मंगलवार, मार्च 15, 2016

भेड़िए की जीत

आज तेरे पास नहीं 
भले ही गुजारे लायक साधन 
मौसमों की मार भी पड़ती है तुझ पर 
गले तक कर्ज में भी डूबा है तू 
मगर तू वंशज है ऊँचे खानदान का 
पीढ़ियों पहले 
तुम्हारी जाति के लोगों ने 
किया था शोषण हमारी जाति का 
अब उसकी सजा भुगतनी होगी तुझे 
ये कहकर निगल गया 
सामाजिकता का भेड़िया
आर्थिकता के मेमने को 

अतीत का बदला ले लिया गया 
वर्तमान से 
और नींव रख दी गई भविष्य की 

मेमना कभी भेड़िया था
भेड़िया कभी मेमना था
मेमने और भेड़िए बदलते रहे हैं 
हर दौर में
मगर भेड़िए अतीत में भी जीते थे 
वर्तमान में भी जीत रहे हैं 
भविष्य में भी जीतेंगे...

दिलबागसिंह विर्क 
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2 टिप्‍पणियां:

Malhotra Vimmi ने कहा…

मेमना कभी भेड़िया था
भेड़िया कभी मेमना था
मेमने और भेड़िए बदलते रहे हैं
हर दौर में
मगर भेड़िए अतीत में भी जीते थे
वर्तमान में भी जीत रहे हैं
भविष्य में भी जीतेंगे... लाजवाब

महेश कुशवंश ने कहा…

सटीक रचना , सामयिक परिवेश को उकेरती , बधाई विर्क जी

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