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शनिवार, अप्रैल 19, 2014

पुस्तक - चंद आँसू, चंद अल्फ़ाज़

वर्ष 2005 में मेरा ग़ज़लनुमा कविताओं का संग्रह प्रकाशित हुआ था , मैं इसे PDF FILE के रूप में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ  | आशा है आप इसे पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देंगे ।

बुधवार, जून 12, 2013

अगजल - 60

चंद आंसू चंद अल्फाज लेबल की अंतिम रचना । दरअसल यह मेरा कविता संग्रह ( तुकान्तक परन्तु बहर विहीन ) है और इस संग्रह की रचनाएँ उसी क्रम से यहाँ प्रस्तुत की गई हैं । आपकी प्रतिक्रियाएं मिली , इसके लिए आपका आभार । 

      उल्फत बुरी थी या हम, ये सोचा करते हैं 
      क्यों हमदम बने हैं गम, ये सोचा करते हैं । 

      दिल के जख्म क्या सचमुच लाईलाज होते हैं ?
      लगाएं कौन-सी मरहम, ये सोचा करते हैं ।

      दगाबाज लगे है इस जमाने का हर शख्स 
      किसको कहें अब सनम, ये सोचा करते हैं ।

      यादों के जो पल सजा रखे हैं जहन में वो 
      शरारे हैं या शबनम, ये सोचा करते हैं ।

      जिस बेवफा से वास्ता नहीं, उसे याद कर 
      क्यों होती है आँख नम, ये सोचा करते हैं ।

      कमी मेरी चाहत में थी या तकदीर में 
      विर्क मेरे क्यों न हुए तुम, ये सोचा करते हैं ।

                      दिलबाग विर्क                          
                         *******

रविवार, जून 02, 2013

अगज़ल - 59

       
        हम भी गुजरे थे इस रहगुजर से 
       गम ही मिलते हैं प्यार के सफर से ।

        जुबां बे'मानी है मुहब्बत में 
        ये खेल खेले जाते हैं नजर से ।

        कुछ परवाह नहीं मेरे दिल की 
        वास्ता पड़ा है कैसे पत्थर से ।

         बहुत बड़ी नहीं मेरी ख्वाहिशें 
         मैं वाकिफ हूँ अपने मुकद्दर से ।

         दहशत के लोग इस कद्र आदी हैं
         हैरानी होती नहीं किसी खबर से ।

         ये हल न हुआ विर्क मसलों का 
         आँखें बंद कर लो अगर डर से ।
                  
                 दिलबाग विर्क                     
                   ******* 

मंगलवार, मई 28, 2013

अग़ज़ल - 58

           हमें भी उम्मीद का एक आशियां बनाने दो 
           कांटो भरी बेल पर कोई फूल खिलाने दो ।

           क्या हुआ गर बिखेर दिए हैं तिनके किस्मत ने 
           दूर जा  चुकें हैं जो , उनको पास बुलाने दो ।

           गर दम हुआ वफा में तो छंटेगा अँधेरा भी 
           रौशनी के लिए अपने दिल को जलाने दो ।

           मुहब्बत का चिराग जले उम्र भर इसके लिए 
           तूफानों को अपने आगोश में सुलाने दो ।

           उनकी बेवफाई कहीं ले न जाए उन्हें गर्त में 
           बेगाने बने हैं जो, उन अपनों को बचाने दो ।

           चंद रोज की जिन्दगी काफी है विर्क मेरे लिए 
           किसी की ख़ुशी के लिए खूने-जिगर बहाने दो ।

                          दिलबाग विर्क 
                            ********



मंगलवार, मई 14, 2013

अग़ज़ल - 57

भले मय पिला दे या फिर पिला दे जहर साकी 
मगर मेरी मुहब्बत को रुसवा न कर साकी ।

पहले उसे देखता था, अब खुद को सोचता हूँ 
उस वस्ल से तो कहीं बढ़कर है ये हिज्र साकी ।

