बुधवार, जून 24, 2015

पत्थरों में ख़ुदा पाना है

इस दिल का दर्द क्या तूने कभी जाना है 
बेचैन है ये , तन्हा है , दीवाना है | 

मुहब्बत गुजरे ऐसी कैफ़ियत से अक्सर 
एक तरफ महबूब, दूसरी तरफ जमाना है | 
इबादत में हर्फ़ दुई का न आने देना 
अगर तुम्हें पत्थरों में ख़ुदा पाना है | 

तमन्ना है मुहब्बत का मुक़ाम पाने की 
इसके लिए ज़िंदगी को दाँव पर लगाना है 

बड़ी बेसब्री से है इंतज़ार उनका 
उनसे कुछ सुनना, उन्हें कुछ सुनाना है | 

मक़सद जीने का पाने के लिए ' विर्क ' हमें 
किसी का होना, किसी को अपना बनाना है |

दिलबाग विर्क 
*****
मेरे और कृष्ण कायत जी द्वारा संपादित पुस्तक " सतरंगे जज़्बात " से  

7 टिप्‍पणियां:

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बहुत खूब

मन के - मनके ने कहा…

बहुत सुंदर,शुभ एंवम शिव--किसी का हो जाना,किसी को अपना बना लेना.
जीवन यही है.

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बहुत सुन्दर

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बहुत सुन्दर

मन के - मनके ने कहा…

सुंदर लिंक के लिये साभार धन्यवाद

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (28-06-2015) को "यूं ही चलती रहे कहानी..." (चर्चा अंक-2020) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

रचना दीक्षित ने कहा…

लाजवाब बेहतरीन

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