रविवार, दिसंबर 28, 2014

ज़िंदगी दाँव पर लगानी है

ख़ूबसूरत बनी कहानी है
चढ़ गई आग-सी जवानी है ।

मैं जुबां पर यकीं न कर पाऊँ
बात दिल की उसे बतानी है ।
इश्क़ ही हल मिला मुझे इसका
ज़िन्दगी दाँव पर लगानी है ।

प्यार बरसे दुआ यही माँगी
नफ़रतों की अगन बुझानी है ।

आँख के सामने उसे पाया
जब किया इश्क़, याद आनी है ।

बस हमें सीखना इसे जीना
ज़िन्दगी तो बड़ी सुहानी है ।

मारना सीख लें अहम् अपना
' विर्क ' दीवार जो गिरानी है ।

दिलबाग विर्क
* * * * *

बुधवार, दिसंबर 24, 2014

इतिहास कभी नया बन जाता

ये दर्द अगर दवा बन जाता 
तो तू मेरा ख़ुदा बन जाता | 

है मन्दिर-मस्जिद के झगड़े
काश ! हर-सू मैकदा बन जाता | 
सीखा होता अगर वक्त से कुछ 
इतिहास कभी नया बन जाता | 

अगर वफ़ा की अहमियत होती 
फिर हर कोई बा-वफ़ा बन जाता | 

ख़ुश रहना अगर आसां होता तो 
यह सबका फलसफ़ा बन जाता | 

तुम ' विर्क ' हिम्मत न हारे होते 
तो एक दिन काफ़िला बन जाता |

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - हिन्द की ग़ज़लें
संपादक - देवेन्द्र नारायण दास 
प्रकाशन - मांडवी प्रकाशन, गाज़ियाबाद 
प्रकाशन वर्ष - 2008

मंगलवार, दिसंबर 16, 2014

वक्त खुद सीढ़ी बनेगा

आकाश देता है निमन्त्रण 
हर किसी को 
अपने पास आने का 
अगर सुन सको तो 

अँधेरे तहखानों से भी 
निकलते हैं रास्ते 
बाहर की दुनिया के 
अगर देख सको तो 

जागो
उठाओ कदम 
दृढ़ विश्वास के साथ 
बढ़ो मंज़िल की ओर
वक्त खुद सीढ़ी बनेगा 
तुम्हें शिखर तक ले जाने के लिए 

दिलबाग विर्क 
*****

बुधवार, दिसंबर 10, 2014

वो निशाना आज़माता रहा

वो बातें मुहब्बत की सुनाता रहा 
मैं बैठा अपने जख़्म सहलाता रहा । 
मुझे  गवारा न था सामने से हटना 
वो बार-बार निशाना आज़माता रहा  

कितनी जालिम होती है ये याद भी 
इसका वजूद मेरी नींद उड़ाता रहा । 

इस दिल का क्या करें, ये कहे उसे अपना 
जो शख्स जख़्म देकर मुस्कराता रहा । 

मझधार में उठे तूफां ने रोक लिया 
यूँ तो कश्तियों को किनारा बुलाता रहा । 

भूल हुई ' विर्क ' दिल की बातें मानकर 
ये हर बार कहीं-न-कहीं उलझाता रहा । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - काव्य गंगा 
संपादक - रविन्द्र शर्मा 
प्रकाशन - रवि प्रकाशन, बिजनौर ( उ.प्र. )

प्रकाशन वर्ष - 2008  

सोमवार, दिसंबर 01, 2014

अर्जुनों की मौत

कोई भी द्रोणाचार्य 
किसी को 
अर्जुन नहीं बना सकता 
हाँ 
कोई अर्जुन 
किसी द्रोणाचार्य को 
अमर जरूर कर सकता है 

