बुधवार, अप्रैल 03, 2019

जीना सीख रहा हूँ, दिल पर रखकर पत्थर

बड़ा ग़म उठाया है मैंने, दिल की बातें मानकर 
अब जीना सीख रहा हूँ, दिल पर रखकर पत्थर। 

बुरे दिन जब आते हैं, तब पता चलता है 
बदक़िस्मती क्या है, किसे कहते हैं मुक़द्दर। 

हालातों से हारकर चुप होना पड़ता है  
क्या करें, हर कोई नहीं होता सिकन्दर। 

इसके साथ जीने की आदत बना लो तुम 
लाइलाज होता है यारो, ये दर्दे-जिगर। 

बस कुछ ऐसे ही दस्तूर हैं इस दुनिया के 
डरने वालों को डराता चला जाता है डर।

ज़िंदगी की बिसात पर संभलकर चलना चाल 
कब खेल बदल जाए ‘विर्क’ हो न पाए ख़बर। 

दिलबागसिंह विर्क 
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3 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

डरने वालों को डराता चला जाता है डर

sunder rachnaa ....

roopchandrashastri ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (05-04-2019) को "दिल पर रखकर पत्थर" (चर्चा अंक-3296) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Meena sharma ने कहा…


बस कुछ ऐसे ही दस्तूर हैं इस दुनिया के
डरने वालों को डराता चला जाता है डर।

ज़िंदगी की बिसात पर संभलकर चलना चाल
कब खेल बदल जाए ‘विर्क’ हो न पाए ख़बर।
पूरी गजल ही अच्छी है पर ये चारों पंक्तियाँ तो अनमोल हैं।

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