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सोमवार, मार्च 21, 2016

धड़कनों पर तेरा नाम है

याद है, जाम है, शाम है 
दर्द को आज आराम है । 

क्या मुहब्बत इसी को कहें 
धड़कनों पर तेरा नाम है । 

दोस्ती कर रहा किसलिए 
प्यार है या तुझे काम है । 

जिस्म तक रह गई सोच बस 
आजकल इश्क़ बदनाम है । 

बात दिल की सुनो तो सही 
गूंजता ' विर्क ' इल्हाम है । 

दिलबागसिंह विर्क 
******
इल्हाम - हृदय में आई ईश्वर की बात, 
देववाणी, आकाशवाणी 

रविवार, दिसंबर 28, 2014

ज़िंदगी दाँव पर लगानी है

ख़ूबसूरत बनी कहानी है
चढ़ गई आग-सी जवानी है ।

मैं जुबां पर यकीं न कर पाऊँ
बात दिल की उसे बतानी है ।
इश्क़ ही हल मिला मुझे इसका
ज़िन्दगी दाँव पर लगानी है ।

प्यार बरसे दुआ यही माँगी
नफ़रतों की अगन बुझानी है ।

आँख के सामने उसे पाया
जब किया इश्क़, याद आनी है ।

बस हमें सीखना इसे जीना
ज़िन्दगी तो बड़ी सुहानी है ।

मारना सीख लें अहम् अपना
' विर्क ' दीवार जो गिरानी है ।

दिलबाग विर्क
* * * * *

गुरुवार, अक्टूबर 23, 2014

नियम ढूँढना आपका काम है

बेवफाई  तेरी  का  ये  अंजाम  है 
गूँजता महफ़िलों में, मेरा नाम है । 
क्या मिला पूछते हो, सुनो तुम जरा 
इश्क़ का अश्क़ औ' दर्द ईनाम है । 

लो, कई चेहरों से उठेगा नक़ाब 
आ गया अब मेरे हाथ में जाम है । 

हर तरफ दौर है नफरतों का यहाँ 
प्यार का लाज़मी आज पैगाम है । 

बात कहना मेरा काम था, कर दिया 
अब नियम ढूँढना आपका काम है । 

मान जाओ इसे, है हकीकत यही 
बद नहीं ' विर्क ', वो सिर्फ बदनाम है । 

दिलबाग विर्क 
*****

गुरुवार, अक्टूबर 16, 2014

तेरे पास आने के लिए

क्यों बहाना ढूँढता मुझको बुलाने के लिए 
मैं सदा तैयार, तेरे पास आने के लिए । 

देखना फिर गम-ख़ुशी कुछ फर्क डालेंगे नहीं 
चाहिए ज़िंदादिली बस, मुस्कराने के लिए । 
उम्र बीती पर मुहब्बत को समझ पाए नहीं 
मैं लिखा करता नहीं, उनको सुनाने के लिए । 

खुद सुधरना शर्त पहली, बाद की बातें सभी 
ठीक होगा जो करोगे फिर जमाने के लिए । 

सच बड़ा गहरा दबा है, साधना माँगे बहुत 
उम्र छोटी, ज़िंदगी का राज़ पाने के लिए । 

तू वफ़ा कर, इम्तिहां लेती रहेगी ज़िंदगी 
आ गए सब ' विर्क ' तुझको आजमाने के लिए । 

दिलबाग विर्क 
*****

रविवार, सितंबर 21, 2014

कोई यहाँ दिल लूटता कब था

ख़ुदा तू ही, सिवा तेरे किसी को पूजता कब था 
तेरा दर छोड़, मेरा दूसरा कोई पता कब था । 

करें शिकवा किसी से किसलिए अपनी खता का हम 
लुटे हम शौक से, कोई यहाँ दिल लूटता कब था । 

उसे तो फ़िक्र थी खुद की, सदा सोचा किया खुद को 
मेरी मजबूरियों को वो समझना चाहता कब था । 

सदा से बस यही फितरत रही है राजनेता की 
बना सेवक, मगर सत्ता मिली तो पूछता कब था । 

मुझे बस प्यार के दो बोल मिल जाएँ, यही चाहा 
ख़ुदा से ' विर्क ' मैं इसके सिवा कुछ माँगता कब था । 

दिलबाग विर्क 
*****

गुरुवार, सितंबर 18, 2014

दीवानों की हस्ती क्या

इश्क़ बताए, होती है बुत्तपरस्ती क्या 
दीवानापन क्या, दीवानों की हस्ती क्या । 

गीत मुहब्बत के धड़कें न जहाँ साँसों में 
उस बस्ती को कहना आदम की बस्ती क्या । 

गहरे उतरो, जो पाना चाहो तुम मोती 
चिंता क्यों, ये बाज़ी महँगी क्या, सस्ती क्या । 

कुछ न मिलेगा तुझको ' विर्क ' अधूरेपन से 
जब तक भूल न जाएँ खुद को, वो मस्ती क्या । 