यह प्रश्नचिह्न नहीं है 
किसी द्रोणाचार्य की योग्यता पर 
किसी द्रोणाचार्य के ज्ञान पर 
यह तो वास्तविकता है 
दरअसल 
ज्ञान देने की चीज़ नहीं 
ज्ञान लेने की चीज़ है 
अर्जुन बनाया नहीं जाता 
अर्जुन बना जाता है 
अगर बनाया जा सकता अर्जुन 
तो भीड़ होती अर्जुनों की 
आखिर कौरव भी 
सहपाठी थे अर्जुन के 

अर्जुन बनने के लिए 
जरूरी होता है 
अर्जुन का एकलव्य होना 
हर अर्जुन में 
एक एकलव्य होता है 
हर एकलव्य 
अर्जुन बन सकता है 
यह निर्भर करता है द्रोणाचार्य पर 
वो एकलव्य को 
अर्जुन बनने देता है 
या फिर अर्जुन को 
बना देता है एकलव्य 

आज कमी नहीं द्रोणाचार्यों की 
हाँ, एकलव्य आज नहीं मिलते 
आज अँगूठा नहीं कटवाते शिष्य 
आँख दिखाते हैं 
एकलव्यों का मर जाना 
अर्जुनों का मर जाना है । 

दिलबाग विर्क 
*****

शनिवार, नवंबर 22, 2014

राम भरोसे

राम भरोसे चल रहा, मेरा भारत देश 
इसे लुटेरे लूटते, धर साधू का वेश। 
धर साधू का वेश, सभी ने भरी तिजौरी 
ठग, भ्रष्ट और चोर, करें हैं सीनाज़ोरी । 
कहता सबसे ' विर्क ', कौन अब किसको कोसे 
भारत देश महान, चले है राम भरोसे । 

दिलबाग विर्क 
*****

बुधवार, नवंबर 19, 2014

दिल पागल है

बड़ी उलझन है, बड़ी मुश्किल है 
सीने  में  बैठा  दिल  पागल  है । 

बेगानों  से  बढ़कर  हैं  अपने 
खामोश रहो, फ़िज़ा बोझिल है । 

जिसे भुलाना है, उसी को सोचूँ 
फिर पूछूँ, क्यों वो याद हर पल है ?

मुहब्बत की राह आसां तो नहीं 
यहाँ बेवफ़ाइयों की दलदल है । 

लोगों जैसा समझदार नहीं हूँ 
मेरे लिए तो वफ़ा ही मंजिल है । 

तमाचा है आदमियत के मुँह पर 
हो रहा ' विर्क ' जो कुछ आजकल है । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - काव्य गंगा 
संपादक - रविन्द्र शर्मा 
प्रकाशन - रवि प्रकाशन, बिजनौर ( उ.प्र. )
प्रकाशन वर्ष - 2008  




बुधवार, नवंबर 12, 2014

आओ दिल को चुप रहने की कहें

हो सके तो तुम भूल जाना उन्हें 
सपनों में ख़ुदा माना था जिन्हें । 

जिधर से आई है ये रेत ग़म की 
उधर जाने की कौन कहे तुम्हें । 

भूल जाओ ग़म का हर फ़साना 
मुस्कराना सदा, याद कर हसीं लम्हें । 
उफनता सागर जाने क्या करेगा 
आओ दिल को चुप रहने की कहें । 

अश्कों के कारवां को बुलाओ पास 
बेवफ़ा शहर में हम क्यों तन्हा रहें । 

वफ़ा के लिए मरना अपनी रस्म है 
उनकी रस्में ' विर्क ' हों मुबारक उन्हें । 

दिलबाग विर्क 
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काव्य संकलन - काव्य सुधा 
संपादक - प्रदीप मणि " ध्रुव "
प्रकाशन - मध्य प्रकाश नवलेखन संघ, भोपाल 
प्रकाशन वर्ष - 200 7 

मंगलवार, नवंबर 04, 2014

खुशियाँ जगमगाती हैं दिवाली में

दिलों को दीपमालाएँ लुभाती हैं दिवाली में 
जमीं को देख परियाँ मुस्कराती हैं दिवाली में |

