बुधवार, अक्तूबर 02, 2019

इश्क़ के हिस्से रुसवाई है

ख़ामोशी है, तन्हाई है 
यादों ने महफ़िल सजाई है। 

दिल की बातें न मानो लोगो 
इश्क़ के हिस्से रुसवाई है। 

हमारा पागलपन तुम देखो 
हर रोज़ नई चोट खाई है।

तमाम कोशिशें नाकाम रही 
क्या ख़ूब क़िस्मत पाई है। 

गुज़रे वक़्त के हर लम्हे ने 
रातों की नींद उड़ाई है। 

वफ़ा करने की ख़ता कर बैठे 
हुई ‘विर्क’ बहुत जगहँसाई है।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, सितंबर 25, 2019

ज़माना देता रहा मुझे, हर रोज़ एक नया ज़ख़्म


संभाल लेता ख़ुद को, गर होता सिर्फ़ तेरा ग़म
ज़माना देता रहा मुझे, हर रोज़ एक नया ज़ख़्म।

जब भी आदी हुए हालातों के मुताबिक़ जीने के
हमें तड़पाने-जलाने के लिए, बदल गया मौसम।

लाइलाज मर्ज़ साबित हुआ है दिल का टूटना
न असर किया दुआओं ने, न काम आई मरहम।

बीती ज़िंदगी का हर लम्हा भुलाना ही अच्छा
क्या करेंगे सोचकर, किसने किए कितने सितम।

ख़ुशफ़हमियों में जीना हमारी आदत है वरना
झूठा है जब आदमी, फिर कैसे सच्ची होगी क़सम।

सब सहारे छोड़ जाते हैं आदमी को तन्हा
कभी-कभी तो विर्कसाथ छोड़ती लगे क़लम।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अगस्त 28, 2019

दोस्तों से हाथ धो बैठोगे, जब आज़माओगे

कभी रोओगे यार, कभी बहुत पछताओगे 
पत्थर दिलों से जब तुम दिल लगाओगे। 

किसी-न-किसी मोड़ पर सामना हो ही जाता है 
दर्द को सहना सीख लो, इससे बच न पाओगे। 

जो हुआ, अच्छा हुआ, कहकर भुला दो सब कुछ 
बीती बातें याद करके, नए दर्द को बुलाओगे। 

दोस्त बनाए रखना, भले कहने भर को ही 
दोस्तों से हाथ धो बैठोगे, जब आज़माओगे। 

सब देते हैं दग़ा, सब निकलते हैं मतलबी 
किस-किस को याद रखोगे, किसे भुलाओगे। 

ठोकर खाकर न संभलना, समझदारी तो नहीं 
कब तक और कितनी बार ‘विर्क’ धोखा खाओगे।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अगस्त 21, 2019

मेरे दिल में सुलगते सवालों को हवा न दे

हर सफ़र में कामयाब होने की दुआ न दे 
अंगारों से खेल जाऊँ, इतना हौसला न दे।

या तो दुश्मन बनके दुश्मनी निभा या फिर
दोस्त बना है तो दोस्ती निभा, यूँ दग़ा न दे। 

कोहराम मचा देंगे, हो जाने दे दफ़न इन्हें 
मेरे दिल में सुलगते सवालों को हवा न दे। 

हक़ीक़त सदा रखनी है आँखों के सामने 
कुछ ज़ख़्म हरे रखने हैं, इनकी दवा न दे। 

चिराग़ाँ जलाते रहना बस फ़र्ज़ है हमारा 
वो बात और है कि इन्हें जलने ख़ुदा न दे। 

आशियाने से जुड़ने की कोशिशें करता रहूँगा  
वक़्त की आँधी ‘विर्क’ जब तक मुझे उड़ा न दे। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अगस्त 07, 2019

मैं को भी हम कहते हैं

जिन ज़ख़्मों को ज़माने में इश्क़ के ज़ख़्म कहते हैं 
कसक के हद से बढ़ने को उसका मरहम कहते हैं। 

यही रीत है नज़रों से खेल खेलने वालों की 
दिल के बदले दर्द देने वाले को सनम कहते हैं। 

पतझड़ को बहार बना देने का दमखम है जिसमें 
उस सदाबहार मौसम को प्यार का मौसम कहते हैं। 

