मंगलवार, अगस्त 15, 2017

अब मुहब्बत भी है बदनाम

न डरो, न घबराओ, बस करते रहो अपना काम 
फिर मिलने दो, जो मिले, इनाम हो या इल्ज़ाम।

बस्ती-ए-आदम में दम तोड़ रही है आदमीयत 
लगानी ही होगी हमें फ़िरक़ापरस्ती पर लगाम।

ख़ुदा तक पहुँच नहीं और आदमी से नफ़रत है 
बता ऐसे सरफिरों को मिलेगा कौन-सा मुक़ाम।

लुभाती तो हैं रंगीनियाँ मगर सकूं नहीं देती 
बसेरों को लौट आएँ परिंदे, जब ढले शाम।

आदमी की आदतों ने सबमें ज़हर घोला है 
सियासत ही नहीं, अब मुहब्बत भी है बदनाम।

शायद इसका नशा कुछ देर बाद रंग लाएगा 
बस पीते-पिलाते रहना ‘विर्क’ वफ़ा के जाम।

दिलबागसिंह विर्क 

मंगलवार, अगस्त 08, 2017

बातचीत बहाल कर

दिल में कोई ग़लतफ़हमी है तो सवाल कर
तेरी महफ़िल में आया हूँ, कुछ तो ख़्याल कर।

मिल बैठकर सुलझाएगा तो सुलझ जाएँगे मुद्दे
न लगा चुप का ताला, बातचीत बहाल कर।

सोच तो सही, तेरे दर के सिवा कहाँ जाऊँगा
तेरा दीवाना हूँ, न मुझे इस तरह बेहाल कर।

मैं पश्चाताप करूँगा बीते दिनों के लिए
अपनी ग़लतियों का तू भी मलाल कर।

मैं कोशिश करूँगा विर्कतेरा साथ देने की
तोड़ नफ़रत की दीवार, आ ये कमाल कर।

दिलबागसिंह विर्क 
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मंगलवार, अगस्त 01, 2017

लज़्ज़ते-इश्क़ का, कभी बयां नहीं होता

ज़मीं नहीं होती, उनका आसमां नहीं होता
सीने में जिनके छुपा कोई तूफ़ां नहीं होता।
क्यों खोखले शब्दों को सुनना चाहते हो 
लज़्ज़ते-इश्क़ का, कभी बयां नहीं होता। 

दर्द तो सताता ही है उम्र भर, भले ही 
मुहब्बत के ज़ख़्मों का निशां नहीं होता। 

पल-पल मिटाना होता है वुजूद अपना 
दौरे-ग़म को भुलाना आसां नहीं होता। 

अपने मसले अपने तरीक़े से सुलझाओ 
यहाँ सबका मुक़द्दर यकसां नहीं होता।

मंज़िलें उसकी उससे बहुत दूर रहती हैं 
जब तक आदमी मुकम्मल इंसां नहीं होता। 

तारीख़ी बातें किताबों में ही रह जाती हैं 
आम आदमी ‘विर्क’ तारीख़दां नहीं होता।

दिलबागसिंह विर्क 
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मंगलवार, जुलाई 25, 2017

मिले न मिले

इन आँखों को, कोई हसीं नज़ारा मिले न मिले 
जीना तो है ही, जीने का सहारा मिले न मिले |

मौजें ही अब तय करेंगी सफ़ीने का मुक़द्दर 
अब तो चल ही पड़े हैं, किनारा मिले न मिले | 

जो मिला, जैसा मिला, उसी से तुम निभा लो यार 
इस ख़ुदग़र्ज दुनिया में दोस्त प्यारा मिले न मिले | 

दिल की कोयल को गा लेने दो पतझड़ में गीत 
दौरे-दहशत में बहारों का इशारा मिले न मिले | 

मैं वस्ल के दिनों को जीना चाहता हूँ शिद्दत से 
क्या भरोसा ताउम्र साथ तुम्हारा मिले न मिले | 

कोशिश करो, ज़िंदगी का फूल पूरा खिल जाए अभी 
ये ख़ूबसूरत मौक़ा ‘ विर्क ’ दोबारा मिले न मिले | 

दिलबागसिंह विर्क 
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मंगलवार, जुलाई 18, 2017

ये ज़रूरी तो नहीं

वफ़ा के बदले वफ़ा मिले, ये ज़रूरी तो नहीं 
हर चाहत का सिला मिले, ये ज़रूरी तो नहीं।

किसकी पहुँच कहाँ तक है, ये अहमियत रखता है 
गुनहगारों को सज़ा मिले, ये ज़रूरी तो नहीं।

ये सच है, अच्छाई अभी तक ज़िंदा है, फिर भी 
यहाँ हर शख़्स भला मिले, ये ज़रूरी तो नहीं।

जिनकी फ़ितरत है बद्दुआएँ देना, वे देंगे ही 
तुझे हर किसी से दुआ मिले, ये ज़रूरी तो नहीं।

दिल से पूछकर, दिमाग से सोचकर, चल पड़ तन्हा 
हर राह के लिए क़ाफ़िला मिले, ये ज़रूरी तो नहीं।

कोशिश तो कर ‘विर्क’ अपने भीतर लौटने की 
इसी जन्म में ख़ुदा मिले, ये ज़रूरी तो नहीं।

दिलबागसिंह विर्क 
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