जरूरी हार इनकी, ये अँधेरे हार जाते हैं 
शमाएँ मिल असर अपना दिखाती हैं दिवाली में |
मजे से ज़िंदगी जीना कभी तुम सीखना इनसे 
जवां दिल की उमंगें गीत गाती हैं दिवाली में |

यही सच, दौर कितना भी बुरा हो, बीत जाता है 
गमों को जीत, खुशियाँ जगमगाती हैं दिवाली में |

न समझो शोर इसको ' विर्क ' बच्चों के पटाखों का 
दबी-सी ख्बाहिशें आवाज़ पाती हैं दिवाली में |

दिलबाग विर्क 
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तरही मिसरे पर आधारित शे'र -
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गुरुवार, अक्तूबर 23, 2014

नियम ढूँढना आपका काम है

बेवफाई  तेरी  का  ये  अंजाम  है 
गूँजता महफ़िलों में, मेरा नाम है । 
क्या मिला पूछते हो, सुनो तुम जरा 
इश्क़ का अश्क़ औ' दर्द ईनाम है । 

लो, कई चेहरों से उठेगा नक़ाब 
आ गया अब मेरे हाथ में जाम है । 

हर तरफ दौर है नफरतों का यहाँ 
प्यार का लाज़मी आज पैगाम है । 

बात कहना मेरा काम था, कर दिया 
अब नियम ढूँढना आपका काम है । 

मान जाओ इसे, है हकीकत यही 
बद नहीं ' विर्क ', वो सिर्फ बदनाम है । 

दिलबाग विर्क 
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गुरुवार, अक्तूबर 16, 2014

तेरे पास आने के लिए

क्यों बहाना ढूँढता मुझको बुलाने के लिए 
मैं सदा तैयार, तेरे पास आने के लिए । 

देखना फिर गम-ख़ुशी कुछ फर्क डालेंगे नहीं 
चाहिए ज़िंदादिली बस, मुस्कराने के लिए । 
उम्र बीती पर मुहब्बत को समझ पाए नहीं 
मैं लिखा करता नहीं, उनको सुनाने के लिए । 

खुद सुधरना शर्त पहली, बाद की बातें सभी 
ठीक होगा जो करोगे फिर जमाने के लिए । 

सच बड़ा गहरा दबा है, साधना माँगे बहुत 
उम्र छोटी, ज़िंदगी का राज़ पाने के लिए । 

तू वफ़ा कर, इम्तिहां लेती रहेगी ज़िंदगी 
आ गए सब ' विर्क ' तुझको आजमाने के लिए । 

दिलबाग विर्क 
*****

रविवार, अक्तूबर 05, 2014

मुझे जाम पकड़ा दिया

एक यही मुकाम बाकी था, वो भी दिला दिया 
तेरी मुहब्बत ने मुझे जाम पकड़ा दिया । 

लुटा चमन तो ख़ुशी का मशविरा लगा ऐसे 
रुपया देकर जैसे किसी बच्चे को बहला दिया । 

बीते वक्त को भुला न पाया मैं शायद इसलिए 
इस मौजूदा वक़्त ने अब मुझे भुला दिया । 

कितना साफ़ झूठ है कि प्यार कुछ नहीं देता 
इसने मुझे सिसकियों का लम्बा सिलसिला दिया । 

दिल में ताजा रहे सदा याद तेरी इसलिए 
भरने को हुआ जब जख्म तो सहला दिया । 

तेरी हर हसरत ' विर्क ' खुदा करे हो पूरी 
अपनी हसरतों को मैंने मिट्टी में मिला दिया । 

दिलबाग विर्क 
******** 
काव्य संकलन - काव्य सुधा 
संपादक - प्रदीप मणि " ध्रुव "
प्रकाशन - मध्य प्रकाश नवलेखन संघ, भोपाल 
प्रकाशन वर्ष - 200 7 

