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मंगलवार, जनवरी 28, 2014

रिश्ते

" मीतु-रीतू आए नहीं ? " - सीमा ने अपने पति सुरेश से पूछा |
' नहीं, वे नहीं आएँगे , दीदी को अचानक दिल्ली जाना पड़ गया | ' - सुरेश ने कहा | 
" चलो अच्छा है, आते तो कम-से-कम हजार की चपत तो जरूर लग जाती | " - सीमा ने कुछ सोचते हुए कहा | 
' हाँ, ये तो है | महँगाई बहुत है | '- सुरेश ने कुछ असहज होते हुए कहा | सीमा से वह असहमत हो ऐसा नहीं, लेकिन जिन्दगी की तराज़ू पर रिश्तों का दौलत से हल्का होना उसे अखर गया था |

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मंगलवार, जुलाई 03, 2012

गरीबी


'अरे कल्लू मजदूरी पर चलेगा' - मैंने कल्लू से पूछा, जो अपने झोंपड़े के आगे अलाव पर तप रहा था. वैसे आज ठंड कोई ज्यादा नहीं थी. हाँ, सुब्ह-सुब्ह जो ठंडक फरवरी के महीने में होती है, वह जरूर थी. कल्लू ने मेरी ओर गौर से देखा और कहा - ' अभी बताते हैं साहिब ' और इतना कहकर वह खड़ा हो गया और झोंपड़े के दरवाजे पर जाकर आवाज दी - ' अरे मुनिया की माँ, घर में राशन है या ... ?' उसके प्रश्न के उत्तर में अंदर से आवाज आई - ' आज के दिन का तो है. '
                यह सुनते ही कल्लू, जो मुझे लग रहा था कि वह काम पर चलने को तैयार है, पुन: अलाव के पास आकर बैठते हुए बोला - 'नहीं, साहिब आज हम नहीं जाएगा.'
'क्यों ?'
क्यों क्या ? बस नहीं जाएगा. ठण्ड के दिन में काम करना क्या जरूरी है ?'
' अगर घर में राशन न होता तो ?'
' तब और बात होती, अब आज के दिन का तो है न. 
उसके इस उत्तर को सुनकर मैं नए मजदूर की तलाश में चल पड़ा.  


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बुधवार, फ़रवरी 08, 2012

स्वार्थ का पाठ ( लघुकथा )

 स्वार्थ का पाठ 

" वीरू को कहाँ लेकर गए हैं ? "- सरला के भतीजे चिंटू ने सरला से पूछा । ' वीरू' नाम है बछड़े का । ये नामकरण भी उसी ने किया था । इसके पीछे उसका तर्क था कि जब हम सबका नाम है तो बछड़े का क्यों नहीं ? आदमियों, पशुओं, पक्षियों सबसे अपनत्व का भाव बच्चों का ही काम है वरना हम तो...
" बाहर कहीं दूर छोड़ने गए हैं ।" - सरला ने उत्तर दिया ।
" तो क्या सोना ( उसी के द्वारा दिया गया बछिया का नाम ) को भी छोड़कर आएँगे ।" - उसने नया प्रश्न किया ।
" नहीं ।"
" क्यों, सोना को क्यों नहीं ?"
" वह बड़ी होकर गाय बनेगी, दूध देगी ।"
" और वीरू ?"
" वह बड़ा होकर बैल बनता । अब खेतों में ट्रैक्टर हैं इसलिए बैलों की जरूरत नहीं, इसीलिए वह हमारे किसी काम का नहीं ।"
" जो काम का नहीं होता क्या उसे बाहर छोड़ दिया जाता है ?"- चिंटू ने न्य प्रश्न दागा
" हाँ । "- सरला ने पीछा छुड़ाने की नीयत से कहा ।
" जब हम काम के नहीं रहेंगे तब हमें भी बाहर छोड़ दिया जाएगा ?"- एक और घातक प्रश्न सरल के सामने था । इस प्रश्न का उत्तर तो वो क्या दे सकती थी । हाँ, इतना अहसास उसे जरूर हो गया था कि हमारे ही कृत्य बच्चों को स्वार्थ का पहला पाठ पढ़ा देते हैं ।
दिलबाग विर्क
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गुरुवार, सितंबर 08, 2011

लघुकथा - 5

                                     सोच                                    

बाल मजदूरी को रोकने के लिए जन - जागृति पैदा करने हेतु शहर भर में स्लोगन लिखे बैनर लगाने का कार्य प्रगति पर था. विचारोत्तेजक और आकर्षक स्लोगन पढ़कर हर कोई प्रभावित हो रहा था. शहर भर में बैनर लगा देने से बाल मजदूरी रुक जाएगी , सब यही सोच रहे थे.
                    दूसरी तरफ इन स्लोगनों का आशय समझने में असमर्थ नन्हें बालकों की सोच यथाशीघ्र सभी तयशुदा स्थानों पर स्लोगन लिखे बैनर लगाकर अपनी मजदूरी हासिल करने की थी.

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सोमवार, अगस्त 01, 2011

लघुकथा - 4

                       सरकारी नौकरी                      
'' घर नहीं चलना , टाइम हो चुका है .'' - मेरे साथी ने मुझसे कहा . मैंने इस कार्यालय में आज ही ज्वाइन किया था .शायद इसीलिए उसने मुझे याद दिलाना चाहा था .
'' मेरी घड़ी पर तो अभी दस मिनट बाकी हैं .'' - मैंने घड़ी दिखाते हुए कहा .
'' वो तो मेरी घड़ी पर भी हैं ."
'' फिर ? ''
'' हम तो ऑफिस की घड़ी के हिसाब से चलेंगे .'' - उसने ऑफिस की घडी की तरफ इशारा किया .
'' लेकिन आए तो हम अपनी घडी के मुताबिक थे .''
'' हाँ , यही तो सरकारी नौकरी है .'' - उसने हंसते हुए कहा और ' देर से आना जल्दी जाना ' गुनगुनाते हुए वह बाहर की तरफ लपका , मैं भी अपना सामान समेटने लगा .

