जले का इलाज शमादानों के पास नहीं
ग़मों का हिसाब दीवानों के पास नहीं।
बेवफ़ाई, बेहयाई ले बैठी है सबको
ख़ुशी की दौलत इंसानों के पास नहीं।
सुकूं मिला तो मिलेगा अपनों के पास
न ढूँढ़ो इसे, यह बेगानों के पास नहीं।
आशिक़ों के काम की चीज़ है, वहीं देखो
ये दिल होता हुक्मरानों के पास नहीं।
मुल्क बेचकर घर भरते रहते हैं अपना
शर्मो-हया सियासतदानों के पास नहीं ।
छूट चुके हैं जो तीर, लगेंगे निशाने पर
कोई इलाज अब कमानों के पास नहीं।
ज़िंदगी की उलझनों में उलझते चले गए
इनका हल ‘विर्क’ नादानों के पास नहीं।
दिलबागसिंह विर्क
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