शनिवार, अप्रैल 19, 2014

पुस्तक - चंद आँसू, चंद अल्फ़ाज़

वर्ष 2005 में मेरा ग़ज़लनुमा कविताओं का संग्रह प्रकाशित हुआ था , मैं इसे PDF FILE के रूप में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ  | आशा है आप इसे पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देंगे ।

मंगलवार, अप्रैल 08, 2014

महफ़िल में तेरा नाम उछाला न गया

दिल में तूफ़ान उठा जो, टाला न गया 
टूट गया मैं, खुद को संभाला न गया |

तू चुपके से आया था मेरे दिल में 
दिल से तुझको ताउम्र निकाला न गया | 

सोच न पाया, नुक्सान-नफे की बातें 
जग के साँचे में खुद को ढाला न गया |

 आँसू पी लेना ठीक लगा था मुझको
महफिल में तेरा नाम उछाला न गया |

मेरे सिर चढ़कर बोले जादू तेरा 
बातों में तेरा यार हवाला न गया |

यूँ तो हर ओर अँधेरा है गम का पर 
तेरी यादों का ' विर्क ' उजाला न गया |

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रविवार, अप्रैल 06, 2014

मैं कहूँ मिसरा, बना दे शे'र तू

उम्र  से  है  बेहतर ,  ये  एक  पल 
चल जहाँ तक हो सके, तू साथ चल । 

सीख  ले  जीना , मिली है जिंदगी 
वक्त का पहिया चले कल, आज, कल । 

है मुहब्ब्त का तरीका बस यही 
प्यार पाने के लिए खुद को बदल । 

गलतियों को देखना तू छोड़ दे 
भूलकर सब कुछ , कभी तो कर पहल । 

ये सियानफ मार डालेगी तुझे 
दिल न बन नादान, बच्चे-सा मचल । 

मैं कहूँ मिसरा, बना दे शे'र तू 
इस तरह से ' विर्क ' पूरी हो ग़ज़ल । 
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शुक्रवार, अप्रैल 04, 2014

रात आँसू बहाती रही

दिल करे लोभ, दुनिया लुभाती रही 
हम फँसे जाल में, ये फँसाती रही |

इस चमन में जहाँ गूँज मातम रहा 
देख बुलबुल वहीँ गीत गाती रही |

खून है वो जिगर का, न शबनम कहो 

तोडना चाहती है मेरा हौंसला 

रोक पाई नहीं मंजिलें भी मुझे 
नित नई राह मुझको बुलाती रही |

मैं बड़े गौर से सुन रहा हूँ इसे 
जिन्दगी ' विर्क ' सुख-दुख सुनाती रही |
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