बुधवार, मार्च 11, 2015

सफेद हो गया है, लहू न रहा लाल

इस देश महान का, हुआ है ये हाल 
कहीं पर है दंगा, कहीं पर हड़ताल । 
रोशनी की बजाए घर जलाने लगा 
जिसके भी हाथों दी हमने मशाल । 

मुद्दों का कभी कोई हल नहीं निकला 
आयोग बैठे , हुई जाँच-पड़ताल । 

शर्मो-हया का जिक्र क्यों करते हो 
सफेद हो गया है, लहू न रहा लाल । 

तमाशा बन गया है ये पूरा मुल्क 
होते हैं यहाँ हर रोज कुछ नए कमाल । 

वफ़ा की जगह ' विर्क ' बेवफाई आ गई 
कल भी थे, हम आज भी हैं बेमिसाल । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - विदुषी 
संपादक - रविन्द्र शर्मा 
प्रकाशन - रवि प्रकाशन, बिजनौर 
प्रकाशन वर्ष - 2008  

2 टिप्‍पणियां:

Madan Saxena ने कहा…

बहुत खूब,बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

आज के हालात पर सुन्दर रचना, बधाई.

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