बुधवार, अप्रैल 10, 2019

देख कोशिशें हमारी, दूरियाँ मिटाने की

इश्क़ की राहों पर क़िस्मत आज़माने की 
बुरा क्या है, गर चाहत है तुझे पाने की। 

फ़ासिले कितने हैं दरम्यां, ये न देख 
देख कोशिशें हमारी, दूरियाँ मिटाने की। 

पास फटकने की हिम्मत न जुटा पाएँ ग़म 
आदत जिसे नग़्मे ख़ुशी के गुनगुनाने की। 

अपने हुनर को तराशते रहो, भले ही 
सबको नहीं मिलती इनायतें ज़माने की। 

समझना ही होगा हमें इस सच को 
हुआ करती हैं कुछ बातें भूल जाने की।

जाने ‘विर्क’ क्यों आदत बन गई है 
हर रोज़ नई आफ़त से टकराने की। 

दिलबागसिंह विर्क 
*****

4 टिप्‍पणियां:

Meena sharma ने कहा…


फ़ासिले कितने हैं दरम्यां, ये न देख
देख कोशिशें हमारी, दूरियाँ मिटाने की।
बहुत सुंदर।

roopchandrashastri ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (12-04-2019) को "फिर से चौकीदार" (चर्चा अंक-3303) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर

M VERMA ने कहा…

जाने ‘विर्क’ क्यों आदत बन गई है
हर रोज़ नई आफ़त से टकराने की।

यही तो जिंदगी है

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