उस मुक़ाम पर हैं, यहाँ जीना पड़े यादों के सहारे 
हम इसे ख़ुशी कहते हैं, लोग इसे ग़म कहते हैं। 

क्या औक़ात है आदमी की ख़ुदा से टकराने की 
जितने भी किए सितम वक़्त ने, उनको कम कहते हैं। 

इश्क़ का मुक़ाम पाकर ‘विर्क’ ये हाल हुआ है मेरा 
वो इस क़द्र शामिल मुझमें कि मैं को भी हम कहते हैं।

दिलबागसिंह विर्क 
***** 

बुधवार, जुलाई 17, 2019

ये इश्क़ भी है कैसी उलझन

ख़ुशियाँ उड़ें, जले यादों की आग में तन-मन 
समझ न आए, ये इश्क़ भी है कैसी उलझन 

न आने की बात वो ख़ुद कहकर गया है मुझसे 
फिर भी छोड़े न दिल मेरा, उम्मीद का दामन 

समझ न आए क्यों होता है बार-बार ऐसा 
तेरा जिक्र होते ही बढ़ जाए दिल की धड़कन

गम की मेजबानी करते-करते थक गया हूँ 
क्या करूँ, मेरा मुकद्दर ही है मेरा दुश्मन 

सितमगर ने सितम करना छोड़ा ही नहीं 
मैं खामोश रहा, कभी मजबूरन, कभी आदतन 

जो रुसवा करे ‘विर्क’ उसी को चाहता है दिल 
ये प्यार है, वफ़ा है, या है बस मेरा पागलपन 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जुलाई 10, 2019

ये न सोच कि मैंने तुझे भुला दिया

ज़िंदगी के झंझटों ने उलझा दिया
ये न सोच कि मैंने तुझे भुला दिया। 

शुक्रिया कहूँ ख़ुदा को या गिला करूँ
दर्द दिया, दर्द सहने का हौसला दिया। 

तुझे बेवफ़ा कहना ठीक न होगा 
मेरे मुक़द्दर ने ही मुझे दग़ा दिया। 

ये हुनर सीखा है ख़ुश रहने के लिए 
हर कसक को आँसुओं में बहा दिया। 

हार मानना बुज़दिलों का काम है 
इतना तो मैंने ख़ुद को बता दिया। 

तेरी याद ही है ‘विर्क’ जिसने मुझे 
कभी रुला दिया तो कभी बहला दिया। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जुलाई 03, 2019

अपनों के इस शहर में हैं बेगाने बहुत।

यूँ तो हैं यहाँ पर चेहरे जाने-पहचाने बहुत
मगर अपनों के इस शहर में हैं बेगाने बहुत। 

कुछ हुनर न था हाथों में, कुछ लापरवाही थी
कुछ लगे, कुछ ज़ाया गए, लगाए थे निशाने बहुत।

अपनों की बेवफ़ाई ने हिम्मत तोड़ दी मेरी
मैं उठ न पाया फिर, आए थे लोग उठाने बहुत।

उनके ही दिल में फ़रेब था, तभी तो उन्होंने
मेरी सीधी-सी बात के निकाले माने बहुत।

हम भी ख़बर रखते हैं बदले हुए हालातों की
बनाने को तो उसने बनाए थे बहाने बहुत।

मुझे हर हाल में छोटा साबित करना था
हैसियत मापने के लिए बदले पैमाने बहुत।

सच बोलने की बुराई विर्कमुझी में तो नहीं
इस दुनिया में होंगे, मुझ जैसे दीवाने बहुत।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जून 19, 2019

चलना, थकना, हारना, बस यही मेरा मुक़द्दर था


कुछ कोशिशें नाकाफ़ी थी, कुछ लकीरों का असर था
चलना, थकना, हारना, बस यही मेरा मुक़द्दर था।

न तो ख़ुशियाँ बटोर सका, न ही ठुकरा पाया इसे
मेरा बसेरा कभी सराय, कभी मकां, कभी घर था।

ग़ैर तो ग़ैर थे आख़िर मौक़े मुताबिक़ बदल गए
वे अपने ही थे, मारा जिन्होंने पहला पत्थर था।