रुका हूँ इसलिए कि तरोताजा होकर चल सकूं 
अभी मुकाम कहाँ, बड़ा लम्बा है सफर साकी ।

घर के ही लोग घर को मकान बना देते हैं 
वरना कौन होना चाहता है बेघर साकी ।

जिन्दगी का स्याह रुख देखा हो जिसने, उसके 
दिल के किसी कोने में बैठा ही रहे डर साकी ।

गर विर्क जिन्दगी ही नशा बने तो उम्र गुजरे 
तेरी मय का नशा तो जाना है उतर साकी ।

                     दिलबाग विर्क                                                       
                         *****

मंगलवार, अप्रैल 30, 2013

अगजल - 56

मुहब्बत के सहारे कहाँ गए 
वो मौसम, वो नजारे कहाँ गए ।
हर पल देखते थे कभी हमको 
आज वो नैन कजरारे कहाँ गए ।

दिल का आसमां बिलकुल साफ़ है 
उम्मीदों के सितारे कहाँ गए ।

उम्र बीत गई है मझधार में 
इस समन्दर के किनारे कहाँ गए ।

जो जलाकर राख कर दे हस्ती 
मेरे दामन के शरारे कहाँ गए ।

कुछ रोज पहले तक तो साथ थे 
क्या कहें, दोस्त हमारे कहाँ गए ?

कौन देखता है इस जमाने में 
' विर्क ' वक्त के मारे कहाँ गए ।

दिलबाग विर्क 
********

बुधवार, अप्रैल 24, 2013

अगज़ल - 55

उम्र भर के रिश्ते न तोड़ डालना गलतफहमी से 
आदमी को जरूरत पडती ही रहती है आदमी से ।

उसके लबों पर हंसी लाना फर्ज है तुम्हारा,  अगर 
जाने-अनजाने दिल दुखा है किसी का, तुम्हारी कमी से ।

मासूमियत पर पहले ही लोगों को ऐतबार नहीं 
रहजन बनके लूटो, मगर न लूटो आँखों की नमी से ।

जमाने के गमों से वाकिफ हो जाता है वो शख्स 
खुशियाँ रहें जिससे दूर, नाता हो जिसका गमी से ।

हवा के झोंकों के साथ रुख बदल लेते हैं ये 
इस जमाने में आजकल, मिलते हैं लोग मौसमी से ।

किसी मुर्शिद की रहमत हो जाए विर्क तो क्या कहना 
यूं तो वक्त भी तराशे है, मगर बड़ी बेरहमी से ।

                           दिलबाग विर्क 
                              ********
रहजन ---- लुटेरे 
मुर्शिद ---- गुरु 
********



रविवार, अप्रैल 07, 2013

अग़ज़ल - 54

   इस दुनिया से नफरतें मिटाने का काम मिला 
   दिल की सदा सुनी जब, मुहब्बत का पैगाम मिला ।
  अनजाने में चलती रही उंगलियाँ रेत पर 
  उकेरे हुए हर्फ देखे तो तेरा नाम मिला ।

  अमनो-चैन की जिन्दगी कैसे मुमकिन होगी 
  कोई शोहरत, कोई दौलत का गुलाम मिला ।

  दाद देनी होगी इस राह के मुसाफिरों को 
  प्यार के सफर में अक्सर अश्कों का ईनाम मिला ।

  कुछ समझ नहीं आता ये कैसी जुम्हूरियत है 
  हुक्मरान सोए मिले, दहशतजदा अवाम मिला ।

  पागल हो ' विर्क ' किस जहां की बात करते हो 
  इस जमाने की गलियों में इश्क बदनाम मिला ।

                      दिलबाग विर्क                           
                            *****
जुम्हूरियत ----- प्रजातंत्र  

                      ********


मंगलवार, मार्च 26, 2013

अग़ज़ल - 53

हर गम हँसके उठाया है हमने तेरे गम के सिवा 
निभाई हैं कसमें, तुझे भुला पाने की कसम के सिवा ।
आती है जब भी याद तेरी मेरा इम्तिहां होता है 
संभाल ही लेते हैं खुद को, आँख नम के सिवा ।

