गुरुवार, दिसंबर 31, 2015

कुछ तो नया करो

नए साल में यारो कुछ तो नया करो 
फिजा सुधरे इस देश की, तुम दुआ करो | 

बड़ी खूबसूरत लगेगी ये जिंदगी 
मुहब्बत को समझो, वफ़ाएँ किया करो | 

सिखाती सदा ठोकरें चलने का हुनर 
गिरो जब कभी, हौंसले से उठा करो | 

न बोलो कभी झूठ, ये जीतता नहीं 
हो मुश्किल भले, राह सच की चला करो | 

करे जो, भरे वो, यही तो नियम सदा 
यही सोच हो ' विर्क ' , बस ख़ुद वफ़ा करो | 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, दिसंबर 02, 2015

प्रीत की रीत

चाहत पर होना कुर्बान, प्रीत की रीत है 
इस खेल का हाल अनोखा, हार तो जीत है । 
आँख शरारत करती है 
और सज़ा दिल पाता है 
देता मक़सद जीने का 
पर पागल कहलाता है 
पागल की सुन यार मेरे, यही तो मीत है

दौलत के अंबार लगे 
ख़ुशी रही बनकर सपना 
मतलब के हैं यार बहुत 
नहीं मगर कोई अपना 
हिसाब लगाओ तुम उसका, गई जो बीत है 

दिल सोचे बस प्यारे को 
सूखा हो चाहे सावन 
देह से न जोड़ो इसको 
प्यार सदा होता पावन 
नाचो संग ताल मिलाकर, प्रेम संगीत है 

© दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, नवंबर 18, 2015

सहने की सीमा के बाद

ये न सोचो
क़लम चलाने वाले हाथ
बंदूक चलाना नहीं जानते

जानते हैं क़लम चलाने वाले
बंदूकों से हल नहीं होते मसले
बस यही सोच
बंदूक उठाने से रोकती है उन्हें
मगर इसे कमजोरी न समझना
किसी भी क़लम चलाने वाले की

याद रखना
सहने की सीमा होती है
और सीमा गुजरने के बाद
ट्रिगर दबाना 
कहीं आसान होता है
क़लम चलाने से ।
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दिलबाग सिंह विर्क 

बुधवार, सितंबर 16, 2015

एक प्रयास और......

दोस्तो ! मेरा कविता-संग्रह " महाभारत जारी है " अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद से प्रकाशित होकर बाज़ार में उपलब्ध हो गया है । अगर आप इसे पढ़ना चाहे तों निम्न स्थानों से ऑनलाइन खरीद सकते हैं - 
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धन्यवाद  
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बुधवार, अगस्त 12, 2015

तू मुझको सुन

मेरे अल्फ़ाज़ों पर न जा, तू मुझको सुन 
सच का तराना गाए सदा, धड़कन की धुन । 
आँसुओं में लय-ताल है 
हँसी का भी संगीत है 
ग़म मिले या फिर ख़ुशी 
गाया सदा गीत है 
जज़्बात होंगे, न हों भले बह्र के रुकुन 
मेरे अल्फ़ाज़ों पर न जा, तू मुझको सुन । 
तू जीत पर रख नज़र 
हार से मत हारना 
ज़िंदगी का ले मज़ा 
नहीं ख़ुद को मारना 
काँटों की चुभन सह ले, और फूल चुन 
मेरे अल्फ़ाज़ों पर न जा, तू मुझको सुन । 
बीते पल न लौटते 
बीता वक़्त भूल जा 
तू कर शुरुआत नई 
लेकर इरादा नया 
सोच बात नई उड़ान की, नए ख्बाव बुन 
मेरे अल्फ़ाज़ों पर न जा, तू मुझको सुन । 

दिलबाग विर्क 
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मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " से 

बुधवार, जुलाई 29, 2015

मैं तुझे गुनगुनाता हूँ

साँस नहीं लेता, मैं तुझे अर्घ्य चढ़ाता हूँ 
गीत नहीं गाता, मैं तुझे गुनगुनाता हूँ । 
     फूलों में तू है 
          बूंदों में तू है 
               तेरी है धरती 
                    तेरा है नभ भी 
ज़र्रे-ज़र्रे में तेरा वजूद पाता हूँ 
गीत नहीं गाता, मैं तुझे गुनगुनाता हूँ ।
     सुख-दुःख आते हैं 
              आकर जाते हैं 
                   ठहरा कब कुछ है 
                          तेरा सब कुछ है 
जीवन जो पाया, उसकी ख़ुशी मनाता हूँ 
गीत नहीं गाता, मैं तुझे गुनगुनाता हूँ । 
      मैं हूँ दीवाना 
             जैसे परवाना 
                    जलना आदत है 
                           इश्क़ बुरी लत है 
फूला न समाऊँ, जब तेरा कहलाता हूँ 
गीत नहीं गाता, मैं तुझे गुनगुनाता हूँ । 

