रविवार, जून 02, 2013

अगज़ल - 59

       
        हम भी गुजरे थे इस रहगुजर से 
       गम ही मिलते हैं प्यार के सफर से ।

        जुबां बे'मानी है मुहब्बत में 
        ये खेल खेले जाते हैं नजर से ।

        कुछ परवाह नहीं मेरे दिल की 
        वास्ता पड़ा है कैसे पत्थर से ।

         बहुत बड़ी नहीं मेरी ख्वाहिशें 
         मैं वाकिफ हूँ अपने मुकद्दर से ।

         दहशत के लोग इस कद्र आदी हैं
         हैरानी होती नहीं किसी खबर से ।

         ये हल न हुआ विर्क मसलों का 
         आँखें बंद कर लो अगर डर से ।
                  
                 दिलबाग विर्क                     
                   ******* 

9 टिप्‍पणियां:

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति....

अभिमन्‍यु भारद्वाज ने कहा…

बहुत सुन्‍दर रचना
नई पोस्‍ट
क्‍या आपको अपना मोबाइल नम्‍बर याद नहीं

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

वाह बहुत खूब

HARSHVARDHAN ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति।।

घुइसरनाथ धाम - जहाँ मन्नत पूरी होने पर बाँधे जाते हैं घंटे।

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.!

अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
latest post मंत्री बनू मैं
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vandan gupta ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति

Shikha Kaushik ने कहा…

sundar abhivyakti .badhai

Neeraj Neer ने कहा…

waah shandar..

वाणी गीत ने कहा…

पत्थरों से कैसी उम्मीद !
भावपूर्ण पंक्तियाँ !

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