बुधवार, जुलाई 29, 2015

मैं तुझे गुनगुनाता हूँ

साँस नहीं लेता, मैं तुझे अर्घ्य चढ़ाता हूँ 
गीत नहीं गाता, मैं तुझे गुनगुनाता हूँ । 
     फूलों में तू है 
          बूंदों में तू है 
               तेरी है धरती 
                    तेरा है नभ भी 
ज़र्रे-ज़र्रे में तेरा वजूद पाता हूँ 
गीत नहीं गाता, मैं तुझे गुनगुनाता हूँ ।
     सुख-दुःख आते हैं 
              आकर जाते हैं 
                   ठहरा कब कुछ है 
                          तेरा सब कुछ है 
जीवन जो पाया, उसकी ख़ुशी मनाता हूँ 
गीत नहीं गाता, मैं तुझे गुनगुनाता हूँ । 
      मैं हूँ दीवाना 
             जैसे परवाना 
                    जलना आदत है 
                           इश्क़ बुरी लत है 
फूला न समाऊँ, जब तेरा कहलाता हूँ 
गीत नहीं गाता, मैं तुझे गुनगुनाता हूँ । 

                    दिलबाग विर्क 
                     *********
मेरे और कृष्ण कायर द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " में से  

6 टिप्‍पणियां:

Malhotra vimmi ने कहा…

ज़र्रे-ज़र्रे में तेरा वजूद पाता हूँ
गीत नहीं गाता, मैं तुझे गुनगुनाता हूँ ।

अति सुंदर पंक्तियां।

विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा…

बेहद खुबसूरत रचना ...... 5 लिंकों के साथ संग्रह की मैं

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (22-07-2020) को     "सावन का उपहार"   (चर्चा अंक-3770)     पर भी होगी। 
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
सादर...! 
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
--

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर

मन की वीणा ने कहा…

भक्ति और आस्था से परिपूर्ण सुंदर रचना।

अनीता सैनी ने कहा…

वाह!बेहतरीन सर ।
सादर

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