                    दिलबाग विर्क 
                     *********
मेरे और कृष्ण कायर द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " में से  

बुधवार, जुलाई 22, 2015

कसक, जलन, गम का मौसम न गया

दिखते हैं यहाँ पर हमदम बहुत 
मगर देते हैं लोग जख्म बहुत | 
दिखाकर ख़ुशी की झलक अक्सर 
दिए हैं इस ज़िन्दगी ने गम बहुत | 

वो बेवफ़ा था, चला गया छोड़कर 
फिर भी उसके लिए रोए हम बहुत | 

हम सलामत हैं, ये अजूबा है 
करने वाले ने किए थे सितम बहुत | 

कसक, जलन, गम का मौसम न गया 
आए और चले गए मौसम बहुत | 

मुकद्दर से ' विर्क ' कब तक लड़ता 
इस राह में थे पेचो - ख़म बहुत | 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " से 

बुधवार, जुलाई 08, 2015

ग़म का दरवान

कोई अजूबा तो नहीं, न हो बेमतलब हैरान 
इश्क़ के सिर पर होता है हिज्र का आसमान । 
पहलू में बैठा हो महबूब और फ़ुर्सत भी हो 
कभी-कभार होती है ज़िंदगी इतनी मेहरबान । 

शायद ख़ुदा देखना चाहता है हौंसला मेरा 
ख़ुशियों के दरवाजे पर मिले ग़म का दरवान । 

तन्हाई को मेरे पास फटकने ही नहीं दिया 
किया तेरी याद ने मुझ पर कितना बड़ा अहसान । 

किसी मुजरिम की तरह कटघरे में खड़े रहे 
और हमारी किस्मत हमें सुनाती रही फ़रमान । 

फ़रेब हैं यहाँ का हुनर, फ़रेब ही यहाँ का दस्तूर 
तुम भी सजा लेना ' विर्क ' कोई फ़रेब की दुकान । 

दिलबाग विर्क 
*****

मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज्बात " से 

बुधवार, जुलाई 01, 2015

इतनी हल्की मेरी चाहत नहीं

माना तुझे अब मुझसे उल्फ़त नहीं 
फिर भी मैं कर सकता नफ़रत नहीं । 
तेरा चेहरा खिला रहे सदा ही 
इसके सिवा कोई भी हसरत नहीं । 

बदले में माँगे तुझसे क़ीमत 
इतनी हल्की मेरी चाहत नहीं । 

बेहतर है, खुद ही संभलकर रहें 
लोगों को किसी की मुरव्वत नहीं । 

तेरे ग़म में इतना उलझा हूँ मैं 
तुझे सोचने तक की फ़ुर्सत नहीं । 

मेरी वफ़ा ' विर्क ' मेरा साथ छोड़े 
होगी इससे बढ़कर क़यामत नहीं । 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " से 


बुधवार, जून 24, 2015

पत्थरों में ख़ुदा पाना है

इस दिल का दर्द क्या तूने कभी जाना है 
बेचैन है ये , तन्हा है , दीवाना है | 

मुहब्बत गुजरे ऐसी कैफ़ियत से अक्सर 
एक तरफ महबूब, दूसरी तरफ जमाना है | 
इबादत में हर्फ़ दुई का न आने देना 
अगर तुम्हें पत्थरों में ख़ुदा पाना है | 

तमन्ना है मुहब्बत का मुक़ाम पाने की 
इसके लिए ज़िंदगी को दाँव पर लगाना है 

बड़ी बेसब्री से है इंतज़ार उनका 
उनसे कुछ सुनना, उन्हें कुछ सुनाना है | 

मक़सद जीने का पाने के लिए ' विर्क ' हमें 
किसी का होना, किसी को अपना बनाना है |

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " से  

बुधवार, जून 17, 2015

रोग बड़ा पुराना हो गया

धड़कने हुई उधार जब से दिल दीवाना हो गया 
ज़िंदगी के नाम फिर ग़म का फ़साना हो गया । 