शनिवार, सितंबर 27, 2014

थोड़े खोटे, थोड़े खरे हो जाएँ

कभी सोचते हैं हम, ओढ़कर नक़ाब मसखरे हो जाएँ 
भूल ज़िंदगी के ग़म तमाम, ज़िंदगी से परे हो जाएँ । 
अपनी तमन्नाओं के वजूद का मिटाकर नामो-निशां 
किसी के हाथों की मेंहदी, बाँहों के गजरे हो जाएँ । 

 गर सोच के मंजर हक़ीक़त में बदलें तो ठीक, नहीं तो 
छोड़कर सारी समझदारियाँ चलो हम सिरफिरे हो जाएँ । 

पीते हैं दिन-रात मय साकी, बस इतना मक़सद है 
हम बदनाम तो पहले ही बहुत हैं, अब बुरे हो जाएँ । 

तुम मुहब्बत को छोड़ो, नफरत को आजमाकर देखो 
मुहब्बत में उजड़े हैं, शायद नफरत से हरे हो जाएँ । 

खरों के साथ-साथ खोटे भी चलते हैं इस जमाने में 
जीने के लिए ' विर्क ' थोड़े खोटे, थोड़े खरे हो जाएँ । 
दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - काव्य गौरव 
संपादक - मोहन कुमार 
प्रकाशक - आकृति प्रकाशन, पीलीभीत ( उ. प्र. )
प्रकाशन वर्ष - 2007
*****

रविवार, सितंबर 21, 2014

कोई यहाँ दिल लूटता कब था

ख़ुदा तू ही, सिवा तेरे किसी को पूजता कब था 
तेरा दर छोड़, मेरा दूसरा कोई पता कब था । 

करें शिकवा किसी से किसलिए अपनी खता का हम 
लुटे हम शौक से, कोई यहाँ दिल लूटता कब था । 

उसे तो फ़िक्र थी खुद की, सदा सोचा किया खुद को 
मेरी मजबूरियों को वो समझना चाहता कब था । 

सदा से बस यही फितरत रही है राजनेता की 
बना सेवक, मगर सत्ता मिली तो पूछता कब था । 

मुझे बस प्यार के दो बोल मिल जाएँ, यही चाहा 
ख़ुदा से ' विर्क ' मैं इसके सिवा कुछ माँगता कब था । 

दिलबाग विर्क 
*****

गुरुवार, सितंबर 18, 2014

दीवानों की हस्ती क्या

इश्क़ बताए, होती है बुत्तपरस्ती क्या 
दीवानापन क्या, दीवानों की हस्ती क्या । 

गीत मुहब्बत के धड़कें न जहाँ साँसों में 
उस बस्ती को कहना आदम की बस्ती क्या । 

गहरे उतरो, जो पाना चाहो तुम मोती 
चिंता क्यों, ये बाज़ी महँगी क्या, सस्ती क्या । 

कुछ न मिलेगा तुझको ' विर्क ' अधूरेपन से 
जब तक भूल न जाएँ खुद को, वो मस्ती क्या । 

दिलबाग विर्क 
*********

मंगलवार, सितंबर 16, 2014

मिलेंगे यहाँ पर शिकारी बहुत ।

चढ़ी है वफ़ा की खुमारी बहुत 
खबर है,  मिले हार भारी बहुत । 

शिकायत न कर यार, खुद रख नज़र 
मिलेंगे यहाँ पर शिकारी बहुत । 

उसी ने दिए थे हमें जख्म ये 
करे आज तीमारदारी बहुत । 

मेरे ख्याल किस रंग में ढल गए 
न उतरी, नज़र थी उतारी बहुत । 

न छोड़े किसी को कभी वक्त ये 
दिखाओ भले होशियारी बहुत । 

तमाशा दिखाएँ, करें कुछ नहीं
यहाँ ' विर्क ' से हैं मदारी बहुत । 

दिलबाग विर्क 
***** 

बुधवार, सितंबर 10, 2014

हो सका तो जख़्म छुपाऊँगा

पता नहीं इस खेल में क्या पाउँगा 
मगर मुहब्बत में किस्मत आजमाऊँगा 
तिनका हूँ तिनके की औकात न पूछ 
हवा चली तो न जाने किधर जाऊँगा । 

