मंगलवार, मार्च 12, 2013

अग़ज़ल - 52

उडकर न सही, पैदल चलकर ही 
पा ही लेंगे मंजिल, कभी-न-कभी ।

खिलखिलाकर हंसो, जब भी वक्त मिले 
यहाँ बड़ी मुश्किल से मिले है ख़ुशी ।

जी रहे हैं बेपरवाही से देखो 
क्या रंग लाएगी ये आवारगी ।

प्यार का मुकाम भी दिलाती है गर 
जलाती है दिल को दिल की लगी ।

या रब ! किसी को बेबस न बना 
हर शै से बुरी है ये बेबसी ।

न वफा है पास और न ही गैरत 
कितना खोखला है आज का आदमी ।

मुद्दे विर्क इससे और उलझ जाएंगे 
हर मसले को न बनाओ मजहबी ।

दिलबाग विर्क 
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2 टिप्‍पणियां:

Brijesh Singh ने कहा…

वाह क्या बात! बहुत बेहतरीन!

Kailash Sharma ने कहा…

न वफा है पास और न ही गैरत
कितना खोखला है आज का आदमी ।

...बहुत खूब! बहुत प्रभावी प्रस्तुति...

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