पहले सौग़ात समझते रहे मुहब्बत की मर्ज़ को 
अब क्या होगा इलाज, रोग बड़ा पुराना हो गया । 
ख़ुद को बचाने की मैंने की थी बड़ी ही कोशिश 
क्या करें, उनका हर अंदाज़ क़ातिलाना हो गया । 

कितनी नाज़ुक लड़ी से बंधे थे रिश्तों के मोती 
कल तक जो अपना था, वो आज बेगाना हो गया । 

यूँ तो रोज़ आसमां पर सजती है रात चाँदनी 
मगर दिल का चाँद देखे एक ज़माना हो गया । 

उन्होंने बेवफ़ा दिल के इरादों को दिया अंजाम 
और मज़बूरियों का क्या ख़ूब बहाना हो गया । 

' विर्क ' मेरा नसीब भी बेचारा अब क्या करता 
बिजलियों की शाख़ पर जब आशियाना हो गया । 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज्बात " से 

बुधवार, जून 10, 2015

दिल दिल था, क़िला नहीं

मुहब्बत की थी जिस पत्थर से, उस से गिला नहीं 
इस उजड़े हुए चमन में फूल ख़ुशी का खिला नहीं । 

एक-सा ही दौर गुजर रहा है कई मुद्द्तों से 
यहाँ पतझड़ और बहार में कोई फ़ासिला नहीं । 
खंडहर बना दिया है बेवफ़ाई के नश्तरों ने 
टूटना तो था ही इसे, दिल दिल था, क़िला नहीं । 

खाकर ठोकरे ज़माने की भीड़ से जुदा हो गए 
ग़म में तन्हा ही चले हैं, संग कोई क़ाफ़िला नहीं । 

शायद सफ़र ही है फ़साना मेरी ज़िंदगी का 
चाहा जिस किसी साहिल को, वो मुझे मिला नहीं । 

' विर्क ' किस पर लगाऊँ इल्ज़ाम मैं ख़स्तादिली का 
ये ग़ुरबत है नसीब की, मुहब्बत का सिला नहीं । 

दिलबाग विर्क 
*****

मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " में से 

बुधवार, मई 20, 2015

ये ज़िंदगी तल्ख़ दोपहर साक़ी

तेरे पास गर मय नहीं तो पिला दे ज़हर साक़ी 
बिन पिए लगे है ये ज़िंदगी तल्ख़ दोपहर साक़ी । 

ग़म का इलाज ढूँढ़ने आना पड़ता है पास तेरे 
क्या करें लोग, मंदिर नहीं होता सबका घर साक़ी । 

 फिर बताओ, क्यों न उड़ेंगी चैनो-सकूं की चिन्दियाँ 
हावी है दिलो-दिमाग पर कोई-न-कोई डर साक़ी । 

ये कैसे दस्तूर हैं ज़िंदगी के, बस ख़ुदा ही जाने 
शबे-ग़म के बाद होती नहीं ख़ुशियों की सहर साक़ी । 

दुआएँ बेअसर रहें, अनकिए गुनाहों की सज़ा मिले 
पता नहीं पत्थर है ख़ुदा या ख़ुदा है पत्थर साक़ी । 

जीने की चाह में ' विर्क ' रोज़ मरना पड़ता है 
ये हाल यहाँ, होगी तुझे भी इसकी ख़बर साक़ी । 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित " सतरंगे जज़्बात " से 

बुधवार, मई 13, 2015

इस दिल दीवाने का क्या करें

अगर मुहब्बत की राह पर चला करें 
तो रफ़्ता-रफ़्ता मंज़िल की ओर बढ़ा करें । 

दग़ाबाज़ी हमारी हमें ले डूबेगी 
अभी भी वक़्त है, संभल जाएँ, वफ़ा करें । 

ज़िंदगी का दूसरा रुख दिखाई देगा 
ठंडे दिमाग से दूसरों की सुना करें । 

हालातों की ख़स्तगी कम होती नहीं 
आओ यारो मिलकर कोई दुआ करें । 

दुश्वारियाँ रास्ते की आसां हो जाएँ 
काश ! हम तूफ़ानों की सूरत उठा करें । 

जिसे चाहे बस उसी को ख़ुदा माने 
बता इस दिल दीवाने का क्या करें । 

देखना ' विर्क ' कहीं नासूर न बन जाएँ 
इन मुहब्बत के जख़्मों की दवा करें । 

दिलबाग विर्क 
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मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " से 

