बुधवार, सितंबर 03, 2014

उसूल तेरे शहर के

काँटे बनकर चुभे हैं फूल तेरे शहर के 
मेरी मौत बन गए उसूल तेरे शहर के । 

अरमां मेरे प्यार के चौराहे पर लुट गए 
तमाशबीन थे शख़्स मा'कूल तेरे शहर के । 

ये बदर्दी क्या जानें दर्द किसी के दिल का 
ख़ुद में ही हैं लोग मशगूल तेरे शहर के । 

वफ़ा को उड़ा ले गई आँधी बेवफाई की 
सच की दास्तां बन गए अमूल तेरे शहर के । 

प्यार करना गुनाह था इस बस्ती-ए आदम में 
आँसुओं से चुकाए महसूल तेरे शहर के । 

तड़प-तड़प कर मरने की दी ' विर्क ' सज़ा तूने 
सब जुल्मो-सितम किए हैं कबूल तेरे शहर के 

दिलबाग विर्क 
*****
काव्य संकलन - शून्य से शिखर तक 
संपादक - आचार्य शिवनारायण देवांगन ' आस '
प्रकाशन - महिमा प्रकाशन , दुर्ग ( छत्तीसगढ़ )
प्रकाशन वर्ष - 2007

7 टिप्‍पणियां:

Surendra Singh Arya ने कहा…

तड़प-तड़प कर मरने की दी ' विर्क ' सज़ा तूने
सब जुल्मो-सितम किए हैं कबूल तेरे शहर के। बहुत ही सुन्दर। लिखते रहो।

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

Umda Panktiyan

parmeshwari choudhary ने कहा…

प्यार करना गुनाह था इस बस्ती-ए आदम में
आँसुओं से चुकाए महसूल तेरे शहर के....:)

Digamber Naswa ने कहा…

बहुत खूब ... हर शेर लाजवाब ... सुभानल्ला ..

vibha rani Shrivastava ने कहा…

शानदार गजल .... कौन शेर उम्दा है कहना मुश्किल

Malhotra Vimmi ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत गजल।
एक -एक शेर में काफी वजन है परन्तु मापना कठिन।

Neetu Singhal ने कहा…

अहले-क़लम में बंद की कुल्फ़तों की दास्ताँ..,
ज़ब्ते-दिल को हर कहल मकबूल तेरे शहर के.....

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