तेरा जाना मुझ पर कुछ ऐसा असर छोड़ गया 
खामोश हो गया हूँ मैं, बोलती हुई कलम के सिवा ।

और कुछ भी तो नहीं रहा अब मेरे पागल दिल में 
हसीं लोग बेवफा होते हैं, इस एक वहम के सिवा ।

पता नहीं क्यों अभी तक बाकी है इससे लगाव मेरा 
ठुकरा दिया है हर किसी को, वफा की रस्म के सिवा ।

तन्हाइयों में गर विर्क रह पाओ तो बेहतर होगा 
जमाने की महफिल कुछ नहीं, दास्ताँ-ए-अलम के सिवा ।

दिलबाग विर्क 
*********
दास्ताँ-ए-अलम  -  दुःख की कहानी 
********

मंगलवार, मार्च 12, 2013

अग़ज़ल - 52

उडकर न सही, पैदल चलकर ही 
पा ही लेंगे मंजिल, कभी-न-कभी ।

खिलखिलाकर हंसो, जब भी वक्त मिले 
यहाँ बड़ी मुश्किल से मिले है ख़ुशी ।

जी रहे हैं बेपरवाही से देखो 
क्या रंग लाएगी ये आवारगी ।

प्यार का मुकाम भी दिलाती है गर 
जलाती है दिल को दिल की लगी ।

या रब ! किसी को बेबस न बना 
हर शै से बुरी है ये बेबसी ।

न वफा है पास और न ही गैरत 
कितना खोखला है आज का आदमी ।

मुद्दे विर्क इससे और उलझ जाएंगे 
हर मसले को न बनाओ मजहबी ।

दिलबाग विर्क 
*********

शुक्रवार, फ़रवरी 22, 2013

अग़ज़ल - 51

राह चलते-चलते दर्द मुझ पर मेहरबां हो गया 
देखो बिन बुलाए यह उम्र भर का मेहमां हो गया ।

तन्हा थे उस दिन जब सोची थी मुहब्बत की बात 
धीरे-धीरे अब साथ अश्कों का कारवां हो गया ।

मैं पागल था जो सरेआम कह बैठा चाँद उन्हें 
और उन्हें मेरी इसी बात का गुमां हो गया ।

क्या करें, सदा मेरी अब उन तक पहुंचती ही नहीं 
चंद दिनों में ही वो दूर होकर कहकशां हो गया ।

कभी हल्का-ए- गिर्दाब से निकाल लाए थे कश्ती 
मगर आज हवा का हल्का-सा झोंका तूफां हो गया ।

तन्हाइयों में बैठकर विर्क अब सोचते हैं अक्सर 
ख़ुशी क्यों न मिली, क्यों हर यत्न रायगां हो गया ।

दिलबाग विर्क 
*********
गुमां  - घमंड 
कहकशां - आकाश गंगा 
हल्का-ए- गिर्दाब - भंवर की परिधि 
रायगां - निष्फल 
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मंगलवार, फ़रवरी 05, 2013

अग़ज़ल - 50

जीना नहीं आया यारो, मुझको जीना नहीं आया 
जिन्दगी क्या थी ? दो घूँट जहर, पीना नहीं आया ।

जमीं के गुलशन और दिल के चमन में फर्क है यही 
टूटा जो दिल तो फिर बहार का महीना नहीं आया ।
खून जलाना पड़ता है यहाँ दो वक्त की रोटी के लिए 
वो क्या जाने असलियत जिसे पसीना नहीं आया ।

करीने-कयास के सहारे कब तक मिलती कामयाबी 
हमें हुनर से कामयाब होने का करीना नहीं आया ।

उनकी फितरत में थी बेवफाई , वो कर गए लेकिन 
ये मेरी खता है, चाक जिगर को सीना नहीं आया ।
खतरे ही खतरे हैं ' विर्क ' इस मुहब्बत के दरिया में 
इस सफर से सलामत दिल का सफीना नहीं आया ।

दिलबाग विर्क 
*********

करीने-कियास  --- अटकल से ठीक होना 
करीना ---- ढंग 
चाक --- विदीर्ण , फटा हुआ 
सफीना  ---  नौका, नाव 
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सोमवार, जनवरी 28, 2013