बुधवार, मई 06, 2015

शतरंज की बिसात

काबू में रखे न गए मुझसे अपने जज़्बात 
मैं बन गया लोगों के लिए शतरंज की बिसात । 

दिल के आसमां पर घिरे हैं ग़म के बादल 
हो उदासी की उमस, कभी अश्कों की बरसात । 

मेरा बोलना क्यों इतना बुरा हो गया है 
क्यों तकरार का मुद्दा बन जाती हर बात । 

मुक़द्दर से शिकवा करने के सिवा क्या करें 
हमारी कोशिशें भी जब बदल न पाई हालात । 

टूटे दिल के लिए बे'मानी हैं ये सब बातें 
कितना रौशन है दिन, कितनी अँधेरी है रात । 

खुशियाँ ' विर्क ' कैसे नसीब होती मुझको 
ज़िंदगी ने दी है परेशानियों की सौग़ात । 

दिलबाग विर्क 
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मेरे और कृष्ण कायत द्वारा संपादित " सतरंगे जज़्बात " में से 

शुक्रवार, मई 01, 2015

मजदूर की मजबूरी

हाँ ! मैं मजदूर हूँ
क़लम का मजदूर 
मगर मजदूरी करता हूँ शौक से 
शौक का 
कोई मेहनताना देता है कहीं 

मजदूर हूँ तो
वक़्त तो जाया करता ही हूँ
इस मजदूरी के लिए
सिर्फ़ वक़्त ही नहीं
पैसा भी
क्योंकि लिखता हूँ तो
चाहता हूँ छपना
और कौन छापता है किसी को
मुफ़्त में
जेब ढीली करके ही
खुद की लिखी पुस्तक
आती है अलमारी में

मेहनत किसी की भी हो
किसी-न-किसी का हित
करती ही है सदा 
मेरी मेहनत से
नहीं होगा किसी का हित
ऐसा तो नहीं 
मुझे छापने वाले
थोड़ा-बहुत तो कमा ही लेते हैं
मुझे छापकर

क़ीमत
पसीने की हो
या क़लम घिसाई की
कब मिलती है किसी को
मेहनत की लूट
हो रही है हर जगह
फिर मेरा लुटना
कुछ अर्थ नहीं रखता
कम-से-कम
मैं लुट रहा हूँ सहमति से
कम-से-कम
नाम होगा मेरा
ऐसा भ्रम तो है मुझे
मगर कुछ मजदूर तो ऐसे भी हैं
जो लुटते हैं
मजबूरी में 
निश्चित है जिनका 
गुमनाम मरना

दरअसल
मजदूर कोई भी हो
मजबूर तो होता ही है 
चाहे वह ख्वाहिशों से हो
या फिर पापी पेट से
और फायदा उठाया जाता है सदा
हर मजदूर की मज़बूरी का
लुटना तो मुकद्दर है
हर मजदूर का ।

- दिलबाग विर्क

बुधवार, अप्रैल 29, 2015

हर शख़्स हो गुनहगार

अहमियत नहीं रखते पतझड़, बारिश और बहार 
गर दिल ख़ुश हो तो लगता हर मौसम ख़ुशगवार । 

छलकती आँखें, रोता दिल जाने क्या कहना चाहे 
शायद इन्हें पता न था, किस शै का नाम है प्यार । 

दिल को बेसबब परेशां देखकर सोचता हूँ मैं 
तुम्हीं तो नहीं हो, दिल में मची हलचल के जिम्मेदार । 

तुझसे दूरियाँ किसी क़यामत से कम नहीं लगती 
हर लम्हा आफ़त, हर लम्हा करे दिल बेकरार । 

समझे नहीं, जाने वाले की भी मज़बूरी होगी 
जब भी आई है याद मुझे, तड़पा है दिल हर बार । 

नफ़रतों की इस दुनिया में मुहब्बत करना गुनाह 
ख़ुदा करे ' विर्क ' दुनिया का हर शख़्स हो गुनहगार । 

दिलबाग विर्क 
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मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " में से मेरी एक ग़ज़लनुमा कविता 

