बुधवार, सितंबर 10, 2014

हो सका तो जख़्म छुपाऊँगा

पता नहीं इस खेल में क्या पाउँगा 
मगर मुहब्बत में किस्मत आजमाऊँगा 
तिनका हूँ तिनके की औकात न पूछ 
हवा चली तो न जाने किधर जाऊँगा । 

आना-न-आना तुम्हारी मर्जी होगी 
कल भी बुलाया था, कल फिर बुलाऊँगा । 

लोगों के हँसने से भी क्या होना है 
फिर भी हो सका तो जख़्म छुपाऊँगा । 

समेटना ही होगा ग़म आगोश में 
प्यार रुसवा होगा अगर अश्क़ बहाऊँगा । 

वफ़ा की सलीब ' विर्क ' कंधों पर होगी 
जब भी लौटकर तेरे शहर आऊँगा । 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - काव्य गौरव 
संपादक - मोहन कुमार 
प्रकाशन - आकृति प्रकाशन , पीलीभीत ( उ. प्र. )
प्रकाशन वर्ष - 2007 

4 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह बहुत सुंदर ।

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

बहुत उम्दा !
रब का इशारा

Malhotra Vimmi ने कहा…

बेहतरीन।
धन्यवाद।

मन के - मनके ने कहा…

बहुत सुंदर--प्यार-पीडा-प्रतीक्षा

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