बुधवार, नवंबर 19, 2014

दिल पागल है

बड़ी उलझन है, बड़ी मुश्किल है 
सीने  में  बैठा  दिल  पागल  है । 

बेगानों  से  बढ़कर  हैं  अपने 
खामोश रहो, फ़िज़ा बोझिल है । 

जिसे भुलाना है, उसी को सोचूँ 
फिर पूछूँ, क्यों वो याद हर पल है ?

मुहब्बत की राह आसां तो नहीं 
यहाँ बेवफ़ाइयों की दलदल है । 

लोगों जैसा समझदार नहीं हूँ 
मेरे लिए तो वफ़ा ही मंजिल है । 

तमाचा है आदमियत के मुँह पर 
हो रहा ' विर्क ' जो कुछ आजकल है । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - काव्य गंगा 
संपादक - रविन्द्र शर्मा 
प्रकाशन - रवि प्रकाशन, बिजनौर ( उ.प्र. )
प्रकाशन वर्ष - 2008  




4 टिप्‍पणियां:

Malhotra Vimmi ने कहा…

सुंदर पंक्तियां।
एक एक शब्द भाव में भींगे हुए।

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

मूढ़ जनता की विचारहीनता और अंधश्रद्धा का परिणाम है यह !

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बहुत सुंदर

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (24-11-2014) को "शुभ प्रभात-समाजवादी बग्घी पे आ रहा है " (चर्चा मंच 1807) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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