बुधवार, नवंबर 20, 2019

मैं ख़ुद को सोचना चाहता हूँ तन्हा रहकर

ज़मीर को मारकर, क्या करोगे ज़िंदा रहकर 
न कभी ख़ामोश रहना, ज़ुल्मो-सितम सहकर।

अक्सर कमजोरी बन जाती है सकूं की ख़्वाहिश 
ज़िंदगी का मज़ा लूटो, बहाव के उल्ट बहकर। 

महबूब को बुरा कहने की हिम्मत नहीं होती 
मैं ख़ुद अच्छा होना नहीं चाहता, झूठ कहकर। 

अपनी यादों को तुम बुला लेना अपने पास 
मैं ख़ुद को सोचना चाहता हूँ तन्हा रहकर। 

मुहब्बत इबादत है ‘विर्क’, बस इतना कहना है 
वक़्त ज़ाया नहीं करना चाहता कुछ और कहकर। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, नवंबर 13, 2019

बड़ा महँगा पड़ा मुझे दोस्त बनाना

किसे अपना कहें हम, किसे बेगाना 
मुहब्बत का दुश्मन है सारा ज़माना। 

उसने सीखे नहीं इस दुनिया के हुनर 
चाँद को न आया अपना दाग़ छुपाना। 

मरहम की बजाए नमक छिड़का उसने 
जिस शख़्स को था मैंने हमदम माना।

गम ख़ुद-ब-ख़ुद दौड़े चले आए पास 
हमने चाहा जब भी ख़ुशी को बुलाना। 

देखो, दुश्मनी खरीद लाया हूँ मैं 
बड़ा महँगा पड़ा मुझे दोस्त बनाना। 

कमजोरियां, लापरवाहियाँ, बुराइयाँ 
हुई जगजाहिर, न आया मुझे छुपाना। 

मैं तो अक्सर हारा हूँ ‘विर्क’ इससे 
आसां नहीं, पागल दिल को समझाना। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अक्तूबर 30, 2019

रूठ गए हैं सब नज़ारे, क्या करें ?

गर्दिश में हैं आजकल सितारे, क्या करें ?
हमें धोखा दे गए सब सहारे, क्या करें ?

कौन चाहता है, सबसे अलग-थलग पड़ना 
क़िस्मत ने कर दिया किनारे, क्या करें ?

ख़ुद से ज्यादा एतबार था हमें उन पर 
बेवफ़ा निकले दोस्त हमारे, क्या करें ?

लापरवाही थी, जीतने की न सोचना 
जब अपने हाथों ही हैं हारे, क्या करें ?

बहारें नसीब नहीं होती यहाँ सबको 
रूठ गए हैं सब नज़ारे, क्या करें ?

माना ‘विर्क’ उसने मेरा नहीं होना 
दिल बार-बार उसको पुकारे, क्या करें ?

बुधवार, अक्तूबर 23, 2019

शायद उसके पास दिल न था

मैं क़ाबिल न था या मेरा प्यार क़ाबिल न था 
तुझे पाना क्यों मेरी क़िस्मत में शामिल न था। 

इश्क़ के दरिया में, हमें तो बस मझधार मिले 
थक-हार गए तलाश में, दूर-दूर तक साहिल न था। 

हैरान हुआ हूँ हर बार अपना मुक़द्दर देखकर
ग़फ़लतें होती ही रही, यूँ तो मैं ग़ाफ़िल न था। 

मेरे अरमानों, मेरे जज़्बातों की क़द्र न की कभी 
गिला क्या करना, शायद उसके पास दिल न था। 

ये बात और है कि वो कर गया क़त्ल वफ़ा का 
कैसे यकीं न करता, वो हमदम था, क़ातिल न था।

वो तो यूँ ही डर गया ‘विर्क’ दुश्वारियाँ देखकर 
जितना समझा, वफ़ा निभाना उतना मुश्किल न था। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अक्तूबर 16, 2019

दिल की भी एक ज़ुबान है

पूरी कायनात हैरान है 
तू आज मेरा मेहमान है। 

वस्ल की यादें, प्यार की ख़ुशबू 
ख़ुशियों का सारा सामान है। 

कैसे याद रहा तुझे वर्षों तक 
इस गली में मेरा मकान है। 

इसे बेज़ुबां न समझो लोगो 
दिल की भी एक ज़ुबान है। 

दुआएँ असर करती हैं आख़िर 
या रब ! तू कितना मेहरबान है। 

आवारा दिल को दिया मक़सद 
मुझ पर ‘विर्क’ तेरा एहसान है।

दिलबागसिंह विर्क 
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