बुधवार, मई 22, 2019

निभानी होगी हमें भी, वफ़ा की वही रीत फिर

तन्हा हूँ, उदास हूँ, जन्मेगा कोई गीत फिर 
बहुत याद आ रहा है, आज मुझे मेरा मीत फिर। 

बदनाम हो न जाए इश्क़ कहीं, मर मिटे थे लोग 
निभानी होगी हमें भी, वफ़ा की वही रीत फिर।

आदमियत पर मज़हबों को क़ुर्बान करके देखो 
वादियों में गूँजेगा, अमनो-चैन का संगीत फिर। 

ग़म के मौसम में ख़ुशबू फैलाएँ वो वस्ल के दिन 
उम्मीद है ज़िंदगी को रौशन करेगी प्रीत फिर। 

ग़म उठाना, सितम सहना, मगर सच को न छोड़ना 
अज़ल से हो रही है, ‘विर्क’ होगी सच की जीत फिर। 

दिलबागसिंह विर्क 
*******

बुधवार, मई 08, 2019

कभी आँख रोई, कभी दिल जला


टूटता ही नहीं ग़मों का सिलसिला
बढ़ता ही जाए, ख़ुशियों से फ़ासिला।

मुक़द्दर ने दिया है ये तोहफ़ा मुझे
कभी आँख रोई, कभी दिल जला।

न दौलत चाही थी, न शौहरत मैंने
एक सकूं चाहा था, वो भी न मिला।

कुछ भी न हुआ उम्मीदों के मुताबिक़
आख़िर कब तक साथ देता हौसला।

हमारी दुआएँ हर बार ज़ाया गई
या ख़ुदा ! क्या ख़ूब रहा तेरा फ़ैसला।

देखना है विर्कअंजाम क्या होगा
मेरे भीतर उठ रहा है एक ज़लज़ला।

 दिलबागसिंह विर्क 
*****

रविवार, अप्रैल 21, 2019

हर बार हारा मैं, हर बार हाथ आई बेबसी

दरवाजे पर देकर दस्तक, लौटती रही ख़ुशी 
वाह-रे-वाह मेरी तक़दीर, तू भी ख़ूब रही। 

हालातों को बदलने की कोशिशें करता रहा 
हर बार हारा मैं, हर बार हाथ आई बेबसी। 

कभी किसी नतीजे पर पहुँचा गया न मुझसे 
अक्सर सोचता रहा, कहाँ ग़लत था, कहाँ सही। 

जिन मसलों ने उड़ाई हैं अमनो-चैन की चिंदियाँ 
उनमें कुछ मसले हैं नस्ली, बाक़ी बचे मज़हबी। 

आपसी रंजिशों ने दी है सदियों की गुलामी हमें 
भूल गए बीते वक़्त को, आग फिर लगी है वही। 

कुछ सुन लेना होंठों से, कुछ समझ लेना आँखों से 
ये दर्द भरी दास्तां, ‘विर्क’ कुछ कही, कुछ अनकही। 

दिलबागसिंह विर्क 

बुधवार, अप्रैल 10, 2019

देख कोशिशें हमारी, दूरियाँ मिटाने की

इश्क़ की राहों पर क़िस्मत आज़माने की 
बुरा क्या है, गर चाहत है तुझे पाने की। 

फ़ासिले कितने हैं दरम्यां, ये न देख 
देख कोशिशें हमारी, दूरियाँ मिटाने की। 

पास फटकने की हिम्मत न जुटा पाएँ ग़म 
आदत जिसे नग़्मे ख़ुशी के गुनगुनाने की। 

अपने हुनर को तराशते रहो, भले ही 
सबको नहीं मिलती इनायतें ज़माने की। 

समझना ही होगा हमें इस सच को 
हुआ करती हैं कुछ बातें भूल जाने की।

जाने ‘विर्क’ क्यों आदत बन गई है 
हर रोज़ नई आफ़त से टकराने की। 

दिलबागसिंह विर्क 
*****

बुधवार, अप्रैल 03, 2019

जीना सीख रहा हूँ, दिल पर रखकर पत्थर

बड़ा ग़म उठाया है मैंने, दिल की बातें मानकर 
अब जीना सीख रहा हूँ, दिल पर रखकर पत्थर। 

बुरे दिन जब आते हैं, तब पता चलता है 
बदक़िस्मती क्या है, किसे कहते हैं मुक़द्दर। 

हालातों से हारकर चुप होना पड़ता है  
क्या करें, हर कोई नहीं होता सिकन्दर। 

इसके साथ जीने की आदत बना लो तुम 
लाइलाज होता है यारो, ये दर्दे-जिगर। 

बस कुछ ऐसे ही दस्तूर हैं इस दुनिया के 
डरने वालों को डराता चला जाता है डर।

ज़िंदगी की बिसात पर संभलकर चलना चाल 
कब खेल बदल जाए ‘विर्क’ हो न पाए ख़बर। 

दिलबागसिंह विर्क 
******
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...