजता हूँ।

दूरियाँ-नजदीकियाँ विर्ककोई मुद्दा नहीं होती
कल भी चाहता था तुझे, मैं आज भी चाहता हूँ।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, नवंबर 07, 2018

प्यार को इबादत, महबूब को ख़ुदा कहें

क्यों हम इस ख़ूबसूरत ज़िंदगी को सज़ा कहें 
आओ प्यार को इबादत, महबूब को ख़ुदा कहें। 

मुझे मालूम नहीं, किस शै का नाम है वफ़ा
तूने जो भी किया, हम तो उसी को वफ़ा कहें। 

ख़ुद को मिटाना होता है प्यार पाने के लिए 
राहे-इश्क़ के बारे में बता और क्या कहें। 

मुश्किलों को देखकर माथे पर शिकन क्यों है 
हम ज़ख़्मों को इनायत, कसक को दवा कहें।

ख़ुद को बदलो, लोगों की फ़ितरत बदलेगी नहीं 
चलो ज़माने से मिली हर बद्दुआ को दुआ कहें। 

माना तुझसे ‘विर्क’ निभाई न गई क़समें मगर 
तुझे महबूब कहा था, अब कैसे बेवफ़ा कहें।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अक्तूबर 31, 2018

दूर तक नज़र नहीं आता किनारा

कुछ इस क़द्र गर्दिश में है मेरा सितारा 
कहीं दूर तक नज़र नहीं आता किनारा। 

उन्हें गवारा नहीं मेरी हाज़िरजवाबी 
मुझे ख़ामोश रहना, नहीं है गवारा।

अपने हुनर की दाद पाना चाहता होगा 
तभी ख़ुदा ने चाँद को ज़मीं पर उतारा। 

बस अपनी मुलाक़ात हो नहीं पाती वरना 
गैरों से रोज़ पूछता हूँ, मैं हाल तुम्हारा। 

बीच रास्ते में कहीं साथ छोड़ देता है ये 
क़दमों के साथ घर न आए, दिल आवारा। 

फ़र्ज़ानों की नज़र में तो दीवाना ही हूँ मैं 
कौन पागल है ‘विर्क’, जिसने मुझे पुकारा।  

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अक्तूबर 24, 2018

फीका-फीका लगे चाँद का शबाब

जब से देखी है तेरे चेहरे की तबो-ताब
फीका-फीका लगे तब से चाँद का शबाब। 

ये तन्हाइयाँ, ये दूरियाँ अब गवारा नहीं इसे 
क्या बताएँ तुम्हें, ये दिल है कितना बेताब।  

किताबे-इश्क़ पढ़ने का हुआ है ये असर 
आते हैं अब हमें तो बस तेरे ही ख़्वाब। 

कितना चाहते हैं तुम्हें, ये क्या पूछा तूने 
ऐ पागल, गर चाहत है तो होगी बेहिसाब। 

दिल में वफ़ा, आँखों में गै़रत होना ज़रूरी है 
कुछ भी अहमियत नहीं रखता कोई ख़िताब। 

हर सू फैला देना ‘विर्क’ मुहब्बत की ख़ुशबू 
देखना फिर आ जाएगा, ख़ुद-ब-ख़ुद इंकलाब।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अक्तूबर 17, 2018

शिकवा नहीं किया करते ज़माने से

ख़ुशी मिलेगी, ख़ुशियाँ फैलाने से 
नहीं मिलती ये किसी को रुलाने से।

जैसे हो, वैसा ही मिलेगा मुक़ाम 
शिकवा नहीं किया करते ज़माने से। 

औरों को समझा सकते हो मगर 
ख़ुद को समझाओगे किस बहाने से। 

ग़लतियाँ तो ग़लतियाँ ही होती हैं 
हो गई हों भले ही अनजाने से। 

क्या अच्छा नहीं आदतें सुधार लेना 
या कुछ मिलेगा बुरा कहलाने से। 

करने को थे ‘विर्क’ और भी काम बहुत 
तुझे फ़ुर्सत न मिली ख़ुद को बहलाने से। 

दिलबागसिंह विर्क 
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