शनिवार, अप्रैल 19, 2014
मंगलवार, अप्रैल 08, 2014
महफ़िल में तेरा नाम उछाला न गया
दिल में तूफ़ान उठा जो, टाला न गया
टूट गया मैं, खुद को संभाला न गया |
तू चुपके से आया था मेरे दिल में
दिल से तुझको ताउम्र निकाला न गया |
सोच न पाया, नुक्सान-नफे की बातें
जग के साँचे में खुद को ढाला न गया |
आँसू पी लेना ठीक लगा था मुझको
महफिल में तेरा नाम उछाला न गया |
मेरे सिर चढ़कर बोले जादू तेरा
बातों में तेरा यार हवाला न गया |
यूँ तो हर ओर अँधेरा है गम का पर
तेरी यादों का ' विर्क ' उजाला न गया |
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रविवार, अप्रैल 06, 2014
मैं कहूँ मिसरा, बना दे शे'र तू
उम्र से है बेहतर , ये एक पल
चल जहाँ तक हो सके, तू साथ चल ।
सीख ले जीना , मिली है जिंदगी
वक्त का पहिया चले कल, आज, कल ।
है मुहब्ब्त का तरीका बस यही
प्यार पाने के लिए खुद को बदल ।
गलतियों को देखना तू छोड़ दे
भूलकर सब कुछ , कभी तो कर पहल ।
ये सियानफ मार डालेगी तुझे
दिल न बन नादान, बच्चे-सा मचल ।
मैं कहूँ मिसरा, बना दे शे'र तू
इस तरह से ' विर्क ' पूरी हो ग़ज़ल ।
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शुक्रवार, अप्रैल 04, 2014
रात आँसू बहाती रही
दिल करे लोभ, दुनिया लुभाती रही
हम फँसे जाल में, ये फँसाती रही |
इस चमन में जहाँ गूँज मातम रहा
देख बुलबुल वहीँ गीत गाती रही |
खून है वो जिगर का, न शबनम कहो
तोडना चाहती है मेरा हौंसला
रोक पाई नहीं मंजिलें भी मुझे
नित नई राह मुझको बुलाती रही |
मैं बड़े गौर से सुन रहा हूँ इसे
जिन्दगी ' विर्क ' सुख-दुख सुनाती रही |
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बुधवार, अप्रैल 02, 2014
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