आना-न-आना तुम्हारी मर्जी होगी 
कल भी बुलाया था, कल फिर बुलाऊँगा । 

लोगों के हँसने से भी क्या होना है 
फिर भी हो सका तो जख़्म छुपाऊँगा । 

समेटना ही होगा ग़म आगोश में 
प्यार रुसवा होगा अगर अश्क़ बहाऊँगा । 

वफ़ा की सलीब ' विर्क ' कंधों पर होगी 
जब भी लौटकर तेरे शहर आऊँगा । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - काव्य गौरव 
संपादक - मोहन कुमार 
प्रकाशन - आकृति प्रकाशन , पीलीभीत ( उ. प्र. )
प्रकाशन वर्ष - 2007 

बुधवार, सितंबर 03, 2014

उसूल तेरे शहर के

काँटे बनकर चुभे हैं फूल तेरे शहर के 
मेरी मौत बन गए उसूल तेरे शहर के । 

अरमां मेरे प्यार के चौराहे पर लुट गए 
तमाशबीन थे शख़्स मा'कूल तेरे शहर के । 

ये बदर्दी क्या जानें दर्द किसी के दिल का 
ख़ुद में ही हैं लोग मशगूल तेरे शहर के । 

वफ़ा को उड़ा ले गई आँधी बेवफाई की 
सच की दास्तां बन गए अमूल तेरे शहर के । 

प्यार करना गुनाह था इस बस्ती-ए आदम में 
आँसुओं से चुकाए महसूल तेरे शहर के । 

तड़प-तड़प कर मरने की दी ' विर्क ' सज़ा तूने 
सब जुल्मो-सितम किए हैं कबूल तेरे शहर के 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - शून्य से शिखर तक 
संपादक - आचार्य शिवनारायण देवांगन ' आस '
प्रकाशन - महिमा प्रकाशन , दुर्ग ( छत्तीसगढ़ )
प्रकाशन वर्ष - 2007

मंगलवार, अगस्त 26, 2014

तेरा नाम लेकर धड़कती है धड़कन

गर सुलझा सके तो सुलझा मेरी उलझन 
तेरी याद को मैं दोस्त कहूँ या दुश्मन |

गम तो थे मगर ये सब थे छोटे - छोटे 
कैसी ये जवानी है, छीन लिया बचपन |

तुझे भूल जाना मेरे वश में कब है 
तेरा नाम लेकर धड़कती है धड़कन | 

बिखर गई सारी उम्मीदें देखते-देखते 
कोई काम आ न सका मेरा दीवानापन |

यूं तो पत्थरों में भी ख़ुदा रहता है 
अपने पास गर हो देखने वाला मन |

पल-पल बदलें हैं ' विर्क ' हालात यहाँ 
सहरा लगती है ये जिंदगी कभी गुलशन | 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - शून्य से शिखर तक 
संपादक - आचार्य शिवनारायण देवांगन ' आस '
प्रकाशन - महिमा प्रकाशन , दुर्ग ( छत्तीसगढ़ )
प्रकाशन वर्ष - 2007

मंगलवार, अगस्त 19, 2014

मेरा ग़म मुझे उठाना होगा

किस दर्द का जिक्र छेड़ूँ मैं, कौन-सी दवा बताओगे ?
जाने-अनजाने तुम भी तो मेरे ज़ख़्म सहलाओगे । 

भर दोगे अश्क़ मेरी आँखों में, खुद को भी रुलाओगे 
छोड़ो मुझे मेरे हाल पर, इस दास्तां से क्या पाओगे ?
टोकरी नहीं फूलों की जो मेरी जगह उठा लो तुम 
मेरा ग़म मुझे उठाना होगा, तुम कैसे उठाओगे ?