दिलबाग विर्क 
*********

मंगलवार, सितंबर 16, 2014

मिलेंगे यहाँ पर शिकारी बहुत ।

चढ़ी है वफ़ा की खुमारी बहुत 
खबर है,  मिले हार भारी बहुत । 

शिकायत न कर यार, खुद रख नज़र 
मिलेंगे यहाँ पर शिकारी बहुत । 

उसी ने दिए थे हमें जख्म ये 
करे आज तीमारदारी बहुत । 

मेरे ख्याल किस रंग में ढल गए 
न उतरी, नज़र थी उतारी बहुत । 

न छोड़े किसी को कभी वक्त ये 
दिखाओ भले होशियारी बहुत । 

तमाशा दिखाएँ, करें कुछ नहीं
यहाँ ' विर्क ' से हैं मदारी बहुत । 

दिलबाग विर्क 
***** 

मंगलवार, अप्रैल 08, 2014

महफ़िल में तेरा नाम उछाला न गया

दिल में तूफ़ान उठा जो, टाला न गया 
टूट गया मैं, खुद को संभाला न गया |

तू चुपके से आया था मेरे दिल में 
दिल से तुझको ताउम्र निकाला न गया | 

सोच न पाया, नुक्सान-नफे की बातें 
जग के साँचे में खुद को ढाला न गया |

 आँसू पी लेना ठीक लगा था मुझको
महफिल में तेरा नाम उछाला न गया |

मेरे सिर चढ़कर बोले जादू तेरा 
बातों में तेरा यार हवाला न गया |

यूँ तो हर ओर अँधेरा है गम का पर 
तेरी यादों का ' विर्क ' उजाला न गया |

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रविवार, अप्रैल 06, 2014

मैं कहूँ मिसरा, बना दे शे'र तू

उम्र  से  है  बेहतर ,  ये  एक  पल 
चल जहाँ तक हो सके, तू साथ चल । 

सीख  ले  जीना , मिली है जिंदगी 
वक्त का पहिया चले कल, आज, कल । 

है मुहब्ब्त का तरीका बस यही 
प्यार पाने के लिए खुद को बदल । 

गलतियों को देखना तू छोड़ दे 
भूलकर सब कुछ , कभी तो कर पहल । 

ये सियानफ मार डालेगी तुझे 
दिल न बन नादान, बच्चे-सा मचल । 

मैं कहूँ मिसरा, बना दे शे'र तू 
इस तरह से ' विर्क ' पूरी हो ग़ज़ल । 
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शुक्रवार, अप्रैल 04, 2014

रात आँसू बहाती रही

दिल करे लोभ, दुनिया लुभाती रही 
हम फँसे जाल में, ये फँसाती रही |

इस चमन में जहाँ गूँज मातम रहा 
देख बुलबुल वहीँ गीत गाती रही |

खून है वो जिगर का, न शबनम कहो 

तोडना चाहती है मेरा हौंसला 

रोक पाई नहीं मंजिलें भी मुझे 
नित नई राह मुझको बुलाती रही |

मैं बड़े गौर से सुन रहा हूँ इसे 
जिन्दगी ' विर्क ' सुख-दुख सुनाती रही |
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मंगलवार, दिसंबर 24, 2013

आँखों में मैखाने

हर सू , हर शै में हमको वो दिखते हैं
जब भी दिल जुड़ते, नैन मिला करते हैं ।

इश्क़ किया जाता कैसे, सुन लो यारो
कुछ तो कहते परवाने, जब जलते हैं ।

किसमें दम इतना, कौन मुकाबिल तेरे
चाँद - सितारे  तेरा  पानी  भरते  हैं  ।

पीने  वाले  बदनाम  हुए  हैं  नाहक
वो आँखों में मैखाने लिए फिरते हैं ।

यूँ  लगता  है,  तेरे  गेसू  हों  जैसे
जब पगलाने वाले बादल घिरते हैं ।

दर्द  बँटा  लेते  हैं  जब  हम औरों  का
जीवन में विर्क खुशी के गुल खिलते हैं ।

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सोमवार, दिसंबर 16, 2013

वफा के खिलौने पुराने हुए


बड़ी गुर्बज़ी के जमाने हुए 
                      शराफत, अदब तो फ़साने हुए । 

                      वफा के लिए कौन मिटता यहाँ 
                      वफा के खिलौने पुराने हुए । 

                     न ढूँढा गया तोड़ इस चाल का 
                     नए रोज उनके बहाने हुए । 

                    जहाँ दिन ढला या कदम थक गए 
                    वहीं पर हमारे ठिकाने हुए । 

                    नफा देखते लोग हर बात में 
                    सभी आज बेहद सियाने हुए । 

                    यहाँ आम जब से हुई नफरतें
                    न फिर ' विर्क ' मौसम सुहाने हुए । 

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गुर्बज़ी - मक्कारी 
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