मंगलवार, अप्रैल 08, 2014

महफ़िल में तेरा नाम उछाला न गया

दिल में तूफ़ान उठा जो, टाला न गया 
टूट गया मैं, खुद को संभाला न गया |

तू चुपके से आया था मेरे दिल में 
दिल से तुझको ताउम्र निकाला न गया | 

सोच न पाया, नुक्सान-नफे की बातें 
जग के साँचे में खुद को ढाला न गया |

 आँसू पी लेना ठीक लगा था मुझको
महफिल में तेरा नाम उछाला न गया |

मेरे सिर चढ़कर बोले जादू तेरा 
बातों में तेरा यार हवाला न गया |

यूँ तो हर ओर अँधेरा है गम का पर 
तेरी यादों का ' विर्क ' उजाला न गया |

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3 टिप्‍पणियां:

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति..सभी अशआर बहुत उम्दा और दिल को छूते हुए...

अभिषेक कुमार अभी ने कहा…

आपकी इस अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (13-04-2014) को ''जागरूक हैं, फिर इतना ज़ुल्म क्यों ?'' (चर्चा मंच-1581) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर…

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह !

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