बुधवार, जनवरी 16, 2019

कोई गुनाह तो नहीं करते, गर मुहब्बत करते हो

डरना ख़ुदा से, गर इंसानीयत से बग़ावत करते हो 
ख़ुदा की इबादत है, गर इंसान की इबादत करते हो। 

आस्तीन के साँपों का भी ढूँढ़ना होगा इलाज तुम्हें 
सरहद पर खड़े होकर मुल्क की हिफ़ाज़त करते हो। 

बदल सकती है हर शै, गर चाहो तुम दिल से बदलना 
लोगों की देखा-देखी, क्यों किसी से हिकारत करते हो ? 

सोचो तो सही, क्या हो गया है तुम्हारी ज़मीर को 
कुर्सी के लिए तुम आदमी से सियासत करते हो। 

सच में क़ाबिले-तारीफ़ होगा आपका हौसला 
हैवानीयत के दौर में अगर शराफ़त करते हो। 

क्यों छुपाओ किसी से ‘विर्क’, क्यों बेमतलब डरो
कोई गुनाह तो नहीं करते, गर मुहब्बत करते हो। 

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दिलबागसिंह विर्क 

बुधवार, जनवरी 09, 2019

दिल का दर्द सुबहो-शाम पाया

मुहब्बत में कब आराम पाया 
दिल का दर्द सुबहो-शाम पाया। 

जितना ज्यादा सोचा है मैंने 
ख़ुद को उतना ही नाकाम पाया। 

मैं कौन हूँ तुम्हें भुलाने वाला 
हर धड़कन पर तेरा नाम पाया। 

मेरी वफ़ा ज़ाया तो नहीं गई 
अश्कों-आहों का इनाम पाया। 

क्या उम्मीद रखूँ, तेरे कूचों में
इश्क़ को बहुत बदनाम पाया। 

हुनर कम, लिखना ख़ता ज्यादा लगे
विर्क’ मैंने ये कैसा काम पाया। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जनवरी 02, 2019

ऐ ख़ुदा ! बता तो सही, अब तुझे क्या कहें

बताओ क्या करें, दर्द को कैसे दवा कहें 
कुछ हैरत नहीं अगर ज़िन्दगी को सज़ा कहें। 

मतलबपरस्त दुनिया में मक्कारी है, गद्दारी है 
रिश्तों में कुछ भी ऐसा नहीं, जिसे वफ़ा कहें। 

ज़मीं पर हो गई है, ख़ुदाओं की भरमार 
ऐ ख़ुदा ! बता तो सही, अब तुझे क्या कहें। 

समझ न आए, किसकी बात छेड़ें, छोड़ दें किसे 
सब एक से हैं, क्यों किसी को बेमतलब बुरा कहें। 

क़ातिल इरादों को वो रोज़ देता है अंजाम 
तुम्हीं बताओ, अब किस-किस को हादसा कहें। 

लोगों जैसे ही तुम हो, फिर गिला क्या करना 
यूँ तो सोचते हैं ‘विर्क’ हम तुझे बेवफ़ा कहें। 

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दिलबागसिंह विर्क 

बुधवार, दिसंबर 26, 2018

बीती ज़िंदगी नाम मेरे, एक फ़साना कर गई

ग़म का अज़ीज़, ख़ुशी से बेगाना कर गई 
तेरी चाहत हमें इस क़द्र दीवाना कर गई। 

न दिल को तसल्ली दे सके, न गिला कर सके 
तेरी ही तरह बहार भी, मुझसे बहाना कर गई। 

चाहकर भी आज़ाद हो न पाएँगे उसके असर से 
बीती ज़िंदगी नाम मेरे, एक फ़साना कर गई। 

टुकड़े-टुकड़े हुआ दिल, रोए हम लहू के आँसू 
तेरी याद ये वारदात वहशियाना कर गई। 

मेरी वफ़ा ने देखो, किया है ये कैसा सलूक 
आफ़तों की शाख पर मेरा आशियाना कर गई। 

मुहब्बत की ख़ुशबू ऐसी फैली है ज़िंदगी में 
अंदाज़ मेरा ‘विर्क’ ये शायराना कर गई। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, दिसंबर 19, 2018

कभी सोचा नहीं

कितना लंबा वफ़ा का रास्ता, कभी सोचा नहीं 
ज़ख़्म खाकर क्यों चलता रहा, कभी सोचा नहीं। 

दिल को चुप कराने के लिए तुझे बेवफ़ा कहा 
तू बेवफ़ा था या बा-वफ़ा, कभी सोचा नहीं। 

तेरी ख़ुशी माँगी है मैंने ख़ुदा से सुबहो-शाम 
असर किया कि ज़ाया गई दुआ, कभी सोचा नहीं। 

मुहब्बत की राह पर एक बार चलने के बाद 
क्या-क्या पीछे छूटता गया, कभी सोचा नहीं। 

गवारा नहीं ‘विर्क’ सितमगर के आगे झुकना 
कब तक साथ देगा हौसला, कभी सोचा नहीं। 

दिलबागसिंह विर्क 
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