अग़ज़ल - 49

और क्या मिलना है , यादों को संजोने से 
बहल जाता है दिल, घड़ी-दो-घड़ी रोने से ।

अब हुआ अहसास, ठोकर लग ही जाती है 
जरूरत से कुछ ज्यादा वफादार होने से ।

सागर की खामोशियों पर एतबार न करना
सकूं मिलता है इसे कश्तियाँ डूबोने से । 

फरेबी दुनिया छोडती ही नहीं फरेब को 
दिल साफ़ हुआ नहीं करता जिस्म धोने से ।

जरूरी तो है इंसानियत को निभाना मगर  
फुर्सत कहाँ है रिवाजों का बोझ ढोने से ।

काश ! छोटी-सी बात समझ लेती दुनिया 
कुछ भी न होना अच्छा है बुरा होने से ।

कशिश है, कसक है मगर विर्क रुसवाई नहीं 
निराला ही मजा है सफर में मंजिल खोने से ।

दिलबाग विर्क 
********

बुधवार, दिसंबर 05, 2012

अग़ज़ल - 48

चंद दिनों में हादसे पर हादसा हो गया
तूने छोड़ दी वफा, मैं भी बेवफा हो गया ।


दिनो-दिन हालात बद से बदतर होते चले गए
जाने क्या खता हुई, क्यों नाराज खुदा हो गया ।


कोशिश तो की होती मसले का हल तलाशने की
बित्ते भर की गलतफहमी मीलों फासिला हो गया ।


खुशी मांगी, गम मिले, मुहब्बत की, नफरत पाई
क्या सोचा था हमने और क्या से क्या हो गया ।


टूटे दिल को समझा न पाए बातों से, आखिर
साकी बना लिया साथी, घर मैकदा हो गया ।


दोस्त बनाकर देखे "विर्क "वफा निभाकर देखी
अब अपनी धुन में रहना मेरा फलसफा हो गया ।


                   दिलबाग  विर्क                        
                     *********

गुरुवार, नवंबर 01, 2012

अगजल - 47

जिन्दगी में फैली है कैसी बेनूरी ।
न सुबह सुहानी, न शाम सिन्दूरी ।
चाँद के चेहरे पर दाग क्यों है ?
क्यों है दुनिया की हर शै अधूरी ?

माना ताकतवर है तू बहुत मगर 
ठीक नहीं होती इतनी मगरूरी ।

जब भी पाओगे भीतर मिलेगी 
कहाँ ढूँढो खुशियों की कस्तूरी ।

तुझसे शिकवा करना खता होगी 
इंसान के हिस्से आई है मजबूरी ।

दुनिया सिमट गई मुट्ठी में मगर 
दिलों में ' विर्क ' बढती जाए दूरी ।

**********

बुधवार, अक्टूबर 10, 2012

अग़ज़ल - 46

ये दर्द मेरे दोस्तों की मेहरबानी का असर है 
अपनों ने रची हैं जो साजिशें, उनकी हमें खबर है ।

इसका नतीजा क्या होगा, यह तुम भी जानते हो 
पत्थर हैं उनके हाथ में, और मेरा कांच का घर है ।

जो बहुत शोर मचाया करते थे दोस्ती का अक्सर 
जब दुश्मनों को गिना, पाया उनका नाम भी उधर है ।

जिसके आसरे का था गरूर हमें, वो धोखा दे गया 
बरसात का मौसम शुरू होते ही, गया आशियाँ बिखर है।

मेरे मरे हुए सब अरमानों को तुम दफना देना कहीं 
मुझे अब फिर से इन सबके जिन्दा हो जाने का डर है ।

मैं समेट रहा हूँ विर्क खुद को अपने आगोश में 
महफिल की बात न करो, तन्हाई मेरा मुकद्दर है ।


****************

रविवार, सितंबर 09, 2012

अगजल - 45

          प्यार प्यार न रहेगा, सनम छूट जाएगा 
          ' मैं ' को पकड़ोगे तो ' हम ' छूट जाएगा ।

