तुझसे मुहब्बत करने की ये कैसी सज़ा हुई
कुछ ज़ख़्म ऐसे मिले, न जिनकी दवा हुई ।
दिल के गुलशन में अब महकेंगे फूल तो कैसे
तुम्हारे साथ ही, बहारों की रुत हमसे खफ़ा हुई।
ऐसा तो नहीं कि ख़ुदा पर एतबार न रहा हो
बस बेबसी है ये कि न हमसे कोई दुआ हुई ।
मेरे वतन के लोग इतने संगदिल न थे कभी
अमनो-चैन खो गया है, ये किसकी बद्दुआ हुई।
इस जलते दिल को सुकूं मयस्सर होता तो कैसे
न हम ही बेवफ़ा हुए, न उनसे ही वफ़ा हुई ।
चंद पल तड़पने के बाद ‘विर्क’ ख़ामोश हो गए
तुम क्या जानो, कब हमारे अरमानों की क़ज़ा हुई ।
दिलबागसिंह विर्क
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