बुधवार, मई 29, 2019

चाँद ज़मीं पर उतारा क्यों नहीं ?

ऐसा नसीब हमारा क्यों नहीं ?
चाँद ज़मीं पर उतारा क्यों नहीं ? 

दोस्त जब तमाशबीन बन गए तो 
दुश्मनों ने हमें मारा क्यों नहीं ?

सदियों से हैं हमसफ़र दोनों 
किनारे से मिले किनारा क्यों नहीं ?

यूँ ही खींच ली बीच में दीवारें 
जो मेरा है, तुम्हारा क्यों नहीं ?

गुरूर था या एतबार न था 
तूने मुझे पुकारा क्यों नहीं ?

न चूकना वरना फिर कहोगे 
मौक़ा मिलता दोबारा क्यों नहीं ?

बहुत बुरे थे जब हम ‘विर्क’ फिर 
ज़माने ने हमें दुत्कारा क्यों नहीं ?

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मई 22, 2019

निभानी होगी हमें भी, वफ़ा की वही रीत फिर

तन्हा हूँ, उदास हूँ, जन्मेगा कोई गीत फिर 
बहुत याद आ रहा है, आज मुझे मेरा मीत फिर। 

बदनाम हो न जाए इश्क़ कहीं, मर मिटे थे लोग 
निभानी होगी हमें भी, वफ़ा की वही रीत फिर।

आदमियत पर मज़हबों को क़ुर्बान करके देखो 
वादियों में गूँजेगा, अमनो-चैन का संगीत फिर। 

ग़म के मौसम में ख़ुशबू फैलाएँ वो वस्ल के दिन 
उम्मीद है ज़िंदगी को रौशन करेगी प्रीत फिर। 

ग़म उठाना, सितम सहना, मगर सच को न छोड़ना 
अज़ल से हो रही है, ‘विर्क’ होगी सच की जीत फिर। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मई 08, 2019

कभी आँख रोई, कभी दिल जला


टूटता ही नहीं ग़मों का सिलसिला
बढ़ता ही जाए, ख़ुशियों से फ़ासिला।

मुक़द्दर ने दिया है ये तोहफ़ा मुझे
कभी आँख रोई, कभी दिल जला।

न दौलत चाही थी, न शौहरत मैंने
एक सकूं चाहा था, वो भी न मिला।

कुछ भी न हुआ उम्मीदों के मुताबिक़
आख़िर कब तक साथ देता हौसला।

हमारी दुआएँ हर बार ज़ाया गई
या ख़ुदा ! क्या ख़ूब रहा तेरा फ़ैसला।

देखना है विर्कअंजाम क्या होगा
मेरे भीतर उठ रहा है एक ज़लज़ला।

 दिलबागसिंह विर्क 
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