आँखों के मैख़ाने से
पिला दे जाम साक़िया
मैंने कर दी है
ज़िंदगी तेरे नाम साक़िया।
तू बदनाम लूटने के
लिए, मैं लुटने आया हूँ
मेरी वफ़ा कब माँगे,
कोई इनाम साक़िया।
दुनियादारी निभाना
या फिर मुहब्बत ही करना
लग ही जाएगा
कोई-न-कोई इल्ज़ाम साक़िया।
दिन की ख़ताएँ मज़ा
किरकिरा कर देती हैं वरना
सुहानी होती है,
ज़िंदगी की हर शाम साक़िया।
लोगों को देखकर
संगदिल बनना तो ठीक नहीं
तू बाँटता रह
ख़ुशियाँ, यही तेरा काम
साक़िया।
पागल दुनिया वाले ‘विर्क’ नफ़रतों में जी रहे हैं
देना ही होगा तुझको
मुहब्बत का पैग़ाम साक़िया।




