बुधवार, जुलाई 08, 2015

ग़म का दरवान

कोई अजूबा तो नहीं, न हो बेमतलब हैरान 
इश्क़ के सिर पर होता है हिज्र का आसमान । 
पहलू में बैठा हो महबूब और फ़ुर्सत भी हो 
कभी-कभार होती है ज़िंदगी इतनी मेहरबान । 

शायद ख़ुदा देखना चाहता है हौंसला मेरा 
ख़ुशियों के दरवाजे पर मिले ग़म का दरवान । 

तन्हाई को मेरे पास फटकने ही नहीं दिया 
किया तेरी याद ने मुझ पर कितना बड़ा अहसान । 

किसी मुजरिम की तरह कटघरे में खड़े रहे 
और हमारी किस्मत हमें सुनाती रही फ़रमान । 

फ़रेब हैं यहाँ का हुनर, फ़रेब ही यहाँ का दस्तूर 
तुम भी सजा लेना ' विर्क ' कोई फ़रेब की दुकान । 

दिलबाग विर्क 
*****

मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज्बात " से 

4 टिप्‍पणियां:

Jitendra tayal ने कहा…

फ़रेब हैं यहाँ का हुनर, फ़रेब ही यहाँ का दस्तूर
तुम भी सजा लेना ' विर्क ' कोई फ़रेब की दुकान ।

ठीक कहा जनाब

Harash Mahajan ने कहा…

वाह जनाब बहुत खूबसूरत...दाद ...वसूल पाइयेगा !!

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बहुत बढ़िया

savan kumar ने कहा…

बहुत ख़ूब
http://savanxxx.blogspot.in

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