बुधवार, अप्रैल 08, 2015

चेहरा लाज़वाब पर दिल में दाग़ हैं बहुत

ज़िंदगी में गम-ख़ुशी, राग-विराग हैं बहुत 
गणित की तरह जोड़-घटा, गुणा-भाग हैं बहुत । 
उतना ख़ूबसूरत नहीं वो जितना सोचा था 
चेहरा लाज़वाब पर दिल में दाग़ हैं बहुत । 

वफ़ा के फल, फूल यहाँ कहीं मिलते ही नहीं 
हर-सू गुलशन, बगीचे, बाग़ हैं बहुत । 

कैसे छुपाऊँ, तेरे बिना कैसे कटे मेरे दिन 
सुर्ख आँखें, चेहरा उदास, सुराग़ हैं बहुत । 

आफ़ताब के मुक़ाबिल कोई क्या होगा 
यूँ रौशनी देने के लिए चिराग़ हैं बहुत । 

खुश रहने का ' विर्क ' बस हुनर होना चाहिए 
दीवाली, दशहरा, तीज और फाग हैं बहुत । 

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित काव्य संग्रह " सतरंगे ज़ज़्बात " से 

7 टिप्‍पणियां:

वाणी गीत ने कहा…

खुश रहने का हुनर चाहिये!
तारीफ़ समझें कि शिकायत!
खूब!!

Malhotra Vimmi ने कहा…

उतना ख़ूबसूरत नहीं वो जितना सोचा था

चेहरा लाज़वाब पर दिल में दाग़ हैं बहुत ।

लाजवाब गजल।

Asha Saxena ने कहा…

रचना बढ़िया है |चेहरा सुन्दर हो भी तो क्या यदि मन में जहर भरा हो |

Sudheer Maurya 'Sudheer' ने कहा…

लाजवाब

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

दूर के ढोल सुहावने होते है . अच्छी गजल .

Kailash Sharma ने कहा…

उतना ख़ूबसूरत नहीं वो जितना सोचा था
चेहरा लाज़वाब पर दिल में दाग़ हैं बहुत ।
...वाह..बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल..

Asha Joglekar ने कहा…

आफ़ताब के मुक़ाबिल कोई क्या होगा
यूँ रौशनी देने के लिए चिराग़ हैं बहुत ।

बहुत सुंदर।

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