गुरुवार, अप्रैल 23, 2015

आम आदमी { कविता }

आम आदमी              
महज एक खबर है       
अख़बारों के लिए         
जब वह रोता है           
बेमौत मरता है             
तब वह छपता है 
           
आम आदमी
महज एक मुद्दा है                 
सरकारों के लिए                   
वह जिन्दा है                        
सरकार की                           
नीतियों के कारण       
वह मरने को मजबूर है          
दूसरी पार्टियों  के                  
घोटालों के कारण                  
                                           
सरकार और अख़बार            
चलते हैं                               
कॉर्पोरेट घरानों के बलबूते
कॉर्पोरेट घराने
चूसते हैं खून 
आम आदमी का 
इसलिए 
सरकारों और अख़बारों को
कोई लेना-देना नहीं
आम आदमी से

आम आदमी तो
महज एक खबर है
जो बासी हो जाती है
अगले ही दिन

आम आदमी तो
महज एक मुद्दा है
जो उछलता है
सिर्फ चुनावों में
और फिर खो जाता है 
अज्ञातवास में     
अगले पाँच सालों तक ।

 दिलबाग विर्क 
 ********

शनिवार, अप्रैल 18, 2015

घड़ियाली आँसू ( कविता )


अध्यापक स्कूल जाने को
दौड़ता नहीं अब
होशियार बच्चे की तरह
उसे धकेला जाता है
जैसे धकेलते हैं माँ-बाप
नालायक रोंदू बच्चे को
चॉकलेट का लालच देकर 

स्कूल में अध्यापक 
चपड़ासी, क्लर्क, नौटँकीबाज
सब कुछ है
बस अध्यापक होने के सिवा 

शिक्षक से छीनकर
शिक्षण कार्य
भला चाहा जा रहा है
शिक्षा का
और शिक्षा के पतन पर
घड़ियाली आँसू बहा रहे हैं वो
जो खुद धकेल रहे हैं इसे 
रसातल में
नित नए प्रयोग करके ।

दिलबाग विर्क
******

बुधवार, अप्रैल 15, 2015

दोस्तों के हाथ में खंजर मिला

धूप-छाँव-सा रंग बदलता मुकद्दर मिला 
ख़ुशी मिली, ख़ुशी के खो जाने का डर मिला । 
दुश्मनों से मुकाबिले की सोचते रहे हम 
और इधर दोस्तों के हाथ में खंजर मिला । 

यूँ तो की है तरक्की मेरे मुल्क ने बहुत 
मगर सोच में डूबा हर गाँव, हर शहर मिला । 

नज़रों ने दिया है किस क़द्र धोखा मुझे 
चाँद-सा चेहरा उनका, दिल पत्थर मिला । 

हालातों की क्या कहें, बद से बदतर मिले 
ऊपर से बेग़ैरत, बेवफ़ा बशर मिला । 

किसी मंज़िल पर पहुँचना नसीब में न था 
और चलने को 'विर्क' रोज़ नया सफ़र मिला । 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " से 

बुधवार, अप्रैल 08, 2015

चेहरा लाज़वाब पर दिल में दाग़ हैं बहुत

ज़िंदगी में गम-ख़ुशी, राग-विराग हैं बहुत 
गणित की तरह जोड़-घटा, गुणा-भाग हैं बहुत । 
उतना ख़ूबसूरत नहीं वो जितना सोचा था 
चेहरा लाज़वाब पर दिल में दाग़ हैं बहुत । 

वफ़ा के फल, फूल यहाँ कहीं मिलते ही नहीं 
हर-सू गुलशन, बगीचे, बाग़ हैं बहुत । 

कैसे छुपाऊँ, तेरे बिना कैसे कटे मेरे दिन 
सुर्ख आँखें, चेहरा उदास, सुराग़ हैं बहुत । 

आफ़ताब के मुक़ाबिल कोई क्या होगा 
यूँ रौशनी देने के लिए चिराग़ हैं बहुत । 

खुश रहने का ' विर्क ' बस हुनर होना चाहिए 
दीवाली, दशहरा, तीज और फाग हैं बहुत । 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित काव्य संग्रह " सतरंगे ज़ज़्बात " से 

