बुधवार, अक्टूबर 02, 2019

इश्क़ के हिस्से रुसवाई है

ख़ामोशी है, तन्हाई है 
यादों ने महफ़िल सजाई है। 

दिल की बातें न मानो लोगो 
इश्क़ के हिस्से रुसवाई है। 

हमारा पागलपन तुम देखो 
हर रोज़ नई चोट खाई है।

तमाम कोशिशें नाकाम रही 
क्या ख़ूब क़िस्मत पाई है। 

गुज़रे वक़्त के हर लम्हे ने 
रातों की नींद उड़ाई है। 

वफ़ा करने की ख़ता कर बैठे 
हुई ‘विर्क’ बहुत जगहँसाई है।

दिलबागसिंह विर्क 
******

बुधवार, सितंबर 25, 2019

ज़माना देता रहा मुझे, हर रोज़ एक नया ज़ख़्म


संभाल लेता ख़ुद को, गर होता सिर्फ़ तेरा ग़म
ज़माना देता रहा मुझे, हर रोज़ एक नया ज़ख़्म।

जब भी आदी हुए हालातों के मुताबिक़ जीने के
हमें तड़पाने-जलाने के लिए, बदल गया मौसम।

लाइलाज मर्ज़ साबित हुआ है दिल का टूटना
न असर किया दुआओं ने, न काम आई मरहम।

बीती ज़िंदगी का हर लम्हा भुलाना ही अच्छा
क्या करेंगे सोचकर, किसने किए कितने सितम।

ख़ुशफ़हमियों में जीना हमारी आदत है वरना
झूठा है जब आदमी, फिर कैसे सच्ची होगी क़सम।

सब सहारे छोड़ जाते हैं आदमी को तन्हा
कभी-कभी तो ‘विर्क’ साथ छोड़ती लगे क़लम।

दिलबागसिंह विर्क 
*****

बुधवार, अगस्त 28, 2019

दोस्तों से हाथ धो बैठोगे, जब आज़माओगे

कभी रोओगे यार, कभी बहुत पछताओगे 
पत्थर दिलों से जब तुम दिल लगाओगे। 

किसी-न-किसी मोड़ पर सामना हो ही जाता है 
दर्द को सहना सीख लो, इससे बच न पाओगे। 

जो हुआ, अच्छा हुआ, कहकर भुला दो सब कुछ 
बीती बातें याद करके, नए दर्द को बुलाओगे। 

दोस्त बनाए रखना, भले कहने भर को ही 
दोस्तों से हाथ धो बैठोगे, जब आज़माओगे। 

सब देते हैं दग़ा, सब निकलते हैं मतलबी 
किस-किस को याद रखोगे, किसे भुलाओगे। 

ठोकर खाकर न संभलना, समझदारी तो नहीं 
कब तक और कितनी बार ‘विर्क’ धोखा खाओगे।

दिलबागसिंह विर्क 
******

बुधवार, अगस्त 21, 2019

मेरे दिल में सुलगते सवालों को हवा न दे

हर सफ़र में कामयाब होने की दुआ न दे 
अंगारों से खेल जाऊँ, इतना हौसला न दे।

या तो दुश्मन बनके दुश्मनी निभा या फिर
दोस्त बना है तो दोस्ती निभा, यूँ दग़ा न दे। 

कोहराम मचा देंगे, हो जाने दे दफ़न इन्हें 
मेरे दिल में सुलगते सवालों को हवा न दे। 

हक़ीक़त सदा रखनी है आँखों के सामने 
कुछ ज़ख़्म हरे रखने हैं, इनकी दवा न दे। 

चिराग़ाँ जलाते रहना बस फ़र्ज़ है हमारा 
वो बात और है कि इन्हें जलने ख़ुदा न दे। 

आशियाने से जुड़ने की कोशिशें करता रहूँगा  
वक़्त की आँधी ‘विर्क’ जब तक मुझे उड़ा न दे। 

दिलबागसिंह विर्क 
******

बुधवार, अगस्त 07, 2019

मैं को भी हम कहते हैं

जिन ज़ख़्मों को ज़माने में इश्क़ के ज़ख़्म कहते हैं 
कसक के हद से बढ़ने को उसका मरहम कहते हैं। 

यही रीत है नज़रों से खेल खेलने वालों की 
दिल के बदले दर्द देने वाले को सनम कहते हैं। 

पतझड़ को बहार बना देने का दमखम है जिसमें 
उस सदाबहार मौसम को प्यार का मौसम कहते हैं। 

उस मुक़ाम पर हैं, यहाँ जीना पड़े यादों के सहारे 
हम इसे ख़ुशी कहते हैं, लोग इसे ग़म कहते हैं। 

क्या औक़ात है आदमी की ख़ुदा से टकराने की 
जितने भी किए सितम वक़्त ने, उनको कम कहते हैं। 

इश्क़ का मुक़ाम पाकर ‘विर्क’ ये हाल हुआ है मेरा 
वो इस क़द्र शामिल मुझमें कि मैं को भी हम कहते हैं।

दिलबागसिंह विर्क 
***** 

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...