          अगर यूं ही बढ़ते गए दिलों के फासले 
          तो एक दिन देखना, तकुल्लम छूट जाएगा ।

          जिन्दा रहना सजा होगा, अगर हाथ से 
          इंसानियत का परचम  छूट जाएगा ।

          ये रास्ते हैं इनकी अहमियत कुछ नहीं 
          खुदा मिला तो दैरो-हरम छूट जाएगा ।

          न तंगदिल बनो लोगो, इस तंगदिली से 
          प्यार का, खुशियों का मौसम छूट जाएगा ।

          ख़ुशी के पीछे दौड़ना छोड़ दो विर्क 
          फिर देखना, पीछे हर गम छूट जाएगा ।

                      *******************

तकुल्लम  ---- वार्तालाप 
दैरो - हरम ---- काबा और बुतखाना  

                      *******************


शनिवार, अगस्त 18, 2012

अगज़ल - 44

      अपनी हस्ती को गम के चंगुल से आजाद करने का 
      काश ! हम सीख लेते हुनर खुद को शाद करने का ।


      अंजाम की बात तो बहारों पर मुनस्सर है लेकिन 
      इरादा तो हो वीरान चमन को आबाद करने का ।

      इन्हें कुछ भी मतलब नहीं होता किन्हीं मुद्दों से 
      लोगों को तो बस मौका चाहिए फसाद करने का ।

      मुमकिन है हार के बाद हताशा हो जाए हावी 
      मगर हौंसला रखना , खुदा से फरियाद करने का ।

      बदलते मौसमों का इस पर कुछ असर नहीं होता 
      ढूंढ ही लेता है दिल बहाना , तुझे याद करने का ।

       ये तो हमारी ही खताएं थी विर्क जो भारी पड़ी 
       जमाने में कहाँ दम था हमें बर्बाद करने का ।

                     ***************

गुरुवार, जुलाई 26, 2012

अग़ज़ल - 43

              जिन्दगी को पिरोना चाहता हूँ ग़ज़ल में 
              भटक रहा हूँ मैं , इस तलाशे-साहिल में ।


              कामयाब होकर लोग खुद बदल जाते हैं 
              वरना कब नशा होता है मंजिल में ।


              अगर पत्थर दिल है वो तो भी क्या है 
              दिल जैसा कुछ तो होगा उसके दिल में ।


              शायद मिले मुझे मौका कुछ कहने का 
              अभी तक जले है शमां उनकी महफिल में ।


              आदमियों में कातिलों को क्या ढूंढना 
              आदमी ढूंढता हूँ मैं हर कातिल में ।


              मुहब्बत ने विर्क ये हुनर सिखा दिया 
              मजा आने लगा है अब हर मुश्किल में ।


                           ***********

गुरुवार, जून 21, 2012

अग़ज़ल - 42

  इबादत करना चाहता हूँ , मुझे कोई खुदा चाहिए 
  लुटा सकूं जिस पर अपनी वफा, ऐसा बा-वफा चाहिए ।


  ता उम्र चलने की तमन्ना है और चलने के लिए 
  कंटीला-पथरीला जैसा भी हो बस रास्ता चाहिए ।


  हंसने का हुनर हावी होगा हर ला-इलाज मर्ज पर 
  वो आजमाए इसे , जिसे दर्दे-जिगर की दवा चाहिए ।


  तंगदिली के बादल छाए हैं मुहब्बत के आसमान पर 
  उडा ले जाए जो वहमों-रस्मों को वो हवा चाहिए ।


  खामोशियों का ओढकर नकाब बोलना सीख रहा हूँ 
  जो दिल को छू लेकर जाकर ऐसी कोई सदा चाहिए ।


  माना कि बुरा हूँ मैं मगर मुहब्बत से खाली नहीं 
  यकीं दिला सकता हूँ बस मौका एक मरतबा चाहिए ।


  कुछ नहीं मिलता दौलत- शौहरत के पीछे दौडकर 
  गर विर्क सकूं मिले दिल को तो और भला क्या चाहिए ।
    
                         ***************


    
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