ख़ामोशी है, तन्हाई है
यादों ने महफ़िल सजाई है।
दिल की बातें न मानो लोगो
इश्क़ के हिस्से रुसवाई है।
हमारा पागलपन तुम देखो
हर रोज़ नई चोट खाई है।
तमाम कोशिशें नाकाम रही
क्या ख़ूब क़िस्मत पाई है।
गुज़रे वक़्त के हर लम्हे ने
रातों की नींद उड़ाई है।
वफ़ा करने की ख़ता कर बैठे
हुई ‘विर्क’ बहुत जगहँसाई है।
दिलबागसिंह विर्क
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