लोग तो दुश्मन बनेंगे ही, झूठ को झूठ कहने पर
गिला क्यों करें, जब ख़ुद चुना दुश्वार सफ़र था।

मुझे पागल साबित करके वो बच गए इल्ज़ामों से
आख़िरकार विर्कवही हुआ जिसका मुझे डर था।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जून 12, 2019

बस इतना ही फ़र्क़ होता, फ़र्ज़ानों और दीवानों में


दिल की कश्ती को उतारें मुहब्बत के तूफ़ानों में
शुमार होता है उनका, ग़ाफ़िलों में, नादानों में।

वो यकीं रखे ज़ेहनीयत में, ये दिल को दें अहमियत
बस इतना ही फ़र्क़ होता, फ़र्ज़ानों और दीवानों में।

कसक के सिवा क्या पाओगे तहक़ीक़ात करके
उनकी मग़रूरी छुपी हुई है उनके बहानों में।

वो हमदम भी है, क़ातिल भी, तमाशबीन भी
तुम्हीं बताओ, उसे रखूँ अपनों में या बेगानों में।

चाँद को हँसते देखा, चकोर को तड़पते देखा
ऐसा वाक़िया आम हो चला दिल के फ़सानों में।

विर्कबहारें उनको फिर कभी नसीब नहीं होती
साथी छोड़कर चले गए हों जिन्हें वीरानों में।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जून 05, 2019

बेवफ़ाई का मुद्दा उठाऊँ क्या ?


तुझे तेरी नज़रों से गिराऊँ क्या ?
बेवफ़ाई का मुद्दा उठाऊँ क्या ?

क्या महसूस कर सकोगे मेरा दर्द
अपने ग़म की दास्तां सुनाऊँ क्या ?

मेरे पास है बस वफ़ा की दौलत
बताओ, दिल चीर के दिखाऊँ क्या ?

घुले-मिले पड़े हैं, ग़म-ख़ुशी के पल
याद रखूँ किसे और भुलाऊँ क्या ?

सियासत नहीं, मुहब्बत की है मैंने
फिर इस ज़माने से छुपाऊँ क्या ?

यूँ तो विर्कनिराशा मिली हर बार
अपना मुक़द्दर फिर आज़माऊँ क्या ?

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मई 29, 2019

चाँद ज़मीं पर उतारा क्यों नहीं ?

ऐसा नसीब हमारा क्यों नहीं ?
चाँद ज़मीं पर उतारा क्यों नहीं ? 

दोस्त जब तमाशबीन बन गए तो 
दुश्मनों ने हमें मारा क्यों नहीं ?

सदियों से हैं हमसफ़र दोनों 
किनारे से मिले किनारा क्यों नहीं ?

यूँ ही खींच ली बीच में दीवारें 
जो मेरा है, तुम्हारा क्यों नहीं ?

गुरूर था या एतबार न था 
तूने मुझे पुकारा क्यों नहीं ?

न चूकना वरना फिर कहोगे 
मौक़ा मिलता दोबारा क्यों नहीं ?

बहुत बुरे थे जब हम ‘विर्क’ फिर 
ज़माने ने हमें दुत्कारा क्यों नहीं ?

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मई 22, 2019

निभानी होगी हमें भी, वफ़ा की वही रीत फिर

तन्हा हूँ, उदास हूँ, जन्मेगा कोई गीत फिर 
बहुत याद आ रहा है, आज मुझे मेरा मीत फिर। 

बदनाम हो न जाए इश्क़ कहीं, मर मिटे थे लोग 
निभानी होगी हमें भी, वफ़ा की वही रीत फिर।

आदमियत पर मज़हबों को क़ुर्बान करके देखो 
वादियों में गूँजेगा, अमनो-चैन का संगीत फिर। 

ग़म के मौसम में ख़ुशबू फैलाएँ वो वस्ल के दिन 
उम्मीद है ज़िंदगी को रौशन करेगी प्रीत फिर। 

ग़म उठाना, सितम सहना, मगर सच को न छोड़ना 
अज़ल से हो रही है, ‘विर्क’ होगी सच की जीत फिर। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मई 08, 2019

