मसीहा बनने की कहाँ थी हैसियत
मुझे मेरे ग़म से ही मिली न फ़ुर्सत।
मुहब्बत के दरिया में फैलाए ज़हर
हमारे दिलों की ये थोड़ी-सी नफ़रत।
मौक़ा मिलते ही उड़ाया है मज़ाक़
यूँ तो लोगों ने दी है बहुत इज़्ज़त।
दौरे-ग़म में जीना आसां तो नहीं
हम जी रहे हैं, क्या ये कम है हिम्मत।
मेरा ये हुनर तो किसी काम का नहीं
करता रहता हूँ बस लफ़्ज़ों से कसरत।
वो जुनूं का दौर था ‘विर्क’, उसका क्या
अब तो सोचता हूँ, क्यों की थी उल्फ़त ।
दिलबागसिंह विर्क
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