बुधवार, जुलाई 16, 2014

तड़पने दिया दिल को , मैंने समझाया ही नहीं ।

       क्यों तेरे दिल को मुझ पर ऐतबार आया ही नहीं 
       मैंने  पूछा  था  तुझसे ,  तूने  बताया   ही  नहीं  । 
       
       बिखर गया था आशियाना मेरा देखते - देखते
       न तूने की कोशिश ,  मैंने भी बचाया ही नहीं ।  

       इस दुनिया में जीने के बहाने हैं बहुत मगर
       बहानों के खिलौनों से दिल बहलाया ही नहीं । 

       हर  वक्त  उमड़ता  रहा  तूफां  सीने  में  मेरे
       तड़पने दिया दिल को , मैंने समझाया ही नहीं ।

       हर किसी को क्यों बताएं दर्दे - दिल की दास्तां 
       वो क्या जानेंगे, जिन्होंने जख़्म खाया ही नहीं । 

       तेरा प्यार आखिरी था ' विर्क ' मेरी ज़िंदगी में 
       मैंने फिर कभी खुद को आजमाया ही नहीं । 
                  
                                दिलबाग                                            
                                *******

काव्य संकलन - अभिव्यक्ति 
संपादक - अनिल शर्मा ' अनिल '
प्रकाशक - अमन प्रकाशक, धामपुर - 246761
प्रकाशन वर्ष - { 2006 }

                                ******

9 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

सुंदर पंक्तियां, लाजवाब

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर वाह ।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

उम्दा ग़ज़ल।
धन्यवाद।

शारदा अरोरा ने कहा…

badhiya likha hai....

Anusha ने कहा…

बढ़िया ग़ज़ल

Anusha ने कहा…

बढ़िया ग़ज़ल

कविता रावत ने कहा…

सुंदर ग़ज़ल!

Pratibha Verma ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

संजय भास्‍कर ने कहा…

वाह ... बहुत खूब कहा है आपने ...।

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