शुक्रवार, अप्रैल 04, 2014

रात आँसू बहाती रही

दिल करे लोभ, दुनिया लुभाती रही 
हम फँसे जाल में, ये फँसाती रही |

इस चमन में जहाँ गूँज मातम रहा 
देख बुलबुल वहीँ गीत गाती रही |

खून है वो जिगर का, न शबनम कहो 

तोडना चाहती है मेरा हौंसला 

रोक पाई नहीं मंजिलें भी मुझे 
नित नई राह मुझको बुलाती रही |

मैं बड़े गौर से सुन रहा हूँ इसे 
जिन्दगी ' विर्क ' सुख-दुख सुनाती रही |
*********

5 टिप्‍पणियां:

Rangraj Iyengar ने कहा…



बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति जनाब.. खासकर निम्न पंक्तियाँ -

खून है वो जिगर का, न शबनम कहो
रात भर, रात आँसू बहाती रही |


अति सुंदर.

Mithilesh dubey ने कहा…

क्या बात है। लाजवाब रचना।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (06-04-2014) को "खामोशियों की सतह पर" (चर्चा मंच-1574) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चैत्र नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
कामना करता हूँ कि हमेशा हमारे देश में
परस्पर प्रेम और सौहार्द्र बना रहे।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

सुन्दर ग़ज़ल

Vaanbhatt ने कहा…

तोडना चाहती है मेरा हौंसला
रोज़ किस्मत मुझे आजमाती रही

बहुत खूब...

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