मंगलवार, अप्रैल 30, 2013

अगजल - 56

मुहब्बत के सहारे कहाँ गए 
वो मौसम, वो नजारे कहाँ गए ।
हर पल देखते थे कभी हमको 
आज वो नैन कजरारे कहाँ गए ।

दिल का आसमां बिलकुल साफ़ है 
उम्मीदों के सितारे कहाँ गए ।

उम्र बीत गई है मझधार में 
इस समन्दर के किनारे कहाँ गए ।

जो जलाकर राख कर दे हस्ती 
मेरे दामन के शरारे कहाँ गए ।

कुछ रोज पहले तक तो साथ थे 
क्या कहें, दोस्त हमारे कहाँ गए ?

कौन देखता है इस जमाने में 
' विर्क ' वक्त के मारे कहाँ गए ।

दिलबाग विर्क 
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सोमवार, अप्रैल 29, 2013

आसमान

दो घड़ी बरसा और बरसकर खुल गया आसमान
ऐ दिल तू भी सीख ले हुनर यूँ हल्का होने का ।


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रविवार, अप्रैल 28, 2013

उड़ान



असल जिंदगी से कोई ही वास्ता नहीं
ये ख्यालों की उड़ान, कैसी उड़ान है ?

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शुक्रवार, अप्रैल 26, 2013

जिंदगी



तेरा सच तू जाने, मेरा सच बस यही है
पास आते - आते जिंदगी बहुत दूर गई ।

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बुधवार, अप्रैल 24, 2013

अगज़ल - 55

उम्र भर के रिश्ते न तोड़ डालना गलतफहमी से 
आदमी को जरूरत पडती ही रहती है आदमी से ।

उसके लबों पर हंसी लाना फर्ज है तुम्हारा,  अगर 
जाने-अनजाने दिल दुखा है किसी का, तुम्हारी कमी से ।

मासूमियत पर पहले ही लोगों को ऐतबार नहीं 
रहजन बनके लूटो, मगर न लूटो आँखों की नमी से ।

जमाने के गमों से वाकिफ हो जाता है वो शख्स 
खुशियाँ रहें जिससे दूर, नाता हो जिसका गमी से ।

हवा के झोंकों के साथ रुख बदल लेते हैं ये 
इस जमाने में आजकल, मिलते हैं लोग मौसमी से ।

किसी मुर्शिद की रहमत हो जाए विर्क तो क्या कहना 
यूं तो वक्त भी तराशे है, मगर बड़ी बेरहमी से ।

                           दिलबाग विर्क 
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रहजन ---- लुटेरे 
मुर्शिद ---- गुरु 
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मंगलवार, अप्रैल 23, 2013

रविवार, अप्रैल 21, 2013

रोना आया


अब मेरी बेबसी का आलम ये है यारो
हँसने की कोशिश की जब, रोना आया

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शुक्रवार, अप्रैल 19, 2013

पत्थर



किसी को पूजने की गलती न करो लोगो
पूजने से पत्थर भी खुदा हो जाता है ।

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बुधवार, अप्रैल 17, 2013

हाइगा

रामेश्वर कम्बोज, डॉ . भावना कुंवर और डॉ . हरदीप संधू जी द्वारा संपादित यादों के पाखी संकलन में शामिल मेरे कुछ हाइकु में से एक 

मंगलवार, अप्रैल 16, 2013

रौशनी


ये शम‍्अ हमसे कहीं बेहतर रही 
हम भी जले मगर रौशनी न हुई । 

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सोमवार, अप्रैल 15, 2013

चुप की दीवार


न तू कुछ कहता है , न मुझसे कुछ कहा जाता है 
अब हम खड़े हैं चुप की दीवार के इधर - उधर । 

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गुरुवार, अप्रैल 11, 2013

चुप्पी

फेसबुक पर कभी कभार कुछ पंक्तियाँ टांक देता हूँ, साहित्य से कोई गहरा सम्बन्ध तो मेरे ब्लॉग लेखन में भी नहीं , अत: वहां भी इसकी कोई संभावना नहीं । इन्हीं पंक्तियों को अब ब्लॉग पर पोस्ट करने का इरादा है । 


क्यों शोर मचाना ही जायज लगता है तुम्हें 
नाराजगी का इजहार चुप्पी से भी होता है । 

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रविवार, अप्रैल 07, 2013

अग़ज़ल - 54

   इस दुनिया से नफरतें मिटाने का काम मिला 
   दिल की सदा सुनी जब, मुहब्बत का पैगाम मिला ।
  अनजाने में चलती रही उंगलियाँ रेत पर 
  उकेरे हुए हर्फ देखे तो तेरा नाम मिला ।

  अमनो-चैन की जिन्दगी कैसे मुमकिन होगी 
  कोई शोहरत, कोई दौलत का गुलाम मिला ।

  दाद देनी होगी इस राह के मुसाफिरों को 
  प्यार के सफर में अक्सर अश्कों का ईनाम मिला ।

  कुछ समझ नहीं आता ये कैसी जुम्हूरियत है 
  हुक्मरान सोए मिले, दहशतजदा अवाम मिला ।

  पागल हो ' विर्क ' किस जहां की बात करते हो 
  इस जमाने की गलियों में इश्क बदनाम मिला ।

                      दिलबाग विर्क                           
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जुम्हूरियत ----- प्रजातंत्र  

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मंगलवार, अप्रैल 02, 2013

हाइगा

रामेश्वर कम्बोज, डॉ . भावना कुंवर और डॉ . हरदीप संधू जी द्वारा संपादित यादों के पाखी संकलन में शामिल मेरे कुछ हाइकु में से एक 

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