तन्हा हूँ, उदास हूँ, जन्मेगा कोई गीत फिर
बहुत याद आ रहा है, आज मुझे मेरा मीत फिर।
बदनाम हो न जाए इश्क़ कहीं, मर मिटे थे लोग
निभानी होगी हमें भी, वफ़ा की वही रीत फिर।
आदमियत पर मज़हबों को क़ुर्बान करके देखो
वादियों में गूँजेगा, अमनो-चैन का संगीत फिर।
ग़म के मौसम में ख़ुशबू फैलाएँ वो वस्ल के दिन
उम्मीद है ज़िंदगी को रौशन करेगी प्रीत फिर।
ग़म उठाना, सितम सहना, मगर सच को न छोड़ना
अज़ल से हो रही है, ‘विर्क’ होगी सच की जीत फिर।
दिलबागसिंह विर्क
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