रविवार, अप्रैल 07, 2013

अग़ज़ल - 54

   इस दुनिया से नफरतें मिटाने का काम मिला 
   दिल की सदा सुनी जब, मुहब्बत का पैगाम मिला ।
  अनजाने में चलती रही उंगलियाँ रेत पर 
  उकेरे हुए हर्फ देखे तो तेरा नाम मिला ।

  अमनो-चैन की जिन्दगी कैसे मुमकिन होगी 
  कोई शोहरत, कोई दौलत का गुलाम मिला ।

  दाद देनी होगी इस राह के मुसाफिरों को 
  प्यार के सफर में अक्सर अश्कों का ईनाम मिला ।

  कुछ समझ नहीं आता ये कैसी जुम्हूरियत है 
  हुक्मरान सोए मिले, दहशतजदा अवाम मिला ।

  पागल हो ' विर्क ' किस जहां की बात करते हो 
  इस जमाने की गलियों में इश्क बदनाम मिला ।

                      दिलबाग विर्क                           
                            *****
जुम्हूरियत ----- प्रजातंत्र  

                      ********


2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
नवसम्वत्सर-२०७० की हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकार करें!

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

बहुत सुन्दर!

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