बुधवार, अप्रैल 01, 2015

दिल की उदासी का आलम ये है

जब से अपने हुए हैं बेगाने 
ग़म ने लगा लिए आशियाने । 

अहमियत दे बैठे जज़्बातों को 
तभी मिले हैं जख्मों के नजराने । 
दिल की उदासी का आलम ये है 
बहारों में भी ढूँढ़ लेता हूँ वीराने । 

हमने चाही जिसे वफ़ा सिखानी 
वो लगा हमें दुनियादारी सिखाने । 

ऐतबार के लायक नहीं ये दुनिया 
मतलब के हैं यहाँ सब याराने । 

किससे जवाबतलब करोगे ' विर्क '
होते हैं सबके पास कुछ बहाने । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - शामियाना 
संपादक - अशोक खुराना 
विजयनगर, बुदाऊँनी 
अगस्त 2010 

मंगलवार, मार्च 24, 2015

गांधारी-सा दर्शन

देखना खुद से होता है 
सुना दूसरों को जाता है 

दूसरे क्या सुनाते हैं आपको 
क्या सुनने को 
करते हैं विवश 
यह हाथ में नहीं आपके 

बहुत से शकुनी
बहुत से दुर्योधन 
बहुत से धृतराष्ट्र
अक्सर इतना शोर मचाते हैं 
कि दब जाती  है आवाज़ 
न सिर्फ़ 
भीष्मों की 
विदुरों की 
पांडवों की 
अपितु 
कृष्ण तक की 
कानून की देवी भी 
चूक जाती है न्याय से 
धोखा खा जाती है 
दलीलों से 
दरअसल 
गांधारी-सा दर्शन है उसका 
बाँध रखी है उसने भी 
आँख पर पट्टी 
देखने से परहेज है उसे 
वह सिर्फ सुनती है 
उसे यकीन है
कानों सुने उस सच पर 
जो सदैव कमतर होता है 
आँखों देखे सच से |

दिलबाग विर्क 
*****

बुधवार, मार्च 18, 2015

ख्बाव होंगे सच, उम्मीद पूरी है

कुछ आदत थी, कुछ मजबूरी है 
खामोशी मेरे लिए जरूरी है । 
उम्मीदें टूटती हैं यहाँ अक्सर
ख्बाव होंगे सच, उम्मीद पूरी है । 

बिक रहा है वो कौड़ियों के मोल 
आदमी की चमक तो कोहेनूरी है । 

रिश्तों में कुछ फर्क नहीं पड़ता 
धरती - चाँद में कितनी दूरी है । 

देर - सवेर नुक्सान उठाएगा 
वो शख्स, जिसमें मगरूरी है । 

मंजिल ' विर्क ' दूर रही है मुझसे 
शायद मेरी चाहत अधूरी है  । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - विदुषी 
संपादक - रविन्द्र शर्मा 
प्रकाशन - रवि प्रकाशन, बिजनौर 
प्रकाशन वर्ष - 2008  

बुधवार, मार्च 11, 2015

सफेद हो गया है, लहू न रहा लाल

इस देश महान का, हुआ है ये हाल 
कहीं पर है दंगा, कहीं पर हड़ताल । 
रोशनी की बजाए घर जलाने लगा 
जिसके भी हाथों दी हमने मशाल । 

मुद्दों का कभी कोई हल नहीं निकला 
आयोग बैठे , हुई जाँच-पड़ताल । 

शर्मो-हया का जिक्र क्यों करते हो 
सफेद हो गया है, लहू न रहा लाल । 

तमाशा बन गया है ये पूरा मुल्क 
होते हैं यहाँ हर रोज कुछ नए कमाल । 

वफ़ा की जगह ' विर्क ' बेवफाई आ गई 
कल भी थे, हम आज भी हैं बेमिसाल । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - विदुषी 
संपादक - रविन्द्र शर्मा 
प्रकाशन - रवि प्रकाशन, बिजनौर 
प्रकाशन वर्ष - 2008  

बुधवार, मार्च 04, 2015

आई महूबब की याद, हुई आँख नम

सदा नहीं रहता ये खुशगवार मौसम 
खुशियों पर हावी हो ही जाते हैं गम । 
हालात बदलते कितनी देर लगे है 
आई महूबब की याद, हुई आँख नम । 

