रविवार, सितंबर 24, 2017

कीमत

( विश्व हिंदी सचिवालय मोरिशस द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार प्राप्त कहानी )

" अभी तो मेरे हाथों की मेहँदी भी नहीं उतरी और आप …." - शारदा ने अपने आंसू पोंछते हुए डबडबाई आवाज़ में अपने पति राधेश्याम से पूछा ,लेकिन राधेश्याम ने उसे बात पूरी नहीं करने दी और बीच में ही उसे टोकते हुए बोला – " तुम सारी की सारी औरतें ही एक जैसी होती हो , मैं तुम्हारी मेहँदी को देखता रहूँ या कुछ कमाई करूं ? "
" कमाई तो यहाँ भी हो सकती है |"
" यहाँ क्या खाक कमाई होती है , खेत में फसल तो होती नहीं , कर्ज़ दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है, अगर कुछ दिन और खेती से कमाई की उम्मीद में बैठे रहे तो ये रही – सही जमीन भी बिक जाएगी | "

बुधवार, सितंबर 20, 2017

हिम्मत तो की होती बुलाने की

चुन ली राह ख़ुद को तड़पाने की 
क्यों की ख़ता तूने दिल लगाने की।

ये हसीनों की आदत होती है 
चैन चुराकर नज़रें चुराने की।

जिन्हें घर भरने से फ़ुर्सत नहीं 
वो क्या करेंगे फ़िक्र ज़माने की।

हम न आते तो गिला भी करते 
हिम्मत तो की होती बुलाने की।

चाहा ही नहीं हालात बदलना 
सब कोशिशें हैं, जी बहलाने की।

आदमी को ‘विर्क’ समझा ही नहीं 
चाहत दिल में ख़ुदा को पाने की। 

दिलबागसिंह विर्क 
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मंगलवार, सितंबर 12, 2017

मुहब्बत दिल के लिए आतिश हुई

ये मुझसे कैसी बेहूदा ख़्वाहिश हुई 
मुहब्बत दिल के लिए आतिश हुई।

ढूँढ़ो, कहीं से आशिक़ों को ढूँढो 
ख़ूने-जिगर की अगर फ़रमाइश हुई।

सुबह तक तो मौसम बिल्कुल साफ़ था 
कब बादल घिरे और कब बारिश हुई।

बेवफ़ाई गुनाह नहीं, बस यही सोचकर 
न हमसे किसी अदालत में नालिश हुई।

दुश्मनों के इशारे पर चले दोस्त 
मेरे ख़िलाफ़ ये कैसी साज़िश हुई।

कुंदन बनकर निकला हौसला मेरा 
जब-जब ‘विर्क’ इसकी आज़माइश हुई।

दिलबागसिंह विर्क 
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मंगलवार, सितंबर 05, 2017

बारिशों का दौर

सावन में 
थमता ही नहीं 
बारिशों का दौर 
कभी बादल बरसते हैं 
कभी आँखें 

बादलों के बरसने से 
लहक उठती है प्रकृति 
और आँखों के बरसने से 
मुस्कराने लगते हैं ज़ख्म 
हरियाली ही हरियाली होती है 
प्रकृति में भी
जख्मों में भी 

ये बारिशें 
सिर्फ हरियाली ही नहीं लाती 
उमस भी लाती हैं 
उमस से फिर घिरने लगते हैं बादल 
आसमान पर काले बादल
दिल पर अवसाद के बादल 
फिर शुरू होता है बारिशों का दौर 
बारिशें ही बनती हैं कारण 
अगली बारिशों का 

आँखें हों या बादल
खाली हो होकर भरते हैं 
भर-भर कर खाली होते हैं !

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दिलबागसिंह विर्क 

बुधवार, अगस्त 30, 2017

लावारिस देश

एक तरफ हैं 
वे लोग 
जो जला रहे हैं देश को 
जाति के नाम पर
धर्म के नाम पर 
भाषा के नाम पर 

दूसरी तरफ हैं वे लोग 
जो जला तो नहीं रहे देश को 
मगर वे देख रहे हैं तमाशा 
चुपचाप बैठकर 

तीसरी तरह के लोग भी हैं 
जो न जला रहे हैं देश को
न बचा रहे हैं 
वे बस बहस कर रहे हैं 
ऊंगली उठा रहे हैं 
इस्तीफा मांग रहे हैं 

इस देश पर अपना हक़ 
जताते हैं सब 
मगर दिखता नहीं कोई 
देश को बचाने वाला 
आखिर ये देश किसका है ? 

दिलबागसिंह विर्क 
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