मंगलवार, नवंबर 14, 2017

कब तक डराएगा, तेरे बिना जीने का डर

मुझे ख़ुदा न समझना, कहा था मैंने मगर 
तूने पागल समझा मुझे, किसके कहने पर।

मुझ पर अब ज़रा-सा यक़ीं नहीं रहा तुझको
क्या इससे बढ़कर होगा क़ियामत का क़हर।

बस ये ही बेताब हैं गले मिलने को वरना 
नदियों का इंतज़ार कब करता है सागर।

बेवफ़ाई आबे-हयात है तो, हो मुबारक तुझे 
मुझे तो मंज़ूर है, पीना वफ़ा का ज़हर।

इसका इलाज तो ढूँढना ही होगा, आख़िर
कब तक डराएगा, तेरे बिना जीने का डर।

तेरी असलियत को जानती है सारी दुनिया 
विर्क’ यूँ ही अच्छा बनने की कोशिश न कर।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, नवंबर 08, 2017

धड़कनों को धड़कने का ये बहाना हो गया

तेरी चाहत में ख़ुद से बेगाना हो गया 
न जाने क्यों मैं इस क़द्र दीवाना हो गया।

सब कोशिशें नाकाफ़ी रही इसे रोकने की 
शमा जो जलती देखी, दिल परवाना हो गया।

तुझे याद न किया तो इल्ज़ाम आएगा वफ़ा पर 
धड़कनों को धड़कने का ये बहाना हो गया।

मुहब्बत कब रास आई है नफ़रतपसंदों को 
फिर क्या हुआ गर दुश्मन ये ज़माना हो गया।

राहे-इश्क़ में ख़ुशियाँ नहीं मिली तो न सही 
अपना तो ‘विर्क’ ग़म से याराना हो गया। 

दिलबागसिंह विर्क
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बुधवार, नवंबर 01, 2017

ख़ुशी की दौलत इंसानों के पास नहीं

जले का इलाज शमादानों के पास नहीं 
ग़मों का हिसाब दीवानों के पास नहीं।

बेवफ़ाई, बेहयाई ले बैठी है सबको 
ख़ुशी की दौलत इंसानों के पास नहीं।

सुकूं मिला तो मिलेगा अपनों के पास 
न ढूँढ़ो इसे, यह बेगानों के पास नहीं। 

आशिक़ों के काम की चीज़ है, वहीं देखो 
ये दिल होता हुक्मरानों के पास नहीं।

मुल्क बेचकर घर भरते रहते हैं अपना 
शर्मो-हया सियासतदानों के पास नहीं ।

छूट चुके हैं जो तीर, लगेंगे निशाने पर 
कोई इलाज अब कमानों के पास नहीं। 

ज़िंदगी की उलझनों में उलझते चले गए 
इनका हल ‘विर्क’ नादानों के पास नहीं।

दिलबागसिंह विर्क 
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मंगलवार, अक्तूबर 24, 2017

उतारकर सब नग, मुहब्बत पहनो

तेरी याद छुपाकर सीने में 
मज़ा आने लगा है जीने में।

मैकदे की तरफ़ भेजा था जिसने 
बुराई दिखती है अब उसे पीने में।

हवाओं का रुख देखा नहीं था 
क़सूर निकालते हैं सफ़ीने में।

रुत बदली दिल का मिज़ाज देखकर 
आग लगी है सावन के महीने में।

उतारकर सब नग, मुहब्बत पहनो 
देखो कितना दम है इस नगीने में।

जीने लायक़ सब कुछ है यहाँ पर 
क्या ढूँढ़ रहे हो ‘विर्क’ दफ़ीने में।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अक्तूबर 18, 2017

जो तेरे साथ बीती, ज़िंदगी वही थी

प्यार भरे दिलों में दीवार उठी थी 
दूर हो गये हम, कैसी हवा चली थी। 

एक मोड़ पर आकर हाथ छूट गया 
भरी दोपहर में एक शाम ढली थी।

महफ़िल में आया जब भी नाम तेरा 
मेरे सीने में एक कसक उठी थी । 

हर बीता दिन गहरे ज़ख़्म दे गया 
दम तोड़ती रही, जो आस बची थी।

दिन तो अब भी कट रहे हैं किसी तरह 
जो तेरे साथ बीती, ज़िंदगी वही थी।

बस यही सोचकर ख़ुश हो लेते हैं हम 
जुदा होकर ‘विर्क’ तुझे ख़ुशी मिली थी।

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दिलबागसिंह विर्क 
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