दिल टूटे, चाहे रुसवा हो मुहब्बत 
कब किसी की सुने, ये वक्त बेरहम । 

दोस्ती की अहमियत नहीं रही जब यहाँ 
क्या अहमियत रखेगी लोगों की कसम । 

नफरतों की रात में मुहब्बत का चिराग 
रौशनी तो है, मगर बड़ी मद्धिम-मद्धिम । 

बैठकर मसलों का जिक्र तो किया होता 
 फिर देखते, कसूरवार तुम थे या हम । 

बदले में भले ' विर्क ' बेवफाई ही मिले है 
कुछ लोग फिर भी लहराएँ वफ़ा का परचम । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - हृदय के गीत 
संयोजन - सृजन दीप कला मंच, पिथौरागढ़ 
प्रकाशन - अमित प्रकाशन, हल्द्वानी ( नैनीताल )
प्रकाशन वर्ष - 2008 

बुधवार, फ़रवरी 25, 2015

शराफत का लिबास उतारा नहीं

मझधार ही मझधार हैं, कोई किनारा नहीं 
मतलबपरस्त दुनिया में, मिलता सहारा नहीं । 

वो तो कब के भूल चुके हैं कसमें वफ़ा की 
 याद करवाऊँ उन्हें, ये मुझे गवारा नहीं । 
हैवानों की दुनिया में न जाने कब हार जाऊँ 
अभी तक तो शराफत का लिबास उतारा नहीं । 

जी चाहता है, मस्त रहूँ बस अपनी ही धुन में
मगर यूँ बेपरवाह हुए भी होता गुजारा नहीं । 

दौलत-शोहरत ही सब कुछ हुआ नहीं करती 
फिर क्या हुआ अगर बुलंद अपना सितारा नहीं । 

ज़िंदगी कैसे जी है ' विर्क ' मैं जानता हूँ 
ये सच है, तेरी बेवफाई ने मुझे मारा नहीं । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - हृदय के गीत 
संयोजन - सृजन दीप कला मंच, पिथौरागढ़ 
प्रकाशन - अमित प्रकाशन, हल्द्वानी ( नैनीताल )
प्रकाशन वर्ष - 2008 

बुधवार, फ़रवरी 18, 2015

सब कुछ होती जा रही सरहदें

जब तक रहेंगी नफ़रतें इस जहां में 
लुटती रहेंगी लोगों की मुहब्बतें । 
इंसां को न वो पूछते हैं, न हम 
बस सब कुछ होती जा रही सरहदें । 

न छटा अगर साया स्याह रात का 
कैसे सजेंगी खुशियों भरी महफ़िलें । 

मातम मनाते हैं मगर करते कुछ नहीं 
यूँ तो न लेगा कभी बुरा वक्त करवटें । 

कभी तुम दिल की सिलवटें भी निकालना 
निकालते हो रोज, कपड़ों की सिलवटें । 

छोटी हों या बड़ी ' विर्क ' कुछ फर्क नहीं 
अक्सर अधूरी ही रह जाती हैं हसरतें ।

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - साधना सार्थक रहेगी 
संपादक - जय सिंह अलवरी 
प्रकाशन - राहुल प्रकाशन, सिरगुप्पा 
वर्ष - 2008  

बुधवार, फ़रवरी 11, 2015

चले हम भले ही कदम डगमगाते रहे

मेरी हार की बात मुझे याद दिलाते रहे 
लोग आकर पास मेरे कहकहे लगाते रहे । 

सोचा था, छोड़ दूँ उसकी याद में पीना 
मगर यादों के साए मै-कदे तक लाते रहे । 

हमदर्दी जताने आए थे, उन्हें रोकता कैसे 
वो इसी बहाने मेरे जख्मों को सहलाते रहे । 
टूटे दिल ने कहा, क्या है जिंदगी के सफ़र में 
मगर चले हम भले ही कदम डगमगाते रहे । 

क्या करें, रूठना अब आदत हो गई है उनकी 
आदत से मजबूर होकर हम जिन्हें मनाते रहे । 

शायद वो देखना चाहते हैं हौंसला मेरा 
इसीलिए आशियाने पर बिजलियाँ गिराते रहे । 

जो थे ' विर्क ' कातिल मेरी खुशियों-अरमानों के 
बेबसी देखो, हम उन्हीं को अपना बुलाते रहे । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - साधना सार्थक रहेगी 
संपादक - जयसिंह अल्व्री 
प्रकाशक - राहुल प्रकाशन, सिरुगुप्पा ( कर्नाटक )
प्रकाशन वर्ष - 2008

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