बुधवार, मार्च 18, 2015

ख्बाव होंगे सच, उम्मीद पूरी है

कुछ आदत थी, कुछ मजबूरी है 
खामोशी मेरे लिए जरूरी है । 
उम्मीदें टूटती हैं यहाँ अक्सर
ख्बाव होंगे सच, उम्मीद पूरी है । 

बिक रहा है वो कौड़ियों के मोल 
आदमी की चमक तो कोहेनूरी है । 

रिश्तों में कुछ फर्क नहीं पड़ता 
धरती - चाँद में कितनी दूरी है । 

देर - सवेर नुक्सान उठाएगा 
वो शख्स, जिसमें मगरूरी है । 

मंजिल ' विर्क ' दूर रही है मुझसे 
शायद मेरी चाहत अधूरी है  । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - विदुषी 
संपादक - रविन्द्र शर्मा 
प्रकाशन - रवि प्रकाशन, बिजनौर 
प्रकाशन वर्ष - 2008  

5 टिप्‍पणियां:

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

शानदार लाज़वाब अशआर ज़नाब के।

sadhana vaid ने कहा…

हर शेर बेहतरीन ! बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल !

sunita agarwal ने कहा…

behtreen :)

शारदा अरोरा ने कहा…

bahut badhiya ...

Malhotra Vimmi ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत गजल।

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