बुधवार, नवंबर 12, 2014

आओ दिल को चुप रहने की कहें

हो सके तो तुम भूल जाना उन्हें 
सपनों में ख़ुदा माना था जिन्हें । 

जिधर से आई है ये रेत ग़म की 
उधर जाने की कौन कहे तुम्हें । 

भूल जाओ ग़म का हर फ़साना 
मुस्कराना सदा, याद कर हसीं लम्हें । 
उफनता सागर जाने क्या करेगा 
आओ दिल को चुप रहने की कहें । 

अश्कों के कारवां को बुलाओ पास 
बेवफ़ा शहर में हम क्यों तन्हा रहें । 

वफ़ा के लिए मरना अपनी रस्म है 
उनकी रस्में ' विर्क ' हों मुबारक उन्हें । 

दिलबाग विर्क 
******** 
काव्य संकलन - काव्य सुधा 
संपादक - प्रदीप मणि " ध्रुव "
प्रकाशन - मध्य प्रकाश नवलेखन संघ, भोपाल 
प्रकाशन वर्ष - 200 7 

6 टिप्‍पणियां:

Malhotra vimmi ने कहा…

अश्कों के कारवां को बुलाओ पास

बेवफ़ा शहर में हम क्यों तन्हा रहें ।

बेहद खूबसूरत पंक्तियां।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वाह ... लाजवाब शेर हैं ग़ज़ल के ...

कविता रावत ने कहा…

वफ़ा के लिए मरना अपनी रस्म है
उनकी रस्में ' विर्क ' हों मुबारक उन्हें । .
...लाजवाब...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (29-11-2020) को  "असम्भव कुछ भी नहीं"  (चर्चा अंक-3900)   पर भी होगी। 
-- 
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
--   
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
--
सादर...! 
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
--

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह

Onkar ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति

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