                 * * * * *

शनिवार, अप्रैल 09, 2011

लघुकथा - 3


         आज का सच            
अध्यापक ने बच्चों को ईमानदार लकडहारा कहानी याद करने के लिए दी थी . अगले दिन कहानी सुनी जा रही थी . सुनाते वक्त एक बच्चे की जवान लडखड़ाई ." लकडहारा  ईमानदार आदमी था ", कहने की बजाए वह बोला -" ईमानदार आदमी लकडहारा था ."  
          अध्यापक सोच रहा है कि यही तो आज के वक्त का सच है कि ईमानदार आदमी लकडहारा ही है , अर्थात मजदूर है , गरीब है , बेबस है , मामूली आदमी है और जो भ्रष्ट है वह मालिक है , अमीर है , शहंशाह है , मजे में है .
       
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सोमवार, मार्च 21, 2011

लघुकथा - 2

         बैकडोर एंट्री                 
" यह बैकडोर व्यवस्था कहीं भी पीछा नहीं छोडती ."- बैंक में मेरे साथ ही लाइन में खड़े एक युवक ने पिछली खिड़की से राशि निकलवाकर जाते आदमी को देखकर कहा .
' कोई मजबूरी होगी .'- मैंने सहज भाव से कहा .
" तो क्या हम बेकार हैं जो घंटे भर से खड़े हैं ? "- उसने कहा .
' चलो वक्त का थोडा नुकसान है , सब्र करो .'- मैंने हौंसला बंधाते हुए कहा .
" अकेले वक्त का नहीं , यह व्यवस्था तो जिंदगियां भी बर्बाद करती है ."-उसकी आवाज़ में रोष था .
' वो कैसे ? '- मैंने पूछा .
" इसी व्यवस्था के कारण कुछ लोग नौकरियां पा जाते हैं तो कुछ गलियों की खाक छानने को मजबूर हो जाते हैं ."-उसने निराश होकर कहा .
' नौकरी में बैकडोर व्यवस्था ? '- मैंने हैरानी से पूछा .
" एडहोक , ठेका , गेस्ट आदि के नाम पर भर्ती बैकडोर एंट्री ही तो है ."
' कैसे ? '- मैंने पूछा .'
" यह नियुक्तियां स्थानीय अधिकारीयों द्वारा बिना मैरिट के की जाती हैं . इनमें सिफारिश और रिश्वत का बोलबाला अधिक होता है . पहुंच वाले नौकरी खरीद लेते हैं और हम जैसे गरीब और सामान्य लोग देखते रह जाते हैं ."-उसने रुआंसा होकर कहा .
' ये भर्ती नियमित तो नहीं होती .'- मैंने तर्क दिया .
" ठीक कहते हैं आप , परन्तु ये लोग यूनियन बनाकर सरकार पर दवाब डालते हैं और वोटों की राजनीति करने वाले नेता इन्हें स्थायी कर देते हैं ."- उसकी आवाज़ में मायूसी थी .
' अच्छा ! ऐसा भी होता है .'- मैं चौंका .
" ऐसा ही तो होता है मेरे महान देश में ."- उसने कटाक्ष किया . मैं उसकी आँखों में सिफारिश के अभाव और गरीबी के कारण नौकरी न खरीद पाने के दुःख और भारतीय समाज में प्रचलित बैकडोर एंट्री की व्यवस्था के प्रति आक्रोश को स्पष्ट देख रहा था .
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रविवार, दिसंबर 26, 2010

लघु कथा -1


   जानवर  

अनजान गली में से गुजरते समय एक कुत्ते को बैठे देखकर हमारे कदम ठिठके  । थोडा संभलकर पास से निकलने की सोची  । जानवर है , क्या भरोसा कब टांग पकड़ ले  ।  हम दोनों ने यही सोचा ।
" आदमी भी तो एक जानवर है , सभ्य जानवर  ।"-मैंने अपने दोस्त से कहा  ।
" हाँ , जानवर तो है ,लेकिन सभ्य नहीं , बल्कि सभ्य होने के बाबजूद भी ।'- मेरे मित्र ने दार्शनिक अंदाज़ से कहा  ।
" वो कैसे ?"-मैंने हैरानी से पूछा  ।
" आदमी सभ्य है , इसमें कोई शक नहीं , लेकिन वह जानवर भी है  । जानवर की तरह वह कभी भी हमला कर सकता है आपके सामान पर , आपकी जान पर व आपकी इज्जत पर ... तभी तो घर से बाहर आकर हम अनजान आदमियों से ऐसे ही सचेत रहते हैं जैसे हम अभी इस कुत्ते के पास से गुजरते समय थे  ।"-उसने बात स्पष्ट की  ।
               उसकी बात पर जब मैंने गौर किया तो समाचार पत्रों , टी.वी.चैनलों पर दिखाए जाने वाले दुष्कर्म , लूट-मार भरे समाचार मेरी आँखों के सामने घूम गए । मुझे भी यकीन आ गया उसकी बात पर  । वास्तव में आदमी जानवर ही तो है , सभ्य होने के बाबजूद भी  ।
दिलबाग विर्क
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