बुधवार, जून 20, 2018

इस ज़िंदगी से बड़ा एजाज़ नहीं

क्या ग़म है गर तख़्तो-ताज नहीं 
इस ज़िंदगी से बड़ा एजाज़ नहीं। 

कैसे बताऊँ मैं हाल दिल का 
ज़ुबां तो है मगर अल्फ़ाज़ नहीं।

चलना तो बस शौक है मेरा 
मैं मंज़िलों का मोहताज नहीं।

ख़ुदा सलामत रखे क़दमों को 
क्या है गर पंख नहीं, परवाज़ नहीं। 

चुपके-चुपके गुज़रता रहता है 
वक़्त करता कभी आवाज़ नहीं।

ख़ाकों में तस्वीरें बदलती रहें 
जो कल थी ‘विर्क’, वो आज नहीं। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जून 13, 2018

यह पागलपन है या प्यार है

मुझे तेरा इंतज़ार था, मुझे तेरा इंतज़ार है 
अब ये तू देख, यह पागलपन है या प्यार है। 

सुकूं किसे नहीं चाहिए मगर न मिले तो क्या करें 
उसका भी मज़ा ले रहे हैं, दिल अगर बेक़रार है। 

ज़माने के मौसमों संग नहीं बदलते मौसम मेरे लिए 
जब तक तेरे आने की उम्मीद है, तब तक बहार है। 

दिल को न जाने क्यों लगे, हर पल तू क़रीब है मेरे 
हक़ीक़त में अगर मैं इस पार हूँ, तो तू उस पार है।

ये बात और है कि हम इसे तोड़ पाएँगे या नहीं 
टूट तो सकती है, रिवाजों की ये जो दीवार है। 

चाहे यह ज़माना आज़माए, चाहे तुम आज़माना 
मुहब्बत के हर इम्तिहां के लिए ‘विर्क’ तैयार है।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जून 06, 2018

न हम ही बेवफ़ा हुए, न उनसे ही वफ़ा हुई

तुझसे मुहब्बत करने की ये कैसी सज़ा हुई 
कुछ ज़ख़्म ऐसे मिले, न जिनकी दवा हुई ।

दिल के गुलशन में अब महकेंगे फूल तो कैसे 
तुम्हारे साथ ही, बहारों की रुत हमसे खफ़ा हुई। 

ऐसा तो नहीं कि ख़ुदा पर एतबार न रहा हो 
बस बेबसी है ये कि न हमसे कोई दुआ हुई ।

मेरे वतन के लोग इतने संगदिल न थे कभी 
अमनो-चैन खो गया है, ये किसकी बद्दुआ हुई। 

इस जलते दिल को सुकूं मयस्सर होता तो कैसे
न हम ही बेवफ़ा हुए, न उनसे ही वफ़ा हुई ।

चंद पल तड़पने के बाद ‘विर्क’ ख़ामोश हो गए 
तुम क्या जानो, कब हमारे अरमानों की क़ज़ा हुई ।  

दिलबागसिंह विर्क
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मंगलवार, मई 29, 2018

ये दिल नादां क्या-क्या करे


कभी उम्मीद बँधाए और कभी आह भरे
न पूछ मुझसे, ये दिल नादां क्या-क्या करे।

कभी सोचे तदबीर से पलट दूँगा ज़माना
कभी ये दिल अपनी ही तक़दीर से डरे।

कब नसीब होती है हमें बिस्तर पर नींद
कभी मैख़ाने में कटी रात, कभी राह में गिरे।

इन आँखों को भूलता ही नहीं वो मंज़र
चाँद-से चेहरे पर घटा से गेसू बिखरे।

कभी-कभार तो गुज़रती होगी तुम पर भी
जो हर दिन, हर रात हम दीवानों पर गुज़रे।

ये तो विर्कइस दिल की ख़ता है वरना
सारी दुनिया गवाह है, कब थे हम बुरे।

दिलबागसिंह विर्क
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बुधवार, मई 23, 2018

बड़ी शातिर है दुनिया, मैं नादां ठहरा

हाले-दिल आया न जब मेरे होंठों पर 
उतरा तब यह काग़ज़ पर अल्फ़ाज़ बनकर।

इसकी दुश्वारियों का अब हुआ है एहसास
रौशन करना चाहा था ज़माना, ख़ुद जलकर।  

बड़ी शातिर है दुनिया, मैं नादां ठहरा 
शतरंजी चालों को न कर पाया बेअसर ।

गिरना, टूटना तो कुछ बुरा न था लेकिन 
अपने ही हाथों लुटा है मेरा मुक़द्दर ।

मेरी कमजोरियाँ ही सबब बनी और 
ताक़तवर होता चला गया वो सितमगर। 

वक़्त के साथ बदले ‘विर्क’ अहमियत 
ख़ुदा बन जाता है, तराशा हुआ पत्थर ।

दिलबागसिंह विर्क 
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