मानने को तैयार हूँ मैं सब मशविरे मगर बताओ 
तुम दिल के कंगूरों से, क्या यादों को भी उड़ाओगे ?

तुम्हारे ज़हन में होंगे खुद के हजारों मसले इसलिए 
याद रखोगे मुझे कुछ देर, फिर सब कुछ भुलाओगे । 

सोचोगे ' विर्क ' बाद में, यूँ ही वक़्त जाया किया मैंने 
पल-दो-पल बातें करके मुझसे, तुम फिर पछताओगे । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - अंतर्मन 
प्रकाशक - अनिल शर्मा ' अनिल '
प्रकाशन - अमन प्रकाशन, धामपुर { बिजनौर }
प्रकाशन वर्ष - 2007 

मंगलवार, अगस्त 12, 2014

चुप रहो, चुप रहो, चुप रहो

बात के मा 'ने बदलने के लिए बस काफी है वो 
मेरे होंठों, तेरे कानों के बीच फ़ासिला है जो । 

ये बात और है, हमने चुन लिए अलग-अलग रास्ते 
यूँ तो बचपन से हमें सिखाया गया था, मिलकर चलो । 

आदत बन गई है , राह चलती मुश्किलों को बुलाना 
मालूम नहीं, किससे सीखा हमदम बनाना दर्द को । 

दिल के दरवाजे पर जब दस्तक देती है तेरी याद 
लब खामोश हो जाते हैं और आँख पड़ती है रो । 

ख़ुशी बाँटना न चाहें हम, गम बँटाता नहीं कोई 
झूठी लगती है ये बात, जो भी मिले उसे बाँट लो । 

किसे ठहराऊँ कसूरवार ' विर्क ' अपनी गलतियों के लिए 
बारहा कहा था खुद से, चुप रहो, चुप रहो, चुप रहो । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - अंतर्मन 
संपादक - अनिल शर्मा ' अनिल '
प्रकाशन - अमन प्रकाशन, धामपुर { बिजनौर }
प्रकाशन वर्ष - 2007  

बुधवार, अगस्त 06, 2014

अकेला चाँद ही नहीं दाग़दार

बनने  को  तैयार हूँ  मैं  कर्जदार 
दे सकता है तो दे ख़ुशी उधार |
हर शख्स के दिल में दाग़ है यहाँ 
अकेला चाँद ही नहीं दाग़दार |

दहशत के बादल हर वक्त छाए रहे 
इस मुल्क में कब था मौसम खुशगवार |

ज़िन्दगी की हकीकत है बस यही 
चंद खुशियाँ और गम बेशुमार |

आदमियों के धंधों को देखकर 
हो रही है आदमियत शर्मसार |

कोई हल नहीं निकले है मसलों का 
पुकार सके तो ' विर्क ' खुदा को पुकार |

दिलबाग विर्क 
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काव्य संकलन - प्रतीक्षा रहेगी 
संपादक - जयसिंह अलवरी 
प्रकाशक - राहुल प्रकाशन, सिरगुप्पा { कर्नाटक }
प्रकाशन वर्ष - मार्च 2007 
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मंगलवार, जुलाई 29, 2014

पूछती है मेरी वफ़ा मुझे

किस बात की दे रहा सज़ा मुझे 
है क्या गुनाह मेरा, बता मुझे । 
हिम्मत नहीं अब और सहने की 
 रुक भी जा, ऐ दर्द न सता मुझे । 

