शुक्रवार, फ़रवरी 22, 2013

अग़ज़ल - 51

राह चलते-चलते दर्द मुझ पर मेहरबां हो गया 
देखो बिन बुलाए यह उम्र भर का मेहमां हो गया ।

तन्हा थे उस दिन जब सोची थी मुहब्बत की बात 
धीरे-धीरे अब साथ अश्कों का कारवां हो गया ।

मैं पागल था जो सरेआम कह बैठा चाँद उन्हें 
और उन्हें मेरी इसी बात का गुमां हो गया ।

क्या करें, सदा मेरी अब उन तक पहुंचती ही नहीं 
चंद दिनों में ही वो दूर होकर कहकशां हो गया ।

कभी हल्का-ए- गिर्दाब से निकाल लाए थे कश्ती 
मगर आज हवा का हल्का-सा झोंका तूफां हो गया ।

तन्हाइयों में बैठकर विर्क अब सोचते हैं अक्सर 
ख़ुशी क्यों न मिली, क्यों हर यत्न रायगां हो गया ।

दिलबाग विर्क 
*********
गुमां  - घमंड 
कहकशां - आकाश गंगा 
हल्का-ए- गिर्दाब - भंवर की परिधि 
रायगां - निष्फल 
********


6 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

श्रीमती वन्दना गुप्ता जी आज कुछ व्यस्त है। इसलिए आज मेरी पसंद के लिंकों में आपका लिंक भी चर्चा मंच पर सम्मिलित किया जा रहा है।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (23-02-2013) के चर्चा मंच-1164 (आम आदमी कि व्यथा) पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Aziz Jaunpuri ने कहा…

आपके शब्द ,मेरी पसंद**** मैं पागल था जो सरेआम कह बैठा चाँद उन्हें
और उन्हें मेरी इसी बात का गुमां हो गया ।

क्या करें, सदा मेरी अब उन तक पहुंचती ही नहीं
चंद दिनों में ही वो दूर होकर कहकशां हो गया ।

Pratibha Verma ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति बधाई ...

रश्मि शर्मा ने कहा…

मैं पागल था जो सरेआम कह बैठा चाँद उन्हें
और उन्हें मेरी इसी बात का गुमां हो गया ...बहुत उम्‍दा गज़ल..बधाई

Onkar ने कहा…

सुन्दर ग़ज़ल

vandana ने कहा…

sundar gazal

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