बुधवार, जुलाई 22, 2015

कसक, जलन, गम का मौसम न गया

दिखते हैं यहाँ पर हमदम बहुत 
मगर देते हैं लोग जख्म बहुत | 
दिखाकर ख़ुशी की झलक अक्सर 
दिए हैं इस ज़िन्दगी ने गम बहुत | 

वो बेवफ़ा था, चला गया छोड़कर 
फिर भी उसके लिए रोए हम बहुत | 

हम सलामत हैं, ये अजूबा है 
करने वाले ने किए थे सितम बहुत | 

कसक, जलन, गम का मौसम न गया 
आए और चले गए मौसम बहुत | 

मुकद्दर से ' विर्क ' कब तक लड़ता 
इस राह में थे पेचो - ख़म बहुत | 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " से 

7 टिप्‍पणियां:

Mohan Sethi 'इंतज़ार' ने कहा…

वाह....बहुत खूब शेर हैं ...

Kavita Rawat ने कहा…

हम सलामत हैं, ये अजूबा है
करने वाले ने किए थे सितम बहुत |
कसक, जलन, गम का मौसम न गया
आए और चले गए मौसम बहुत |
…बहुत सुन्दर।

Rewa tibrewal ने कहा…

wah ! kya khoob arz kiya hai

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

बहुत उम्दा !
दो अजनबी !

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत खूब! सुदर भाव

Malhotra Vimmi ने कहा…

वाह
बहुत खुब।

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

bahut sundar gagar me sagar ...

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