कभी आँख रोई, कभी दिल जला


टूटता ही नहीं ग़मों का सिलसिला
बढ़ता ही जाए, ख़ुशियों से फ़ासिला।

मुक़द्दर ने दिया है ये तोहफ़ा मुझे
कभी आँख रोई, कभी दिल जला।

न दौलत चाही थी, न शौहरत मैंने
एक सकूं चाहा था, वो भी न मिला।

कुछ भी न हुआ उम्मीदों के मुताबिक़
आख़िर कब तक साथ देता हौसला।

हमारी दुआएँ हर बार ज़ाया गई
या ख़ुदा ! क्या ख़ूब रहा तेरा फ़ैसला।

देखना है विर्कअंजाम क्या होगा
मेरे भीतर उठ रहा है एक ज़लज़ला।

 दिलबागसिंह विर्क 
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रविवार, अप्रैल 21, 2019

हर बार हारा मैं, हर बार हाथ आई बेबसी

दरवाजे पर देकर दस्तक, लौटती रही ख़ुशी 
वाह-रे-वाह मेरी तक़दीर, तू भी ख़ूब रही। 

हालातों को बदलने की कोशिशें करता रहा 
हर बार हारा मैं, हर बार हाथ आई बेबसी। 

कभी किसी नतीजे पर पहुँचा गया न मुझसे 
अक्सर सोचता रहा, कहाँ ग़लत था, कहाँ सही। 

जिन मसलों ने उड़ाई हैं अमनो-चैन की चिंदियाँ 
उनमें कुछ मसले हैं नस्ली, बाक़ी बचे मज़हबी। 

आपसी रंजिशों ने दी है सदियों की गुलामी हमें 
भूल गए बीते वक़्त को, आग फिर लगी है वही। 

कुछ सुन लेना होंठों से, कुछ समझ लेना आँखों से 
ये दर्द भरी दास्तां, ‘विर्क’ कुछ कही, कुछ अनकही। 

दिलबागसिंह विर्क 

बुधवार, अप्रैल 10, 2019

देख कोशिशें हमारी, दूरियाँ मिटाने की

इश्क़ की राहों पर क़िस्मत आज़माने की 
बुरा क्या है, गर चाहत है तुझे पाने की। 

फ़ासिले कितने हैं दरम्यां, ये न देख 
देख कोशिशें हमारी, दूरियाँ मिटाने की। 

पास फटकने की हिम्मत न जुटा पाएँ ग़म 
आदत जिसे नग़्मे ख़ुशी के गुनगुनाने की। 

अपने हुनर को तराशते रहो, भले ही 
सबको नहीं मिलती इनायतें ज़माने की। 

समझना ही होगा हमें इस सच को 
हुआ करती हैं कुछ बातें भूल जाने की।

जाने ‘विर्क’ क्यों आदत बन गई है 
हर रोज़ नई आफ़त से टकराने की। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, अप्रैल 03, 2019

जीना सीख रहा हूँ, दिल पर रखकर पत्थर

बड़ा ग़म उठाया है मैंने, दिल की बातें मानकर 
अब जीना सीख रहा हूँ, दिल पर रखकर पत्थर। 

बुरे दिन जब आते हैं, तब पता चलता है 
बदक़िस्मती क्या है, किसे कहते हैं मुक़द्दर। 

हालातों से हारकर चुप होना पड़ता है  
क्या करें, हर कोई नहीं होता सिकन्दर। 

इसके साथ जीने की आदत बना लो तुम 
लाइलाज होता है यारो, ये दर्दे-जिगर। 

बस कुछ ऐसे ही दस्तूर हैं इस दुनिया के 
डरने वालों को डराता चला जाता है डर।

ज़िंदगी की बिसात पर संभलकर चलना चाल 
कब खेल बदल जाए ‘विर्क’ हो न पाए ख़बर। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मार्च 27, 2019

दिल है तो दिल बने, क्यों बनता पत्थर है

उनको भी पता है, मुझको भी ख़बर है 
मुहब्बत क्या है, बस एक दर्दे-जिगर है। 

ये नज़र मिली थी उनसे मुद्दतों पहले 
आज तक उस नशे का मुझ पर असर है। 

दिल का चैनो-सकूं लूटकर ले गया जो 
उसको हर जगह ढूँढ़ती मेरी नज़र है।

वो मन्दिर है या मस्जिद, सोचा नहीं कभी 
सबमें है ख़ुदा, ये सोचकर झुकाया सर है। 

क्यों बेचैन हो, किसलिए इतना परेशां 
तुम लूटो मज़ा, ये ज़िंदगी एक सफ़र है। 

धड़के तो सही ‘विर्क’, ये मचले तो सही
दिल है तो दिल बने, क्यों बनता पत्थर है। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मार्च 20, 2019