या ख़ुदा ! अदना-सा इंसान हूँ 
टूट जाऊँगा न आजमा मुझे । 

क्यों चुप रहा उसकी तौहीन देखकर 
ये पूछती है मेरी वफ़ा मुझे । 

आखिर ये बेनूरी तो छटे 
किन्हीं बहानों से बहला मुझे । 

एक अनजाना - सा खौफ हावी है 
अब क्या कहूँ ' विर्क ' हुआ क्या मुझे । 

दिलबाग विर्क 
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काव्य संकलन - प्रतीक्षा रहेगी 
संपादक - जयसिंह अलवरी 
प्रकाशक - राहुल प्रकाशन, सिरगुप्पा { कर्नाटक }
प्रकाशन वर्ष - मार्च 2007 
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बुधवार, जुलाई 16, 2014

तड़पने दिया दिल को , मैंने समझाया ही नहीं ।

       क्यों तेरे दिल को मुझ पर ऐतबार आया ही नहीं 
       मैंने  पूछा  था  तुझसे ,  तूने  बताया   ही  नहीं  । 
       
       बिखर गया था आशियाना मेरा देखते - देखते
       न तूने की कोशिश ,  मैंने भी बचाया ही नहीं ।  

       इस दुनिया में जीने के बहाने हैं बहुत मगर
       बहानों के खिलौनों से दिल बहलाया ही नहीं । 

       हर  वक्त  उमड़ता  रहा  तूफां  सीने  में  मेरे
       तड़पने दिया दिल को , मैंने समझाया ही नहीं ।

       हर किसी को क्यों बताएं दर्दे - दिल की दास्तां 
       वो क्या जानेंगे, जिन्होंने जख़्म खाया ही नहीं । 

       तेरा प्यार आखिरी था ' विर्क ' मेरी ज़िंदगी में 
       मैंने फिर कभी खुद को आजमाया ही नहीं । 
                  
                                दिलबाग                                            
                                *******

काव्य संकलन - अभिव्यक्ति 
संपादक - अनिल शर्मा ' अनिल '
प्रकाशक - अमन प्रकाशक, धामपुर - 246761
प्रकाशन वर्ष - { 2006 }

                                ******

मंगलवार, जुलाई 08, 2014

इस किनारे पर जब कोई तूफां उठा


          मेरा बोलना मुझे कितना महँगा पड़ा
          मैं लफ़्ज-दर-लफ़्ज खोखला होता गया |

          मैंने की थी जिनसे उम्मीद मुहब्बत की 
          पैसा उनका ईमान था, पैसा उनका खुदा |

          दोस्त  बाँट  लेते  हैं  दर्द  दोस्तों  का 
          देर हो चुकी थी जब तलक ये वहम उड़ा |

          कुछ बातें खुद ही देखनी होती हैं मगर 
          मैं हवाओं से उनका रुख पूछता रहा |
          उस किनारे पर तब गूंजें हैं कहकहे 
          इस किनारे पर जब कोई तूफां उठा |

          तन्हा होना ही था किसी-न-किसी मोड़ पर 
          यूं तो कुछ दूर तक वो भी मेरे साथ चला |

          तुम मेरी वफ़ाओं का हश्र न पूछो ' विर्क '
          मेरा नाम हो गया है आजकल बेवफ़ा |

                                दिलबाग                                             
                                *******

काव्य संकलन - अभिव्यक्ति 
संपादक - अनिल शर्मा ' अनिल '
प्रकाशक - अमन प्रकाशक, धामपुर - 246761
प्रकाशन वर्ष - { 2006 }

                                ******

सोमवार, मई 05, 2014

कसम खाने को है या निभाने को है


ये दिल मचलकर बाहर आने को है
इसकी बेबसी मुझे रुलाने को है |

दुनिया ने छीन ली छत्त सिर से
और आसमां बिजली गिराने को है |

उलझ गया हूँ मैं, कोई बताए मुझे
कसम खाने को है या निभाने को है |

लापरवाहियाँ मैंने छोड़ी ही नहीं
तमाशबीन फिर आग लगाने को है |

अमन, ख़ुशी, प्यार की उम्मीदों का महल
दौर – ए - दहशत में चरमराने को है |

किसी को अब परवाह नहीं रही इसकी
वफ़ा का फूल ' विर्क ' मुरझाने को है |
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