आँखों की आदत है, हुस्न को निहारना

यूँ तो हर पल चाहा है ख़ुद को सुधारना 
मगर ख़ुदा के हाथ है तक़दीर निखारना। 

हर शख़्स से इश्क़ तो नहीं होता, ये तो बस 
आँखों की आदत है, हुस्न को निहारना। 

आसार हैं क़यामत बरपने के, देखो
क्या रंग लाएगा, उनका ज़ुल्फ़ संवारना। 

चेहरे के हाव-भाव देख चुप रह गया मैं 
चाहा था दिलो-जां से तुझको पुकारना। 

कभी आसां तो कभी बड़ा मुश्किल लगे 
किसी को आँखों से दिल में उतारना। 

मैं सफल हुआ या नहीं, मुझे मालूम नहीं 
चाहा तो था ‘विर्क’ महबूब के हाथों हारना। 

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मार्च 13, 2019

अब तो दिल बहला रखा है


चंद रोज़ की मुश्किल थी, अब तो दिल बहला रखा है
तेरे जाने के बाद ग़म को अपने पास बुला रखा है।

जैसे तू ही है मेरी बाँहों में, यूँ समझता हूँ
तेरी याद को कुछ ऐसे सीने से लगा रखा है।

मेरे दिल की हर धड़कन पर लिखा है तेरा नाम
इस बात को छोड़ दें तो मैंने तुझको भुला रखा है।

डर है वक़्त की हवा फिर से सुलगा न दे इसको
कहकर बेवफ़ा तुझे, मुहब्बत को राख में दबा रखा है।

ये तो नहीं कि कभी बेचैन नहीं होता दिल मेरा
मगर देकर वफ़ा का नशा, तूफ़ां को सुला रखा है।

दिल जलेगा, अश्क बहेंगे, चैन लुटेगा, लोग हँसेगे
न मुहब्बत का ज़िक्र छेड़ विर्क, इसमें क्या रखा है।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, मार्च 06, 2019

बहलता नहीं दिल, किसी भी तरह बहलाने से

ख़्यालों की दुनिया में गुम, बेपरवाह इस ज़माने से 
मालूम नहीं हमें, क्यों हैं हम इस क़द्र दीवाने से। 

तुम्हीं बताओ आख़िर कौन-सा तरीक़ा अपनाएँ हम 
बहलता नहीं दिल, किसी भी तरह बहलाने से। 

थक-हार गए अपनी तरफ से कोशिशें करते-करते 
भुला देते तुम्हें, अगर भूल जाते तुम भुलाने से। 

मुहब्बत के ज़ख़्मों ने आसां कर दी है ज़िंदगी 
मज़बूत होता चला गया ये दिल, दर्द उठाने से। 

बड़ी खोखली है शरीफ़ चेहरों की शराफ़त फिर भी 
इसमें हर्ज नहीं, अगर कुछ हासिल हो आज़माने से। 

हर किसी को मालूम है, इस ज़िंदगी की हक़ीक़त 
कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला ‘विर्क’ तेरे बताने से। 

दिलबागसिंह विर्क 
*****

बुधवार, फ़रवरी 27, 2019

दाद देना जुगनुओं की हिम्मत को


अब क्या कहेंगे आप, इस आदत को
ग़लतियाँ ख़ुद की, कोसा क़िस्मत को।
 
तमाम चीजें बेलज़्ज़त हो गई
पाया जिसने इश्क़ की लज़्ज़त को।

ये एक दिन घर तुम्हारा जलाएगी
दोस्तो, न हवा देना इस नफ़रत को।

अपने वुजूद से फैलाएँ रौशनी
दाद देना जुगनुओं की हिम्मत को।

पत्थर पिघलाने की ताक़त है इसमें
आज़माना विर्ककभी मुहब्बत को।

दिलबागसिंह विर्क 
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